नेपाल (Nepal) में इन दिनों एक नारा खूब गूंज रहा है- ‘नारायणहिटी खाली गर, हाम्रो राजा आउँदै छन्.’ यानी नारायणहिटी खाली करो, हमारे राजा आते हैं. नारायणहिटी वह पैलेस है, जहां गणतंत्र से पहले नेपाल के राजा रहते थे. लंबे संघर्ष के बाद 2008 में नेपाल में राजशाही का अंत हुआ और लोकतंत्र आया. तब से बीते 17 सालों में 13 सरकारों ने सत्ता संभाली. लेकिन समय का चक्र फिर ऐसा घूमा है कि अब राजतंत्र की वापसी के लिए नारे लग रहे हैं. नेपाल में बदलाव की ये बयार क्यों चल रही है और अचानक से ऐसा क्या हो गया कि लोगों को राजाशाही सही लगने लगा, जिस पर 17 साल पहले लोकतंत्र का गला घोटने का आरोप लगा था?
तीन-तीन राजा पालने से एक राजा अच्छा... नेपाल में आखिर क्यों जोर पकड़ने लगी राजशाही की मांग?
नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया है. ज्ञानेंद्र शाह पर आरोप लग रहे हैं कि वह विदेशियों की मदद से नेपाल के लोकतंत्र को खत्म करना चाहते हैं. आइए विस्तार से जानते हैं कि आजकल नेपाल में क्या चल रहा है.

6 मार्च 2025 की बात है. नेपाल में टूरिजम के लिए प्रसिद्ध एक शानदार शहर है- पोखरा. पोखरा में एक कार्यक्रम हुआ. यहां पूर्व राजा बीरेंद्र शाह की एक प्रतिमा लगी थी. इसके अनावरण के लिए पूर्व नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र शाह पहुंचे थे. इस दौरान वहां सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद थे. जैसे ही ज्ञानेंद्र शाह ने मूर्ति का अनावरण किया, लोगों ने राष्ट्रगान गाया. लेकिन ये वो राष्ट्रगान नहीं था, जो लोकतांत्रिक देश नेपाल के लोग गाते हैं. ये उस समय का राष्ट्रगान था, जब देश में राजशाही थी. कहा जा रहा है कि इस कार्यक्रम ने नेपाल में राजशाही के समर्थन वाले मौजूदा आंदोलन की भूमिका तैयार की. ज्ञानेंद्र शाह पर भी आरोप लग रहे हैं कि वह इस आंदोलन को हवा दे रहे हैं और अपनी खोई राजसत्ता वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं.
आइए सबसे पहले जानते हैं कि ज्ञानेंद्र शाह ने अपनी सत्ता खोई कैसे? कैसे वह राजा से एक अपदस्थ नरेश की भूमिका में आ गए. उससे पहले ये भी जानते हैं कि ज्ञानेंद्र राजा बने कैसे? ये साल 2001 की बात है. 2 जून की सुबह 11 बजे नेपाल के आधिकारिक रेडियो स्टेशन से खबर प्रसारित की गई कि महाराज बीरेंद्र बिक्रम शाह का निधन हो गया. पूरा देश यह खबर सुनकर स्तब्ध रह गया. घटना से जुड़ी बाकी बातें बाद में सामने आईं. दरअसल, 1 जून की रात राजपरिवार की शाही दावत थी. राजा का पूरा परिवार इसमें जुटा था. इसी दौरान राजा के बेटे दीपेंद्र ने नशे की हालत में बीरेंद्र समेत शाही परिवार के कई लोगों को गोलियों से भून दिया. बाद में उन्होंने खुद भी आत्महत्या कर ली. इस भयानक हत्याकांड से बच गए ज्ञानेंद्र शाह और उनका परिवार. वह राजा के छोटे भाई थे.

