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नवरत्न IRCTC के साढ़े चार दुख, जिनसे यूजर परेशान हैं

IRCTC और (IRCTC achieve Navratna) पब्लिक का दुख लगभग समानार्थी शब्द हैं. हर यूजर की अपनी कहानी है. शायद ही कोई विरला होगा जो कहे कि IRCTC से कोई दिक्कत नहीं. स्क्रीन के राउंड-राउंड घूमने से लेकर खाने में कॉकरोच तक. ऐसे नवरत्न के साढ़े चार दुख जान लीजिए.

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IRCTC नवरत्न हो गया

कल यानी सोमवार 3 मार्च 2024 को सरकार ने  रेलवे की दो कंपनियों भारतीय रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IRCTC) और इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) को नवरत्न का दर्जा दे दिया. खबर पढ़कर अपन चौड़े में बॉस के पहुचे. आइडिया दिया कि बताते हैं कि किसी भी कंपनी को नवरत्न का दर्जा कैसे मिलता है. बॉस बोले वाह रे होशियार. तुम्हारी ट्रेन लेट है. खर्चा-पानी टीम आज यही बताने वाली है. कुछ और सोचो. अपन ने पूरी होशियारी दिखाई और कहा. IRCTC के बनने की सुखी वाली कहानी बिजनेस वाले बता देंगे. हम पब्लिक का दुख बता देते हैं.

IRCTC और पब्लिक का दुख लगभग समानार्थी शब्द हैं. हर यूजर की अपनी कहानी है. शायद ही कोई विरला होगा जो कहे कि IRCTC से कोई दिक्कत नहीं. स्क्रीन के राउंड-राउंड घूमने से लेकर खाने में कॉकरोच तक. ऐसे नवरत्न के साढ़े चार दुख जान लीजिए. 

(1) ये दुख काहे खत्म नहीं होता- IRCTC का सबसे जाना पहचाना दुख. ऐप और वेबसाइट स्लो तो रहते ही हैं. ऐन मौके पर अटक भी जाते हैं. तत्काल तो आम दिनों में भी ढंग से काम नहीं करता और त्योहारों पर तो क्या ही कहें. आप कितना फास्ट वाईफाई लगा लो, चार लोग बिठा लो. टिकट मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. ऐप के क्रेश हो जाने की और अधबीच में अटक जाने की शिकायतों से सोशल मीडिया पटा रहता है.

IRCTC
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(2) सीट है पर बैठ नहीं पाएंगे- यहां पहले अपना निजी अनुभव बताता हूं. दिल्ली से इंदौर जाने वाली एक ट्रेन में मुझे कभी सीट नहीं मिलती. जब चार महीने पहले ओपन होती थी तब भी नहीं. अब दो महीने में तो कुछ होने से रहा. टिकट विंडो ओपन होते ही वेटिंग आ जाता है. देश के कुछ मार्गों पर तो कनफर्म टिकट मिलना सिर्फ भाग्य की बात है. वहीं रिजर्वेशन काउंटर पर जाकर फॉर्म भरकर कई बार टिकट मिल जाती है.

IRCTC
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(3) ठाकुर नहीं पैसा तो गयो- ये वो वाला दुख है जो सांप-सीढ़ी के 99 वाले फेर जैसा लगता है. मतलब ऐप ओपन ही नहीं हुआ, वेबसाइट पर इरर कोड आ गया तो समझ आता है. मगर आपने पूरे डिटेल भर दिए. पेमेंट भी कर दिया. आपके अकाउंट से कट भी गया मगर टिकट बुक नहीं हुई. आपने दिल पर पटरी रखकर एक बार फिर प्रयास किया. मगर किस्मत फिर भांजी मार गई. पैसा भी गयो और टिकट भी नहीं मिली. दुख इतना भी नहीं है. कटा हुआ पैसा देर से जुड़ता है. मतलब अकाउंट में देरी से वापस आता है.

(4) रिफ़ंड की टिंग-टिंग लेट बजती है- दुख की यात्रा टिकट बुक होने के बाद भी जारी रहती है. मतलब जो आपने यात्रा नहीं करनी और टिकट कैंसिल करवा दी तो पहले तो लंबा फटका लगेगा. नॉर्मल टिकट पर भी स्लीपर में 120 और थर्ड AC में 180 रुपये प्लस जीएसटी लगते हैं. ये चार्जेस तब हैं जब टिकट 48 घंटे पहले कैंसिल हो. उसके बाद तो टिकट का 25 और 50 फीसदी उड़ जाता है. तत्काल टिकट कैंसिल करने का तो पूछिए ही मत. कुछ भी हाथ नहीं आएगा. यहां तलक तो ठीक भी है. मतलब सर्विस पर सर्विस चार्ज समझ में आता है. लेकिन पैसा वापस आने में टाइम लगता है. मैसेज की टिंग-टिंग देर से बजती है.

(5) खाना मत खाना - ये आधा दर्द है क्योंकि हर यात्री इस सर्विस का इस्तेमाल नहीं करता. मतलब सफर में सब्जी-पूड़ी खाने का अपना ही मजा है. मगर यही सफर कभी-कभी अंग्रेजी का Suffer बन जाता है जब आईआरसीटीसी के खाने में कॉकरोच निकल जाता है. यात्रा भले अच्छी रहे मगर खाना तो बेकार निकल गया. माने आधा दुख.

वैसे दुखों की लिस्ट लंबी है मगर आईआरसीटीसी से आसान यात्रा का सुख भी मिला है. हालांकि उसके बारे में खर्चा-पानी में ही पता चलेगा

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