'नूर' फिल्म रिलीज हुई है. फिल्में जब बन जाती हैं, तब आप उन्हें रिलीज होने सेनहीं रोक सकते. (जब तक कि आप पहलाज निहलानी या मनसे न हों) सुनील सिप्पी ने येफिल्म डायरेक्ट की है. भूषण कुमार प्रोड्यूसर हैं. 2014 में सबा इम्तियाज़ नाम की एकपाकिस्तानी पत्रकार ने एक किताब लिखी. किताब का नाम था, 'कराची, यू आर किलिंग मी'.ये नॉवेल एक मजाकिया क्राइम थ्रिलर था. लिखने वाली ने पहली ही किताब लिखी थी. उनकाकहना था उनने 'ब्रिगेट जोन्स डायरी' को 'द डायरी ऑफ अ सोशल बटरफ्लाई' के साथ पकायाऔर 'कराची, यू आर किलिंग मी'. लिख डाली. ब्रिगेट जोन्स डायरी 2001 में आई फिल्म है.जो हेलन फील्डिंग के 1996 में आए इसी नाम के नॉवेल पर बेस्ड है. और वो नॉवेल खुदमें जेन ऑस्टेन के 'प्राइड एंड प्रिज्यूडिस' का रीइंटरप्रेटेशन थी. और 'द डायरी ऑफअ सोशल बटरफ्लाई' पाकिस्तान की ही लेखिका मोनी मोहसिन की किताब है. उसी पर विक्रममल्होत्रा को ये फिल्म बनाने की पिनक चढ़ी. इतने नाम पढ़कर आपको लगा होगा कोई महानफिल्म आई होगी. जीएचएएनटीए. ये फिल्म कैसी है? दरअसल ये फिल्म एक खोज का अंत है.खोज इस साल की सबसे बुरी फिल्म की. ये फिल्म अझेल है. शुरू होती है ये दिखाते हुएकि सोनाक्षी सिन्हा अपने जीवन से कितना दुखी हैं. वो एक पत्रकार हैं. नाम उनका नूरहै. नूर रॉय चौधरी. उनके जीवन में कुछ भी ठीक नहीं है. एक न्यूज एजेंसी के लिएवीडियोज करती हैं. जिसे वो जर्नलिज्म कहती हैं. वो कहती हैं तो फिर हम भी मान लेतेहैं. ठीक इसके बाद वो अपनी मुसीबतें बताना शुरू करती हैं. अगले 15 मिनट तक वो वहीबताती रहती हैं. आप चट चुके होते हो. आधे घंटे तक वो यही बताती जाती हैं, अब आपकासब्र अपनी सीमाएं तोड़ चुका होता है. नूर के जीवन का फ्रस्ट्रेशन आपके जीवन मेंप्रवेश कर जाता है. अब तक आपको ये पता चल गया है कि नूर सिंगल हैं. मोटापे सेग्रस्त हैं. मोटापे वाली बात पर रुकिए. फैट शेमिंग से इतर बात है. सोनाक्षी कहीं से'मोटी' नहीं लगतीं. ये फिल्म कई मोर्चों पर फेल हुई है. उसमें सोनाक्षी को 'मोटा'दिखाना भी शामिल हैं. सोनाक्षी को पूरी फिल्म में जितनी बार बढ़ते मोटापे से दुखीकहा है, वो नहीं दिखती हैं इतनी 'मोटी'. ये एक फैक्ट है. इसे स्वीकारा जाना चाहिए.नूर अपने काम से भी खुश नहीं हैं. याद कीजिए आपने फिल्मों में आखिरी बार कब किसीपत्रकार को अपने काम से खुश देखा था? चाहे वो 'सत्याग्रह' की करीना हों. 'अवेडनेसडे' की दीपल शॉ हों या 'मिस्टर इंडिया' की श्रीदेवी हों. ये बिल्कुल ही नएकिस्म का पुराना स्टीरियोटाइप है. लड़की है, तो उससे मीडिया में छोटा काम कराया जारहा होगा. उसमें पोटाश बहुत होगा लेकिन काम सीरियस नहीं होगा. गुलाबी आंखें को बख्शक्यों नहीं देते फिल्म दुखी करती है. कई-कई लेवल पर. मैं ये फिल्म देखने क्यों आया?इस फिल्म को देखने में 175 रुपये बर्बाद हुए. इस फिल्म के लिए सुबह जल्दी जागनापड़ा. फिर गाना बजना शुरू होता है. गुलाबी आंखें जो तेरी देखी शराबी ये दिल हो गया.इस गाने को बख्श दो. इस गाने जितना अत्याचार किसी पर नहीं हुआ है. हमें मानवता केबारे में सोचना चाहिए. हम कब तक इस गाने के कवर सुनेंगे? कब तक इसके रीमिक्स, डीजेमिक्स, तुंबी मिक्स सुनेंगे. क्या ये वो समय नहीं आ गया है जब गुलाबी आंखें रेट्रोमिक्स, गुलाबी आंखें महुआ मिक्स, गुलाबी आंखें झंकार मिक्स, गुलाबी आंखें नगाड़ामिक्स और गुलाबी आंखें डीजे सुरेश मिक्स से मुक्ति मिलनी चाहिए?https://youtu.be/Q8HfELBJSok क्यों यही गाना क्यों? आतिफ असलम ने एक बार इस गानेकी दुर्गति की थी. वो अंत होना चाहिए. इस गाने को सुनते ही मुझे अपनी गलती का एहसासहुआ. टिकट वाले के पास मेरे 175 रुपयों के पांच रुपये बचे हैं. मुझे वो पैसे वापिसले लेने चाहिए. बीच-बीच में 'गुलाबी' शब्द आता है. गुलाबी अगला ब्राजील है. गानाबजता है 'झूम-झूम झन न न बाजे मैया पांव पैजनिया' पीछे से आवाज आती है ब्राजील.