ज्ञानेंद्र पर आरोप लगा कि शाही दावत में हत्याकांड के पीछे उनकी साजिश थी. उन्होंने भतीजे के जरिए अपने भाई राजा बीरेंद्र के पूरे परिवार को ही खत्म करा दिया. हालांकि, ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए. इस घटना के बाद 4 जून 2001 को ज्ञानेंद्र नेपाल के राजा बनाए गए. उनके भाई के शासन में ही राजा की शक्तियां सीमित कर दी गई थीं. ऐसे में जब ज्ञानेंद्र राजा बने तो वह सिर्फ राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख की हैसियत रखते थे. उनके पास कार्यकारी शक्तियां नहीं थीं. ताजपोशी के 3 साल बाद उन्होंने शक्ति हथियाने के लिए ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि नेपाल के आखिरी राजा साबित हो गए. राजा को 'न माया मिली, न राम.'
यह भी पढ़ेंः नेपाल में हिंसा के पीछे कौन? क्या गिरफ्तार होंगे Gyanendra Shah?
हुआ ये कि साल 2005 में ज्ञानेंद्र शाह ने नेपाल की सत्ता पर पूरी तरह से कब्जा करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने सरकार और संसद को भंग कर दिया. राजनेताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया. संचार काट दिए और आपातकाल की घोषणा कर दी. देश पर शासन करने की मंशा से ज्ञानेंद्र शाह ने सेना का भी इस्तेमाल किया. इस घटना ने नेपाल में खलबली मचा दी. पूरी दुनिया में नेपाल की चर्चा होने लगी. अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने देश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की.
सत्ता कब्जाने के चक्कर में शाह ने राजनीतिक दलों से दुश्मनी ठान ली. देश की राजनीतिक पार्टियों ने उनके खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया. अप्रैल 2006 में 7 दलों और एक प्रतिबंधित माओवादी पार्टी ने साथ मिलकर उनके शासन के खिलाफ काठमांडू में मोर्चा खोल दिया. जमकर प्रदर्शन हुए. हड़तालें हुईं. राजा और राजनीतिक दलों के बीच कई दिनों तक खूब संघर्ष हुआ. इस दौरान 23 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई. मानवाधिकार संगठनों ने इसे लेकर हल्ला शुरू किया. दबाव बढ़ा तो 24 अप्रैल 2006 को राजा ज्ञानेंद्र ने हार मान ली और संसद बहाल करने पर राजी हो गए. उन्होंने आश्वासन दिया कि पार्टियों की ओर से चुने गए प्रधानमंत्री को वह कार्यकारी अधिकार सौंप देंगे.

24 अप्रैल 2006 को ज्ञानेंद्र ने टीवी पर राष्ट्र के नाम संबोधन दिया. इसमें उन्होंने पिछली संसद को बहाल करने का एलान किया. राजशाही के समर्थक रहे गिरिजा प्रसाद कोइराला को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया. एक साल बाद ही कोइराला के विचार बदल गए. उन्होंने कहा कि ज्ञानेंद्र शाह को पद छोड़ देना चाहिए. 28 मई 2008 को 1990 के संशोधित संविधान में राजशाही को आधिकारिक तौर पर कोई स्थान नहीं दिया गया. संविधान सभा ने 239/4 के बहुमत से राजतंत्र समाप्त कर नेपाल में गणतंत्र की घोषणा कर दी. इसके बाद ज्ञानेंद्र राजा से पूर्व राजा हो गए. उनकी शक्तियां खत्म हो गईं. लिहाजा, 11 जून 2008 को उन्होंने काठमांडू का नारायणहिती पैलेस छोड़ दिया और नागार्जुन पैलेस में शिफ्ट हो गए.
बिशाल ‘सुनार नेपाल’ के फोटो पत्रकार हैं. देश के राजनीतिक बदलावों पर बारीक नजर रखते हैं. वो बताते हैं,
नेपाल में जब एक बार पहले आंदोलन हुआ था तो देश से राजा का एकतरफा शासन हटा और बहुदलीय व्यवस्था आई थी. ज्ञानेंद्र शाह जब राजा हुए तो उन्होंने 7 पार्टियों को प्रतिबंधित कर दिया. शासन की शक्तियां कब्जा लीं और सेना के बल पर डेढ़ साल तक शासन किया. बाद में 7 राजनीतिक दलों ने मिलकर राजसत्ता का अंत किया और गणतंत्र की स्थापना की.
