महाराष्ट्र के बाद दिल्ली चुनाव ने अब उन अटकलों पर विराम लगा दिया है, जिनमें कहा जाने लगा था कि बीजेपी और RSS के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. 27 साल बाद दिल्ली की सत्ता में बीजेपी की वापसी हुई है. फ्रंट में पिक्चर नरेंद्र मोदी की ही है, लेकिन इस जीत का एकतरफा श्रेय किसी एक को नहीं दिया जा रहा. ना ही बीजेपी बढ़-चढ़कर अपने ‘गाल बजाने’ की कोशिश करती दिख रही है. परंपरागत तौर पर इस बात को सार्वजनिक रूप से कभी स्वीकारा नहीं जाता, लेकिन पार्टी जानती है कि दिल्ली जीतने में संघ की मेहनत की कितनी बड़ी भूमिका रही है. पार्टी इस आपसी समन्वय को सहजतापूर्वक सम्मान भी दे रही है.
दिल्ली में बीजेपी की जीत के पीछे RSS की 'ड्रॉइंग रूम मीटिंग्स'!
यह कहना गलत नहीं होगा, कि इस बार दिल्ली में बीजेपी के साथ-साथ संघ ने भी पैरलल प्रचार अभियान चलाया. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और संघ के बीच जो दूरियां दिख रही थीं, उन्हें पीछे छोड़ दिया गया था.

दिल्ली चुनाव में बीजेपी के प्रचार अभियान की खूब तारीफ की जा रही है. लाज़मी भी है, पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है. निश्चित तौर पर इस जीत के पीछे पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत है, लेकिन संघ प्रचारकों ने भी दिन-रात एक किया है. दिल्ली में RSS के कार्यकर्ताओं ने माइक्रो लेवल पर प्रचार किया. इसके लिए एक नया टर्म ईजाद किया गया- 'ड्रॉइंग रूम मीटिंग्स'. बताया जा रहा है कि दिल्ली में संघ के कार्यकर्ताओं ने 60 हजार से ज्यादा ड्रॉइंग रूम मीटिंग आयोजित कीं. ये बैठकें मुहल्लों, दफ्तरों, शॉपिंग कॉम्लेक्स जैसी जगह पर केंद्रित थीं. संघ के लोगों ने घर-घर जाकर लोगों को इस बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की सिर्फ बीजेपी ही 'राष्ट्रहित' में काम कर सकती है.
इतना ही नहीं, संघ ने बूथवाइज़ कैंपेनिंग की स्ट्रैटेजी भी अपनाई. डेटा बेस तैयार किया गया और अलग-अलग क्षेत्रवासियों, जातियों, समूहों के लिए अलग तरह के प्रचार को डिज़ाइन किया गया. चुनाव के दौरान RSS से जुड़े सूत्र बताते हैं कि संघ ने सिर्फ प्रचार में ही नहीं मतदान के दिन भी अहम भूमिका निभाई. संघ के कार्यकर्ताओं ने यह भी सुनिश्चित किया कि बीजेपी समर्थक अपने घरों से निकलें और वोट करें.
महाराष्ट्र चुनाव के दौरान भी संघ की सक्रियता देखने को मिली थी. लेकिन जितना ज़ोर संघ ने दिल्ली में लगाया, उतना महाराष्ट्र में भी देखने को नहीं मिला. संघ और बीजेपी की राजनीति को नज़दीक के देखने वाले भानुचंद्र नागार्जन कहते हैं,
“महाराष्ट्र में संघ ने करीब 75 हजार छोटी-छोटी सभाओं में बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार किया था. लेकिन महाराष्ट्र के मुकाबले काफी छोटी दिल्ली में संघ ने 62 हजार स्मॉल मीटिंग्स कीं. संघ हर हफ्ते रिव्यू मीटिंग करता था और हर हफ्ते प्रचार की स्ट्रैटेजी में जरूरी बदलाव किए गए.”
यह कहना गलत नहीं होगा, कि इस बार दिल्ली में बीजेपी के साथ-साथ संघ ने भी पैरलल प्रचार अभियान चलाया. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और संघ के बीच जो दूरियां दिख रही थीं, उन्हें पीछे छोड़ दिया गया था. हालांकि, RSS के एक शीर्ष नेता ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा कि संघ सिर्फ लोकमत परिष्कार अभियान चला रहा है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रहित में लोगों को जागरुक करना है. उन्होंने कहा कि बीजेपी का अपना संगठन है, जिसकी बदौलत उन्हें जीत मिली. जाहिर है, संघ में ऐसी परंपरा रही है कि जीत का श्रेय नहीं लिया जाता.
इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक संघ ने दिल्ली को 8 'ज़ोन' में बांटा है. यह एक स्थाई व्यवस्था है. ये सभी ज़ोन 30 जिलों और 173 नगरों को मिलाकर बनाए गए थे. रिपोर्ट के मुताबिक जब चुनाव की तारीखों का एलान भी नहीं हुआ था, तब से संघ ने सभी ज़ोन्स में प्रचार शुरू कर दिया था.
