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होली के दिन कांग्रेस को बेरंग करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया की कहानी कुछ ऐसी है

पॉलिटिक्स में आने की वजह भी जान लीजिए.

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10 मार्च 2020 (अपडेटेड: 10 मार्च 2020, 02:37 PM IST)
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ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने जनसंघ से नाता तोड़कर कांग्रेस जॉइन किया था.
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ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर निकल गए हैं. 9 मार्च को उन्होंने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. 10 मार्च की सुबह कांग्रेस ने उनको पार्टी से बाहर निकाल दिया.
ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में शामिल कराने वाला प्रोग्राम एक दिन के लिए टाल दिया गया. रिपोर्ट्स के अनुसार, ज्योतिरादित्य 11 मार्च को बीजेपी में शामिल हो जाएंगे. बीजेपी ज्योतिरादित्य सिंधिया का धांसू वेलकम करने की तैयारी कर रही है. जिसकी कमी की वजह से ज्योतिरादित्य अपनी पहली पार्टी कांग्रेस से नाराज चल रहे थे.
बायो के बाद स्टेटस बदल गया
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चार महीने पहले ट्विटर पर अपना बायो बदला था. पूर्व मंत्री और सांसद से जनसेवक और क्रिकेट प्रेमी हो गए थे. तब कांग्रेस ने कहा था कि इसको अन्यथा न लिया जाए. ज्योतिरादित्य ने अब अपना स्टेटस बदल लिया है. लिटरली. होली के मौके पर कांग्रेस का रंग फीका है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार पर तलवार लटकी हुई है. कमलनाथ कब तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहेंगे, कोई ठिकाना नहीं है.
कमलनाथ फिलहाल एमपी के सीएम हैं. लेकिन कब तक रहेंगे, कहा नहीं जा सकता.
कमलनाथ फिलहाल एमपी के सीएम हैं. लेकिन कब तक रहेंगे, कहा नहीं जा सकता.

ज्योतिरादित्य सिंधिया की कहानी क्या है
ज्योतिरादित्य ग्वालियर के सिंधिया खानदार के वारिस हैं. 2002 में पहली बार गुना से सांसद बने थे. 2019 के चुनाव में उन्हीं के एक सिपहसालार ने गुना सीट से उनको बेदखल कर दिया था. 2018 में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सरकार बनाई, ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सीएम कैंडिडेट के तौर पर उभर कर सामने आया था. लेकिन पार्टी ने कमलनाथ पर भरोसा दिखाया. जिसके बाद से राज्य की पॉलिटिक्स में ज्योतिरादित्य और कमलनाथ के बीच तनाव चल रहा था.
ग्वालियर में एक जयविलास महल है. ये महल आज़ादी के बाद रजवाड़ो की राजनीति का गढ़ हुआ करता था. ये महल ग्वालियर के आखिरी महाराज जीवाजीराव सिंधिया का था. आज़ादी के बाद ग्वालियर और आस-पास की रियासतों को जोड़कर एक रियासत ‘मध्य भारत’ बनाया गया. मध्य भारत के पहले राजप्रमुख बने जीवाजीराव सिंधिया को. 31 अक्टूबर 1956 को इन शाही रियासतों को मिलाकर मध्य प्रदेश राज्य का निर्माण हुआ.
विजयराजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्य थीं.
विजयराजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्य थीं.

1957 में पूरे देश में चुनाव होने थे. मध्य प्रदेश में भी. मध्य प्रदेश में ग्वालियर रियासत की तूती बोलती थी. इसलिए कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि जीवाजीराव उनके टिकट पर चुनाव लड़े. लेकिन जीवाजीराव राजनीति में नहीं आना चाहते थे. बहुत समझाने-बुझाने के बाद जीवाजीराव की पत्नी राजमाता विजयराजे सिंधिया ने चुनाव लड़ने का फैसला किया. 
विजयराजे सिंधिया ने 1957 के चुनाव में हिंदू महासभा के कैंडिडेट को 60 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया. इस तरह से सिंधिया परिवार लोकतंत्र के अखाड़े में कूदने की शुरुआत हुई. 1960 के दशक की शुरुआत में राजमाता विजयराजे सिंधिया और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा के बीच तनातनी बढ़ गई. 1966 में राजमाता ने कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी. 1967 के चुनाव में वो निर्दलीय लड़ीं और चुनाव जीती भी.
एक साल, कई शुरुआत
1971 का साल सिंधिया परिवार के लिए कई मायनों में खास था. 1971 में राजमाता ने अपने बेटे माधवराव सिंधिया को चुनावी मैदान में उतारा. माधवराव ने गुना सीट से लोकसभा का चुनाव जीत लिया. वे 26 साल की उम्र में सांसद बन गए. 
इसी साल इंदिरा गांधी ने राजपरिवारों को मिलने वाला आजीवन वेतन यानी कि प्रिवी पर्स खत्म कर दिया. राजमाता विजयराजे सिंधिया खूब नाराज़ हुईं. इसी साल सिंधिया परिवार को नया वारिस मिला था. 1 जनवरी 1971 को बॉम्बे में माधवराव के घर ज्योतिरादित्य का जन्म हुआ. वही ज्योतिरादित्य, जिनकी वजह से मध्य प्रदेश की राजनीति में भूचाल आया हुआ है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के करीबी माने जाते रहे है. लेकिन ये करीबी कभी उनके काम नहीं आई.
ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के करीबी माने जाते रहे है. लेकिन ये करीबी कभी उनके काम नहीं आई.