बिशाल आगे बताते हैं,
गणतंत्र की 2-3 महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं. एक तो हिंदु राष्ट्र से हटाकर देश को सेकुलर कर दिया गया. दूसरा संघीय शासन में आ गए. पहले केंद्रात्मक व्यवस्था थी. अब नेपाल में 7 प्रदेश सरकारें हैं. नेपाल में पहली बार संविधान सभा से संविधान जारी किया गया. ये गणतंत्र की बड़ी उपलब्धियां मानी जाएंगी.
यह भी देखेंः Nepal फिर बनेगा हिंदू राष्ट्र? प्रदर्शन में दो की मौत, 100 से ज्यादा घायल

इस घटना को 17 साल बीत गए. इस बीच नेपाल में 13 सरकारों ने सत्ता संभाली. भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया. महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी से लोगों के त्रस्त रहने का सिलसिला खत्म ही नहीं हुआ. बार-बार सरकारों के बदलने से तंग नेपाल के लोगों ने यदा-कदा विरोध में सिर उठाया लेकिन आंदोलन वैसा उग्र नहीं हो पाया कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभाव पैदा कर सके. बिशाल के अनुसार दबी जुबान लोग ये तक कहने लगे कि 7-8 सौ राजाओं से तो एक ही राजा अच्छा था. इस बीच 6 मार्च को नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने पोखरा में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. राजशाही खत्म होने के बाद वह कभी-कभार ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखते हैं. वह राजा बीरेंद्र की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए गए थे. इस दौरान भारी संख्या में उनके समर्थक जुटे थे. उन्होंने न सिर्फ राजा के समर्थन में नारे लगाए बल्कि राजशाही वाला राष्ट्रगान गाकर अपनी मंशा भी जाहिर कर दी. मंशा वही कि ‘नारायणहिटी खाली करो. हमारे राजा आते हैं.’
आरपीपी की भूमिकानेपाल में एक पार्टी है- राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी. इसे राजावादी यानी कि राजशाही समर्थक माना जाता है. कहा जाता है कि इसको ज्ञानेंद्र शाह का सपोर्ट हासिल है. इस पार्टी ने राजशाही की वापसी की मांग को लेकर 29 मार्च को काठमांडू में एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया था. इस प्रोटेस्ट के दौरान कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की खबरें आईं. हिंसा ऐसी हुई कि एक पत्रकार समेत 2 लोगों की मौत हो गई. कई लोग घायल हो गए. इमारतों को आग लगा दी गई. सरकारी वाहनों को भी फूंक दिया गया. सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंके गए. हालात ऐसे हो गए कि पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ा. इसमें आरपीपी के कई नेता गिरफ्तार हुए.
आंदोलन का नेता कौन?
इस आंदोलन को लेकर नेपाल सरकार ने ज्ञानेंद्र शाह पर भी आरोप लगाया कि वह लोगों को भड़का रहे हैं. ज्ञानेंद्र इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं. लोग कह रहे हैं कि पूर्व राजा कम प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन उन्हें जो करना है, वो वह कर रहे हैं. ज्ञानेंद्र सीधे तौर पर इस आंदोलन में शामिल नहीं हैं. ऐसे में सवाल नेतृत्व को लेकर उठता है कि इसके पीछे आखिर है कौन? नेपाल की न्यूज वेबसाइट ‘ऑनलाइन खबर.कॉम’ में स्पेशल करेंस्पॉन्डेंट कृष्ण अधिकारी का कहना है कि अभी जो आंदोलन हो रहा है और इनमें जिन पार्टियों की हिस्सेदारी है, उनके नायक नवराज सुवेदी हैं. वह गणतंत्र से पहले के पावरफुल नेता हैं. कहा जाता है कि राजा ने उनको आंदोलन का कमांडर बनाया है.
