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आपके 20-30 हजार रुपये के मिडरेंज फोन में ये 5 फीचर्स हों तो ही घमंड करें

Best midrange smartphones guide: मिडरेंज का कौन सा फोन खरीदें? आपकी इसी मुश्किल का हल हमारे पास है. हम आपको बताते हैं कि एक परफेक्ट मिडरेंज स्मार्टफोन लेने के लिए आपको कौन-कौन से फीचर देखने चाहिए.

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मिडरेंज स्मार्टफोन से जुड़ी जरूरी बातें

स्मार्टफोन में तमाम तरह की कैटेगिरी होती हैं. बजट, मिडरेंज, प्रीमियम मिडरेंज, फ्लैगशिप वगैरा-वगैरा. हर यूजर अपने हिसाब से फोन खरीदता है. फिर भी मिडरेंज (best midrange smartphone guide) का अपना भौकाल है. मिडरेंज मतलब 'ना इधर का ना उधर का', ना सस्ता ना महंगा. 20 से 30 हजार की कीमत वाले ऐसे फोन में चांद के पार चलो वाला कैमरा भले नहीं हो लेकिन इंस्टा पर पोस्ट करने वाले फोटो का जुगाड़ होता है. चिपसेट भले भारी-भरकम गेमिंग नहीं कर पाता, फिर भी रोजमर्रा के काम बखूबी कर लेता है. मिडरेंज में रेंज की भी कमी नहीं है. मगर यही सबसे बड़ी दिक्कत भी. माने क्या देखें और क्या नहीं.

कम या ज्यादा हो गया तो? आपकी इसी मुश्किल का हल हमारे पास है. हम आपको बताते हैं कि एक परफेक्ट मिडरेंज स्मार्टफोन लेने के लिए आपको कौन-कौन से फीचर देखने चाहिए.

चिपसेट 'सेट' होना चाहिए

चिपसेट मतलब प्रोसेसर. बोले तो फोन का दिल. अगर ये सही से नहीं धकड़ता तो फिर बाकी अंग कितने भी अच्छे हों, मजा नहीं आएगा. पिछले साल एक कंपनी ने अपने फ्लैगशिप फोन में तीन साल पुराना प्रोसेसर लगाकर सब गुड़-गोबर कर दिया था. इसलिए बढ़िया मिडरेंज स्मार्टफोन के लिए जरूरी है कि उसमें कम से कम Snapdragon 7 gen 2 या फिर MediaTek Dimensity 8200 होना ही चाहिए. इससे पुराने से मामला अपसेट हो जाएगा.

Midrange
चिपसेट
रैम को 'राम-राम'

चिपसेट अगर दिल है तो रैम उसका दिमाग है. जैसे दिमाग शरीर के हर अंग को मैनेज करता है, वैसे ही रैम फोन के हर ऐप को मैनेज करती है. फ्लैगशिप तो 12 जीबी के साथ आते हैं और बजट वाले 6 जीबी के साथ. अब बचा मिडरेंज तो यहां मामला 8GB पर सेटल कीजिए. LPDDR5 से नीचे नहीं जाना है तभी मौज आएगी. LPDDR क्यों चाहिए, वो आप नीचे क्लिक करके जान लीजिए.

RAM
RAM का गेम

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स्टोरेज से ‘गुरेज’ नहीं

स्टोरेज से मतलब 128 और 256 GB से नहीं है. वहां मामला सेट चल रहा. मतलब आजकल बेस मॉडल 126 जीबी के साथ आते हैं. कई कंपनियों ने तो 256 को भी बेस मॉडल बना दिया है. स्टोरेज से मतलब उसकी स्पीड से है. मतलब डेटा का आदान-प्रदान कितना फास्ट होगा. इसके लिए जरूरी है कि वो कम से कम UFS 3.1 होना ही चाहिए. इससे कम हुआ तो फिर डेटा ट्रांसफर के टाइम पर स्क्रीन के ऊपर राउंड-राउंड वाला चक्का देखने को तैयार रहिए.

डिस्प्ले में ‘फ़ाउल’ प्ले नहीं

Amoled डिस्प्ले, वो भी एचडी प्लस रेजोल्यूशन से कम नहीं होना चाहिए. और रिफ्रेश रेट 120 हर्ट्ज़ से कम चलेगा ही नहीं. 90 के फेर में नहीं आना है और 60 हर्ट्ज़ तो नक्को रे बाबा. ऐसा लगेगा कि मानो जिंदगी स्लो मोशन में चल रही है. आईफ़ोन यूजर्स अपने प्रेम के लिए इस बात से खफा हो सकते हैं. मगर एक बार आप भी 120 हर्ट्ज़ पर उंगली फिराकर देखिए, फर्क साफ नजर आएगा.

कैमरा ‘मरा’ हुआ नहीं

50 मेगापिक्सल वो भी OIS के साथ. अगर OIS नहीं है और मेगापिक्सल शतक भी मार रहा तो रहने दीजिए. बिना OIS (Optical Image Stabilization) के जो हाथ हिल भी गया तो फोटू का कबाड़ा हो जाएगा. इसके साथ दूसरा सेंसर अल्ट्रा वाइड होना चाहिए. ये होगा तो मैक्रो लेंस का झंझट भी नहीं.

OIS
OIS Camera

इसके साथ बैटरी 5000 mAh की हो, वो भी फास्ट चार्जिंग के साथ ही मांगता. तभी ‘छतरपुर वाली पंचायत’, मतलब मिडरेंज का मामला सेट होगा.  

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