तारीख: रूस में बनी AK-47 को अमेरिका ने दुनिया भर में क्यों पहुंचाया?
गोलियों की आवाज़ से पूरी वादी गूंज रही थी. और साथ में लग रहा था एक नारा.
जून 1988. जम्मू और कश्मीर. रात के अंधेरे में जंगल से होते हुए एक जीप जा रही है. गाड़ी कुपवाड़ा से निकली है और इसे श्रीनगर पहुंचना है. अंदर ड्राइवर सहित चार लोग बैठे हैं. कुछ बोरे भी रखे हुए हैं, जिनमें बकौल ड्राइवर मार्बल की टाइल्स रखी हैं. ये बात सवारी ने उसे बताई है. अचानक गाड़ी का टायर रोड में बने एक गड्ढे से गुजरता है. गाड़ी हिलती है और अंदर रखे बोरों में से एक का मुंह खुल जाता है. ड्राइवर की उस पर नज़र पड़ती है. लोहे की एक नली बोरे के अंदर से बाहर झांक रही थी. माथे पर टपकते पसीने को पोछ कर ड्राइवर तुरंत मुंह फेरता है, और गाड़ी की स्पीड तेज कर देता है. गाड़ी श्रीनगर पहुंच जाती है. कुछ दिनों बाद लोहे की वो नली, 18-20 साल के एक लड़के के कंधे पर लटक रही थी.
गोलियों की आवाज़ से पूरी वादी गूंज रही थी. और साथ में लग रहा था एक नारा.
"सरहद पार जाएंगे, कलाश्निकोव लेकर आएंगे".
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