वो आगे कहते हैं,
राजा ज्ञानेंद्र का राजनीतिक पार्टियों पर भरोसा नहीं है. देश में कई राजावादी पार्टियां हैं जो राजा को समर्थन देती हैं लेकिन राजा किसी भी पार्टी को पसंद नहीं करते. लेकिन वह नवराज सुवेदी पर भरोसा करते हैं, जो किसी भी पार्टी से सीधा रिश्ता नहीं रखते.
इसके अलावा आंदोलन के पीछे जिसका दिमाग माना जाता है, वो दुर्गा प्रसाई हैं. प्रसाई वही हैं, जिन्होंने हालिया प्रदर्शन के दौरान बैरिकेडिंग तोड़कर अपनी कार संसद भवन की ओर बढ़ाई थी. इसके बाद से ही आंदोलन हिंसक हो गया था. बातचीत में कृष्ण बताते हैं कि कहा जा रहा कि आजकल वो (प्रसाई) आप लोगों की ओर (भारत में) ही हैं. वहां किसी मंदिर से उनके वीडियो सामने आए थे.
कौन हैं दुर्गा प्रसाईआज तक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुर्गा प्रसाई पूर्व माओवादी हैं. उनकी दोस्ती कभी केपी शर्मा ओली और प्रचंड से होती थी. उन्होंने वामपंथी गठबंधन बनाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टियों को एकजुट करने में भी अहम भूमिका निभाई थी. अपने सियासी करियर की शुरुआत में प्रसाई नेपाली कांग्रेस में रहे लेकिन विद्रोह के जमाने में वह सीपीएन माओवादी गुट में शामिल हो गए. उन्होंने माओवादियों का समर्थन किया और राजशाही के खात्मे के लिए चले आंदोलन में भी शामिल रहे. बाद में उन्होंने वामपंथी नेताओं पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाया और उनसे नाता तोड़ लिया. साल 2023 में वह ज्ञानेंद्र शाह के साथ हो लिए. प्रसाई ने कहा कि नेपाल में गणतंत्र फेल हो गया है. इसके बाद उन्होंने नेपाल में फिर से राजशाही की स्थापना के लिए अभियान शुरू कर दिया. मार्च 2025 में संयुक्त जन आंदोलन समिति ने उन्हें 'पब्लिक कमांडर' घोषित कर दिया.

राजशाही की बहाली के इस आंदोलन में भारत पर भी आरोप लगे हैं. पिछले महीने की बात है. 9 मार्च 2025 को धार्मिक प्रवास के बाद ज्ञानेंद्र शाह वापस काठमांडु पहुंचे थे. इस दौरान एयरपोर्ट पर हजारों की संख्या में लोगों ने उनकी अगवानी की थी. बिशाल के अनुसार ये संख्या 7 लाख के आसपास बताई गई. ये लोग भी वही नारे लगा रहे थे- नारायणहिटी खाली करो, हमारे राजा आते हैं. ज्ञानेंद्र के स्वागत में आई इस भीड़ में एक तस्वीर को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया. एक शख्स ने अपने हाथ में ज्ञानेंद्र शाह की तस्वीर ले रखी थी. इसके साथ ही उसके पास एक और पोस्टर था, जिस पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की तस्वीर बनी थी. यह तस्वीर सामने आने के बाद नेपाल में सियासी आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया.

यह भी पढ़ेंः नेपाल में राजशाही आंदोलन चलवा रहा भारत, एक्सपोज कर देंगे- बोले पीएम केपी शर्मा ओली
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के एक नेता विष्णु रिजाल ने सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए ज्ञानेंद्र शाह को जमकर सुनाया. उन्होंने कहा कि पूर्व राजा गद्दी पाने के लिए विदेशियों (भारत) की दलाली कर रहे हैं. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी राजशाही समर्थक आंदोलन में भारत की भूमिका होने का आरोप लगाया है.