पिछले साल नवंबर में दिल्ली चुनाव को लेकर बीजेपी और संघ की बैठक हुई थी. इसमें संघ के सह सरकार्यवाहक अरुण कुमार और दिल्ली में बीजेपी के प्रभारी बैजयंत पंडा और प्रदेश अध्यक्ष विरेंद्र सचदेवा भी मौजूद थे. द हिंदू की पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इसी बैठक में यह तय हो गया था कि दिल्ली में बीजेपी सीएम पद का चेहरा घोषित नहीं करेगी, और नए चेहरों को मौका दिया जाएगा.
यानी इस बार बीजेपी ने अपने फैसलों में भी संघ को उचित सम्मान देने की कोशिश की. इस बैठक में एक और अहम फैसला लिया गया. सूत्र बताते हैं कि इसमें दलित वोटों को लेकर चर्चा की गई थी और उनको दो भागों में बांटा गया था. पहला झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले दलित और दूसरे शहरी बस्तियों में रहने वाले दलित. सूत्र बताते हैं कि इस बैठक में बस्तियों में रहने वाले दलितों पर फोकस करने की रणनीति बनाई गई थी. नतीजा ये रहा कि बीजेपी ने 12 में से 4 आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की. जबकि पिछले दो चुनावों में पार्टी को एक भी आरक्षित सीट नहीं मिल रही थी.
द प्रिंट से बात करते हुए दिल्ली में बीजेपी SC मोर्चा के अध्यक्ष मोहन लाल गिहारा ने कहा,
लोकमत परिष्कार अभियान"हमने 2015 विधानसभा चुनावों के बाद पहली बार 12 में से 4 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की है. लेकिन इसके अलावा, हमें केंद्रीय नेतृत्व द्वारा 30 अन्य सीटों की जिम्मेदारी भी दी गई थी, जहां अनुसूचित जाति (SC) की आबादी 17% से 44% के बीच है. हम इन्हें SC-बहुल सीटें कहते हैं. इन 30 सीटों में से हमने 18 सीटें जीती हैं, जो एक बड़ी सफलता है."
पूरे देश की तरह दिल्ली में भी संघ ने लोकमत परिष्कार अभियान के बैनर तले प्रचार किया. भारतीय मजदूर संघ (BMS), सेवा भारती, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ, हिंदू जागरण मंच जैसी इकाइयों के हजारों कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में मोर्चा संभाला और लोगों को आम आदमी पार्टी की खामियां गिनवाईं. संघ के अनुषांगिक संगठनों ने प्रेस प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और कॉन्स्टिट्यूनश क्लब ऑफ इंडिया में कई प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं. सूत्रों के मुताबिक इनमें बीजेपी के नाम पर प्रचार नहीं किया जाता था, लेकिन लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाती थी कि AAP उनका हित नहीं कर सकती.
संघ से जुड़े एक सूत्र ने प्रचार को एक छोटे से उदाहरण से समझाया. शिक्षा से जुड़ी इकाई ने शिक्षकों के समूह में प्रचार किया. लेकिन उनका प्रचार सिर्फ शिक्षकों तक ही सीमित नहीं रहा. स्कूलों में बच्चों को माता-पिता को इकट्ठा कर प्रचार किया गया और उन्हें अपने तरीके से जागरूक किया गया. इसी तरह संघ की अलग-अलग इकाइयों ने अपने संगठन से या उस क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच प्रचार किया.
मुख्यमंत्री पद में भी संघ की चलेगी?अलग-अलग राज्यों में मोहन यादव, भजन लाल, विष्णु देव साय, रघुबर दास जैसे तमाम नाम हैं जिन्हें बीजेपी ने सारे कयासों को धता बताते हुए मुख्यमंत्री बनाया है. अब दिल्ली में चुनाव जीतने के बाद प्रवेश वर्मा, मनोज तिवारी, विजेंद्र गुप्ता समेत कई नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री की रेस में हैं. लेकिन सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री के चुनाव में भी संघ को तवज्जो दी जाएगी, जैसे पहले दी जाती थी. इस पर निस्तुला हेब्बर कहती हैं,
"दिल्ली में भी बाकी राज्यों की तरह एक कम चर्चित नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकता है. संघ से राय जरूर ली जाएगी, लेकिन इसका मतलब ऐसा बिल्कुल नहीं है कि संघ की पसंद का ही मुख्यमंत्री बनेगा."
दरअसल, नरेंद्र मोदी-अमित शाह के दौर से पहले चाहे किसी राज्य का मुख्यमंत्री हो या बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव, संघ की सहमति लगभग अनिवार्य होती थी. लेकिन 2014 के बाद से इस परंपरा में परिवर्तन देखा गया है. लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और संघ की बयानबाजी ने दोनों के बीच घटते समन्वय की खबरों को तूल दिया था. लेकिन दिल्ली चुनाव तक परिस्थितियों में काफी बदलाव आ चुका है. इंडिया टुडे के सीनियर स्पेशल करस्पॉन्डेंट हिमांशु शेखर कहते है,
"इस बार दिल्ली के मुख्यमंत्री के चुनाव में संघ की अहम भूमिका हो सकती है. ऐसा करके बीजेपी संघ की असंतुष्टियों पर विराम लगाने की कोशिश कर सकती है."
फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच दिन के विदेश दौरे पर हैं. दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, इस बात से पर्दा उठने में अभी कम से कम पांच दिन का वक्त लग सकता है.
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