गुलाबी... ब्राजील बनेगा. गाना बजेगा 'अरे द्वारपालों उस कन्हैया से कह दो, गुलाबीआंखें जो तेरी देखी...' फिर गाना बजेगा 'कहते हैं खुदा ने इस जहां में गुलाबी आंखेंजो तेरी देखी..' कहानी पर लौटते हैं. नूर अपने काम में बुरी है. उसे लगता है उसेसीरियस न्यूज में जाना चाहिए. न्यूजरूम में बैठे आठ में से दस लड़के-लड़कियों को यहीलगता है. उसकी उम्र तीस छूने को है. उसका बॉयफ्रेंड नहीं है. अब आप कहानी जाननाचाहते हैं. लेकिन बीच में दारू आ जाती है. फिल्म बनाने वालों को किसी ने बता दियाथा कि पत्रकार शराब बहुत पीते हैं. लड़का-लड़की मिलते हैं. शराब पीने लगते हैं. थोड़ाकम मिलते हैं तो बियर पीते हैं. हरी बोतलों से चमकीली पन्नी निकालकर बियर पिलाईजाती है. फिर कनन गिल नज़र आते हैं, आप सोच में पड़ जाते हैं क्या कनन गिल इस फिल्मका भी Pretentious movie reviews करेंगे? कनन गिल बीच-बीच में फंडे देते जाते हैं.कनन जितनी बार भी स्क्रीन पर आते हैं जी जलता है. गले लगाकर रोने का मन करता है. जीकरता है पूछूं "भाई कैसे फंस गया तू यहां?" कनन कहते हैं प्रॉब्लम से दूर जाने सेपर्स्पेक्टिव मिलता है. आपको संदेश मिलता है. बेट्टा अब भी वक़्त है, भाग जा. टिकटवाली से बचे हुए पांच रुपये ले और इतनी दूर निकल जा जहां से कोई तुझे पकड़ भी न पाए.मैं कहानी पर बात करना चाहता हूं. नूर एक सीरियस न्यूज खोज रही होती है. जिस डॉक्टरकी तारीफ़ उसे अपनी खबर में करनी होती है. एक रोज़ उसे पता चलता है वो तो किडनी चोरहै. गरीबों के इलाज के नाम पर किडनी निकाल लेता है. वो एक स्टिंग करती है. लेकिनस्टिंग ऑपरेशन गलत तरीके से कोई और टीप ले जाता है. नूर छूंछे हाथ रह जाती है.नौकरी भी चली जाती है. खतरनाक लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं. एक गरीब की जान भी चलीजाती है. अब नूर के जीवन में फिर सब गलत हो जाता है. लेकिन आपको अब इससे कोई फर्कनहीं पड़ता. आपको अपने पांच रुपये वापस चाहिए. इसके अलावा आपको और कुछ नहीं चाहिए.ऐसा टूटने के बाद नूर वापसी करती है. फिल्म में कोई हीरो नहीं है. फिल्म नायिकाप्रधान है. सब उसे अपने कंधे पर ही ढोना है. उसे ही लड़ना. और लड़कर वापसी के नाम अपरवो जो करती है. देखकर आपकी हंसी छूट जाती है. ये कोई फिल्म है? ये कोई एंडिंग है?ये विशुद्ध बकवास है. जिसे फिल्म के नाम पर परोस दिया गया. अंत में सोनाक्षी सिन्हाका लंबा सा मोनोलॉग है. 'मुंबई, यू आर किलिंग मी' करके वो बोलती जाती है और आप असहजहो जाते हो. इसलिए नहीं कि वो कोई महान सा वक्तव्य है, जिसे सुनकर आपकी आत्मा हिलगई. दरअसल वो इतना फूहड़ है कि आप अगल-बगल वालों के आगे ये दिखाना चाहते हो कि आपइसे सुन भी नहीं रहे हो. ये फिल्म थोड़ी कम बुरी होती अगर ये मोनोलॉग न होता. इसकेबाद भी फिल्म खत्म नहीं होती. निकलते-निकलते आप सोनाक्षी सिन्हा से नफरत करने लगतेहैं. लेकिन उनसे नफरत करने की जरुरत नहीं है. उन्होंने तो अपना काम किया है. गलतीआपकी थी जो आप फिल्म देखने अये. न गए हों तो मत जाइए. ये फिल्म बहुत बुरी है. सालकी सबसे बुरी फिल्मों में से एक. इसे देखने मत जाइएगा.https://www.youtube.com/watch?v=DHuM6C6EyXE फिल्म के अंत में मैं अपने पांच रुपयेवापस लेने गया. सर चेंज नहीं है कहकर टिकट वाली लड़की ने एक रुपये कम दिए. आई हेटमाय लाइफ!!