ज्ञानेंद्र के स्वागत में योगी की फोटो पर बिशाल ने बताया कि राणा करके एक आदमी है. उसने अपने नेता के साथ योगी की तस्वीर ले रखी थी. आंदोलन में हजारों लोग पहुंचे थे लेकिन तस्वीर एक दिखी थी. यह बड़ा मुद्दा नहीं हैं. नेपाल सरकार के आरोपों पर उन्होंने कहा,
ये लोग अपने दफ्तरों में मार्क्स-लेनिन के फोटो रखते हैं तो कोई बात नहीं. अगर किसी हिंदुत्ववादी ने योगी की फोटो रख ली तो इससे क्या हो गया?
हालांकि, इसे लेकर भारत ने अभी तक कुछ नहीं बोला है. नेपाल में प्रदर्शन पर भी मोदी सरकार ने चुप्पी साधी है.
राजा को वापस क्यों चाहते हैं नेपाली?अब सवाल उठता है कि आखिर नेपाल के लोग अपने देश में गणतंत्र क्यों नहीं चाहते? कृष्ण अधिकारी बताते हैं
नेपाल में गणतंत्र के खिलाफ उतने ज्यादा लोग नहीं हैं. जनयुद्ध के बाद नेपाल में जो सेकुलरिज्म आया था, कहा गया कि नेताओं ने धोखा देकर देश को धर्म निरपेक्ष बना दिया. देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदू हैं. ये लोग चाहते हैं कि देश फिर से हिंदु राष्ट्र हो जाए. ज्यादातर लोग इसी के लिए सड़क पर आए हैं. लोगों को लगता है कि ये व्यवस्था राजा ही ला पाएंगे.
वह बताते हैं कि ये आंदोलन राजशाही के समर्थन से ज्यादा करप्शन और बेकार गवर्नेंस को लेकर है. उन्होंने कहा,
नेपाल में तीन राजनैतिक पार्टियां हैं. नेपाली कांग्रेस, यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट (यूएमएल) पार्टी और माओवादी पार्टी. लोगों का कहना है कि इन तीनों के लीडर्स पुष्प कमल दहल प्रचंड, शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली ने आपस में एक सिंडिकेट जैसा बना लिया है. माओवादी पार्टी के पुष्प कमल दहल 16 साल से सत्ता में हैं. इन तीनों लीडर्स का नेपाल सरकार में सिंडिकेट चल रहा है. जनता इन तीनों लीडर्स से नाराज है, जिसका असर आंदोलन में दिख रहा है. हैं. लोग चाहते हैं कि ये सिंडिकेट टूटे. दूसरा कोई आए. ये 'दूसरा कोई' राजा भी हो सकते हैं.
कृष्ण बताते हैं,
पार्टियों को लेकर लोगों में ऐसा गुस्सा है कि वे कहने लगे हैं कि तीन-तीन राजा पालने से एक ही राजा ठीक है.
विकल्प के सवाल पर उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में जब शेख हसीना का तख्तापलट हुआ, तब यूनुस विकल्प बनकर आए. ऐसे ही हम भी कुछ कर लेंगे. पहले ये लोग (नेपाल सरकार) हटें तो.

बिशाल भी यही बात दोहराते हैं. बिशाल कहते हैं कि इस समय देश में भ्रष्टाचार ऐसा हावी हो गया है कि हर सेक्टर में पॉलिटिक्स घुस गई है. हालात ऐसे हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य किसी भी विभाग में नौकरी के लिए किसी न किसी पार्टी की सदस्यता लेनी पड़ती है. इससे लोगों में गहरा असंतोष है. लोग कहने लगे हैं कि इससे अच्छा तो राजा ही था. हालांकि, वो इनकार करते हैं कि मौजूदा आंदोलन राजशाही के समर्थन में है.
