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"मराठी नहीं आती तो थप्पड़ खाओ", राज ठाकरे के फिर पुरानी राह पकड़ने की वजह जानते हैं?

राज ठाकरे के इस आह्वान को लेकर सियासी हल्कों में खुलकर कुछ नहीं कहा जा रहा. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज महायुति गठबंधन और विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (MVA) ने इन घटनाओं का खुलकर विरोध नहीं किया.

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आखिर राज ठाकरे के मनसे की राजनीति पर बीजेपी चुप क्यों है? (तस्वीर:इंडिया टुडे)

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कार्यकर्ताओं ने बीते दिनों महाराष्ट्र के कई इलाकों मेंं हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया. इन घटनाओं से लग रहा है कि राज ठाकरे अपनी पार्टी की राजनीतिक हालत सुधारने के लिए अपना दशकों पुराना 'मी मराठी' (मैं मराठी हूं) कैंपेन फिर से शुरू करने की कोशिश में जुटे हैं. लेकिन उनकी इन सारी कवायदों को लेकर बीजेपी और विपक्ष दोनों खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं.

'मराठी भाषा नहीं आती तो थप्पड़ पड़ेगा'

राज ठाकरे ने मराठी भाषा की अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर से उठाया है. यानी मुंबई में रहना है तो मराठी बोलनी होगी. मुंबई के शिवाजी पार्क में 30 मार्च को गुड़ी पड़वा रैली आयोजित की गई थी. इसमें राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा,

“अगर मुंबई में कोई कहे कि उसे मराठी नहीं आती, तो उसे थप्पड़ पड़ेगा. देश की बात मत करो. हर राज्य की अपनी भाषा होती है और उसका सम्मान होना चाहिए. मुंबई में मराठी का सम्मान होना चाहिए.”

राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं को कहा कि वे हर बैंक, हर दफ्तर में जाकर चेक करें कि वहां मराठी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है या नहीं. MNS चीफ ने कहा,

“सब लोग मराठी के लिए मजबूती से खड़े हों. तमिलनाडु को देखो, उसने हिंदी को न कहने की हिम्मत दिखाई. केरल ने भी ऐसा ही किया.”

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क्या MNS को BJP का समर्थन हासिल है?

राज ठाकरे के इस आह्वान को लेकर सियासी हल्कों में खुलकर कुछ नहीं कहा जा रहा. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज महायुति गठबंधन और विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (MVA) ने इन घटनाओं का खुलकर विरोध नहीं किया.

देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री होने के अलावा गृह मंत्रालय का भी जिम्मा भी संभालते हैं. उन्होंने 2 अप्रैल को इस मुद्दे पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी. कहा,

“महाराष्ट्र में मराठी की मांग करना गलत नहीं है. सरकार भी मराठी भाषा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल चाहती है. लेकिन अगर कोई कानून अपने हाथ में लेगा तो कानून अपना काम करेगा.”

फडणवीस ने अपने बयान में न तो राज ठाकरे की हरकतों की कड़े शब्दों में निंदा की और न ही उनका समर्थन किया.

पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा कि अब देखने वाली बात होगी कि क्या बीजेपी MNS की राष्ट्रीय बैंकों में मराठी अनिवार्य कराने की मांग का समर्थन करती है.

जबकि शरद पवार की NCP के एक पूर्व मंत्री ने एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, "ऐसा लग रहा है कि MNS को बीजेपी का समर्थन है. बीजेपी इस तरह की राजनीति को बढ़ावा दे रही है जिससे आने वाले BMC चुनाव में दोनों शिवसेना गुटों को कमजोर कर सकें."

MNS की सियासत

राज ठाकरे भले ही BJP के नेतृत्व वाली महायुति गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन वे पार्टी और सीएम देवेंद्र फडणवीस के करीबी माने जाते हैं. लोकसभा चुनाव 2024 में राज ठाकरे की पार्टी ने BJP को अपना समर्थन दिया था. पार्टी ने महाराष्ट्र में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा. लेकिन MVA, यानी विपक्षी खेमा भी इस विवाद पर बहुत संभलकर बयानबाजी कर रहा है. इसके नेता बीजेपी पर तो हमले बोल रहे हैं, लेकिन राज ठाकरे के बयानों और MNS कार्यकर्ताओं की हरकतों पर खुलकर कोई बयानबाजी नहीं कर रहे हैं.

राज ठाकरे ने मार्च 2006 में MNS की स्थापना की थी. उससे पहले वे बाल ठाकरे की शिवसेना में थे. लेकिन अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से मतभेद के कारण उन्होंने अपने लिए अलग राह चुन ली. MNS ने भी शिवसेना की तरह अपनी राजनीति को ‘मराठी माणूस’ के मुद्दे पर केंद्रित किया है.

हालांकि, पार्टी कई सालों से महाराष्ट्र की राजनीति में हाशिए पर है. नवंबर 2024 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 288 में से 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं रही. MNS का वोट शेयर केवल 1.55% रहा. साल 2019 में भी MNS को केवल एक सीट मिली थी, तब उसका वोट शेयर 2.5% था. यानी सीटों के अलावा वोट शेयर में भी झटका लगा है.

राज्य में इस साल के अंत तक बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव होने की उम्मीद है. इसमें हमेशा से शिवसेना का दबदबा रहा है. MNS ने 2017 में 227 में से 7 सीटें जीती थीं. मुंबई में करीब 35% मराठी भाषी लोग हैं, ऐसे में राज ठाकरे ‘मराठी माणूस’ के मुद्दे को फिर से जीवित कर अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटे हैं. 

उधर, बीजेपी BMC चुनाव जीतने के लिए हर संभावनाओं को तलाश रही है. अगर MNS इन चुनावों में मजबूती से लड़ते हुए उद्धव ठाकरे की पार्टी को डेंट लगाने में कामयाब रही, तो यह बीजेपी के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है.

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