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मोबाइल यूजर्स के बुरे दिन आ गए क्या? बढ़ते सर्विस चार्ज खत्म कर रहे मुफ्त वाली मौज

Google Pay, PhonePe और Paytm ने बिल पेमेंट, मोबाइल रिचार्ज पर सर्विस चार्ज लेना चालू कर दिया है. Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart डिलीवरी चार्ज ले ही रहे हैं. Flipkart और दूसरे ई-कॉमर्स पोर्टल भी ऑफर चार्जेज वसूल रहे. क्या ग्राहकों के मौज वाले दिन खत्म हो गए हैं?

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यूजर्स की मौज खत्म!

तकरीबन एक दशक पहले की बात है. मोबाइल में 1GB डेटा के लिए लगभग 250 रुपये खर्च करने पड़ते थे. कॉलिंग और SMS का प्लान अलग से. फिर Jio के आने से गेम बदल गया. मोबाइल रिचार्ज मुफ्त ही हो गया. यूजर्स को इसकी लत लगी. मगर अब वैसा नहीं है. 250 रुपये महीने के खर्च करने ही पड़ते हैं. टेलिकॉम कंपनियां इसको 350 रुपये प्रति यूजर के हिसाब से ले जाने का टारगेट लेकर चल रही हैं. कुछ ऐसा ही मामला पेमेंट ऐप्स के साथ हो रहा. कुछ साल पहले तक सब कुछ फ्री मिल रहा था. कूपन और कैश बैक भी.

मगर अब मामला उल्टा आहे. हौले-हौले सारे ऐप्स सर्विस चार्ज लेने लगे हैं. मोबाइल रिचार्ज से लेकर बिल पेमेंट तक पर थोड़ा एक्स्ट्रा देना ही होगा. सारी फिनटेक कंपनियों, जैसे Google Pay, PhonePe और Paytm का हाल एक जैसा ही है. क्या यूजर्स के मौज के दिन खत्म हो रहे हैं?

सुख भरे दिन बीते से भईया

कहानी को मोबाइल रिचार्ज से थोड़ा और पीछे लेकर चलते हैं. UPI से पहले जब देश में डेबिट और क्रेडिट कार्ड का जलवा था तब भी बिलिंग पर एक्स्ट्रा पैसा लगता था. बड़े शोरूम और ब्रांड भले ऐसा नहीं करते थे, मगर छोटे और मझोले दुकानदार तो खुलकर पैसा चार्ज करते थे. ऐसा इसलिए क्योंकि बैंक और POS मशीन प्रदाता लेनदेन पर चार्ज लेते थे.

छोटा दुकानदार ये पैसा जेब से नहीं भरना चाहता था. ये वाला चार्ज भले आजकल नहीं दिखता, मगर डेबिट कार्ड पर सालाना चार्ज लगता ही है. बैंक SMS भेजने का भी चार्ज ले रहे हैं. इसका गुणा-गणित भी बड़ा ही आसान है. आम सेविंग अकाउंट से बैंक को कुछ नहीं मिलता, उल्टे ब्याज अलग देना होता है. ऐसे में ATM मशीन, चैक बुक, डेबिट कार्ड जैसी सर्विस के लिए पैसा लिया जाता है.

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यही हाल पेमेंट ऐप्स का भी है. आम यूजर सन्न से कोड स्कैन करके फ़न्न से पेमेंट करता है. इसके आगे बाकी सब नाम का ही है. हालांकि ऐप्स तकरीबन हर तरह की सर्विस मुहैया करवाते हैं, जैसे बीमा, म्यूचुअल फंड, लोन, टिकट, गोल्ड वगैरा-वगैरा. लेकिन असल रौला तो UPI पेमेंट का ही है, वो भी छोटा-छोटा वाला.

2000 रुपये से कम का लेनदेन बहुत ज्यादा है और फिनटेक कंपनियों को हर लेनदेन पर 0.25% जेब से देना पड़ रहा है. PwC की रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2023-24 में UPI लेनदेन पर फिनटेक कंपनियों को 12,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. इनमें से 4,000 करोड़ रुपये, 2000 रुपये से कम वाले लेनदेन पर खर्च हुए. इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यहीं गरारी फंसी है.

2000 रुपये से ऊपर लेनदेन करने वाला यूजर तो फिर भी ऐप्स की दूसरी सर्विस इस्तेमाल कर ही लेता है. मतलब कमीशन का जुगाड है कंपनियों के लिए. मगर उससे कम वाला सिर्फ UPI पेमेंट ही करता है. उसके लिए ऐप सिर्फ पैसे के आवन-जावन से ज्यादा कुछ नहीं है. 

ऐसे में अब कंपनियों ने बेसिक सर्विस पर भी चार्ज लेना स्टार्ट किया. पहले मोबाइल रिचार्ज पर 3 रुपये और अब बिल पेमेंट पर .5 से 1 फीसदी चार्ज लगता है. पढ़ने में ये भले बड़ा फिगर नहीं लगे, लेकिन एक इन्डिकेटर जरूर है कि भविष्य में सर्विस पर चार्ज देना ही होगा.

इसका एक और उदाहरण फूड डिलीवरी ऐप्स और 10 मिनट डिलीवरी ऐप्स हैं. इन्होंने डिलीवरी चार्जेज, प्लेटफॉर्म चार्जेज, हैंडलिंग चार्जेज लेना काफी पहले स्टार्ट कर दिया था. कम प्रोडक्टस मंगाओ तो लो कार्ट जैसे चार्जेज भी हैं. ई-कॉमर्स पोर्टल भी इसी सुर में गाना गा रहे. पैकिंग चार्जेज, फास्ट डिलीवरी तो छोड़िए, ऑफर चार्जेज और कार्ड चार्जेज भी वसूल रहे.

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मगर यूजर को तो लत लग गई है

इसमे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं. लत तो बुरी होती ही है भले अच्छी चीज की ही क्यों न हो. सब कुछ उंगली के इशारे पर मिल रहा है तो हम 30 का दूध 130 में खरीद रहे. नहीं मिलता था तो किराने वाले भईया के पास चले जाते थे. फिनटेक कंपनियों का खर्चा हो रहा है तो वो वसूलेंगी ही. जो वसूल नहीं रही तो आपका डेटा सोने की खदान का काम कर रहा. फैसला आपको करना है. मुफ़्त का चंदन कब तक घिसोगे नंदन. 

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