बिशाल ने बताया,
संविधान जब जारी हुआ, तब आरपीपी जैसी कुछ राजशाही से आस्था रखने वाली पार्टियों ने मांग की थी कि सब कीजिए लेकिन राजा को मत हटाइए. राजा के पुरखों ने ही राष्ट्र को एकजुट किया था. इसके अलावा, हिंदु राष्ट्र का दर्जा भी न हटाइए. लेकिन संविधान सभा के अन्य दलों ने इसे अनसुना कर दिया. लोगों को लगता है कि सेकुलर नेपाल में धर्मांतरण के मामले बढ़े हैं. गणतंत्र बनने से लेकर अब तक नेपाल में चर्च पहले से बहुत ज्यादा हो गए हैं. इसलिए लोगों में हिंदु राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी है.

उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी साफतौर पर राजा के शासन के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं. वह भ्रष्टाचार से परेशान हैं और सिर्फ व्यवस्था बदलना चाहते हैं. काठमांडु में जिस तरीके से लोग राजा की अगवानी के लिए जुटे थे, वैसा नेपाल में कभी नहीं हुआ. लोग तो ये भी कह रहे थे कि अगर अगवानी करने गए लोग वहीं पर आंदोलन करने के लिए बैठ जाते तो एक दिन में तख्ता पलट हो जाता. 7 लाख से ज्यादा लोग राजा का स्वागत करने गए थे, जिनमें सियासी कार्यकर्ताओं के अलावा भारी संख्या में आम लोग भी थे. उन्होंने कहा कि सरकार इसी बात पर बौखला गई है. वह आंदोलन को किसी भी हाल में विफल करना चाहती है. माहौल ऐसा बन रहा है कि सरकार को दो तीन बातों पर समझौता करना पड़ सकता है.
बिशाल ने इसकी तुलना महाभारत में पांडवों के पांच गांवों की मांग से की. उन्होंने बताया,
तीन बातों पर समझौता हो सकता है. हिंदु राष्ट्र का दर्जा कायम कर दिया जाए. संवैधानिक राज संस्था वापस लाई जाए और संघीय सरकार को खारिज कर दिया जाए. यानी नेपाल में एक तो केंद्र सरकार हो और दूसरी स्थानीय पालिकाएं हों. प्रदेश सरकारों को हटा देना चाहिए. लोग इन मांगों पर जनमत संग्रह के लिए भी तैयार हैं लेकिन सरकारें इसके लिए तैयार नहीं हैं.
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल के लोगों का कहना है कि लोकतंत्र उनके देश में राजनीतिक स्थिरता लाने में फेल हो गया है. अर्थव्यवस्था खराब है और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार इसके लिए दोषी है. ऐसे में नेपाल के लोग एक संवैधानिक राजतंत्र की मांग करने लगे हैं, जो नेपाल को हिंदू पहचान के साथ संसदीय लोकतंत्र घोषित करे. 50 साल के बढ़ई कुलराज श्रेष्ठ राजशाही के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल रहे थे. अब वो इसे अपनी गलती बताते हैं. उन्होंने कहा कि देश के साथ सबसे बुरी बात यह हो रही है कि यहां बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है और नेता कुछ नहीं कर रहे हैं.
क्या हो सकती है राजा की वापसी?नेपाल में पूर्व राजा के लिए जन समर्थन तो बढ़ रहा है, लेकिन ज्ञानेंद्र के तुरंत सत्ता में लौटने की संभावना अभी नहीं दिखती. इसके लिए संसद में संविधान में संशोधन की जरूरत होगी. वहां राजशाही समर्थकों के पास बहुत कम सीटें हैं. नेपाल के पीएम ओली ने भी राजशाही की वापसी की संभावना को खारिज किया है. उन्होंने पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को चुनाव लड़ने की सलाह दी है. ओली ने कहा कि हमारा संविधान राजाओं को मान्यता नहीं देता. किसी को भी राजशाही की वापसी का सपना नहीं देखना चाहिए.
वीडियो: दुनियादारी: क्या अमेरिका ईरान पर हमला करने वाला है?