जब 1975 में देश में आपातकाल लगा, राजमाता को कुछ दिनों तक जेल में भी रहना पड़ा. माधवराव किसी तरह से नेपाल भाग गए थे. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में राजमाता ने चुनाव नहीं लड़ा. लेकिन माधवराव ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते भी. 1979 में जनता पार्टी में कलह मची और सरकार गिर गई. 1980 में चुनाव होने थे. इसी दौरान राजमाता को बड़ा झटका लगा. माधवराव सिंधिया ने 1980 में कांग्रेस की सदस्यता ले ली. इसके बाद मां-बेटे में कभी नहीं पटी.
इस वजह से राजमाता विजयराजे और माधवराव सिंधिया में झगड़ा हो गया. ये झगड़ा इतना बढ़ा कि राजमाता ने अपनी वसीयत में से माधवराव को बाहर निकाल दिया. उन्होंने अपनी वसीयत में यहां तक लिख दिया कि माधवराव उनका अंतिम संस्कार नहीं करेंगे.
घर में फूट
1980 के चुनाव में जनता पार्टी की करारी हार हुई. उसी साल भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. राजमाता विजयराजे सिंधिया को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया.
इधर दूसरी तरफ माधवराव सिंधिया अपनी राह चलते रहे. संजय गांधी की मौत के बाद उनकी दोस्ती राजीव गांधी के साथ गहरी होती गई. 1984 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर सीट से दो लाख से अधिक वोटों के अंतर से हराया. राजीव गांधी की सरकार में रेल मंत्री बने. माधवराव सिंधिया 1990 से 1993 तक BCCI के प्रेसिडेंट भी रहे.
एक हवाई दुर्घटना ने माधवराव का जीवन खत्म कर दिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति में आना पड़ा.
एक हवाई दुर्घटना ने माधवराव का जीवन खत्म कर दिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति में आना पड़ा.

उधर माधवराव अपने पॉलिटिकल कैरियर में नई ऊंचाईयां छूते जा रहे थे, इधर ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने जीवन में व्यस्त थे. मुंबई के कैम्पियन स्कूल और देहरादून के दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद वे हार्वर्ड गए. वहां से इकोनॉमिक्स में बीए करने के बाद स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री ली. 
1993 में भारत लौटे. 1994 में उनकी शादी प्रियदर्शिनी राजे से हो गई. 1995 में वे पिता भी बन गए. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लगभग साढ़े चार सालों तक संयुक्त राष्ट्र और मोर्गन स्टेनली जैसे नामी-गिरामी संस्थानों में काम किया.
एक्सीडेंटल नेता
माधवराव सिंधिया 30 सितंबर 2001 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक रैली थी. दिल्ली से एक स्पेशल विमान उड़ा. आठ मुसाफ़िरों को लेकर. लेकिन मैनपुरी पहुंचते-पहुंचते विमान में आग लग गई. और ये विमान भैंसरोली गांव के पास एक खेत में गिर गया. गांववालों ने कीचड़ वगैरह डालकर किसी तरह आग बुझाई. लेकिन किसी भी मुसाफ़िर को ज़िंदा नहीं बचाया जा सका. इस विमान में दिग्गज कांग्रेस नेता और उस वक्त गुना के सांसद माधवराव सिंधिया भी सवार थे.
पिता की अचानक हुई मौत की वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति में आना पड़ा. अगले बरस लोकसभा के उपचुनाव हुए. जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 1 लाख से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की.
2019 में लगातार पांचवी बार सांसद बनने से चूक गए थे ज्योतिरादित्य सिंधिया.
2019 में लगातार पांचवी बार सांसद बनने से चूक गए थे ज्योतिरादित्य सिंधिया.

इसके बाद से गुना सीट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का कब्जा रहा. लगातार चार बार वे गुना से चुनाव जीते. 2014 के मोदी लहर में कांग्रेस पूरे मध्यप्रदेश में सिर्फ दो सीट बचा पाई थी. एक सीट कमलनाथ ने जीती थी, दूसरी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने. 2018 में कांग्रेस ने शिवराज सिंह चौहान को लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया. इसमें ज्योतिरादित्य लीड रोल में थे. वो सीएम बनने के प्रबल दावेदार थे.
2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हीं के एक सिपहसालार के पी यादव  ने उनको चारों खाने चित्त कर दिया. वही के पी यादव जो कभी सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि होते थे और सालभर पहले ही भाजपा में आए थे.
ज्योतिरादित्य सिंधिया की घर वापसी हो रही है या वो बेघर हुए हैं, ये तो आनेवाल वक्त ही बताएगा.


वीडियो: लोकसभा नतीजों में ज्योतिरादित्य सिंधिया को यूपी जीतने के लिए भेजा गया था, गुना भी हार गए

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