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ब्रिटिश नागरिकों की हत्या के मामले में 6 आरोपी बरी, गुजरात हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को जारी रखा

Gujarat High Court ने कहा कि आरोपियों की ठीक से पहचान नहीं की गई. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश उच्चायोग को भेजे गए एक गुमनाम फैक्स मैसेज से जांच की शुरुआत हुई थी.

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गुजरात हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को जारी रखा है. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

2002 के गोधरा दंगों (Godhra Riots) के बाद गुजरात के प्रांतिज में चार लोगों की हत्या हुई थी. इनमें से तीन ब्रिटिश नागरिक थे. 2015 में एक स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में छह आरोपियों को बरी कर दिया था. अब इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट का फैसला आया है. उन्होंने सेशन कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है. हाईकोर्ट ने आरोपियों को बरी करने का कारण भी बताया है. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश उच्चायोग को भेजे गए एक गुमनाम फैक्स मैसेज से जांच की शुरुआत हुई थी.

2015 में हिम्मतनगर, साबरकांठा जिले की स्पेशल कोर्ट ने आरोपियों को बरी किया था. गोधरा ट्रेन जलने के बाद, नौ बड़े दंगों के मामलों की तेजी से जांच के लिए इस कोर्ट को बनाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए आदेश दिया था. ब्रिटिश नागरिक इमरान दाऊद, इस मामले के लिए एक जीवित गवाह हैं. उन्होंने स्पेशल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील की थी. 

हाईकोर्ट के जस्टिस एवाई कोगजे और जस्टिस समीर जे डेव की डिवीजन बेंच ने मार्च 6 को अपना आदेश दिया था. हाल ही में इसे सार्वजनिक किया गया है.  इस आदेश में कई अन्य मामलों के फैसलों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर विचार किया गया. साथ ही 81 गवाहों की गवाही को भी ध्यान में रखा गया. 

लाइव एंड लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात हाईकोर्ट ने ये भी माना कि आरोपियों की पहचान के लिए ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (TIP) नहीं किया गया था. साथ ही ‘डॉक आइडेंटिफिकेशन’ का काम भी छह साल के बाद किया गया. ‘डॉक आइडेंटिफिकेशन’ का मतलब है- कोर्ट में गवाहों की ओर से आरोपी की पहचान करना. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,

जिस तरह से आरोपियों का ‘डॉक आइडेंटिफिकेशन’ किया गया, वो उन्हें दोषी ठहराने के लिए जरूरी तथ्य नहीं हो सकता. इस मामले की जांच की शुरुआत स्वतंत्र चश्मदीद गवाह के साक्ष्य पर आधारित नहीं थी. बल्कि ब्रिटिश उच्चायोग को भेजे गए एक गुमनाम फैक्स मैसेज पर आधारित थी. इसी में आरोपियों के नाम बताए गए थे.

कोर्ट ने ये भी कहा कि शिकायतकर्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आरोपी को भीड़ के एक हिस्से के रूप में पहचाना था. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया. कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 9 के तहत ‘डॉक आइडेंटिफिकेशन’ को पूर्ण साक्ष्य मानने से पहले कोर्ट को जरूरी सुरक्षा उपायों पर ध्यान देना होता है.

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क्या है पूरा मामला?

28 फरवरी, 2002 को शिकायतकर्ता इमरान अपने दो चाचा सईद सफीक दाऊद और सकील अब्दुल दाऊद के साथ थे. उनके साथ उनके गांव के मोहम्मद अस्वत उर्फ ​​नल्लाभाई अब्दुलभाई असवार भी थे. ये सभी ब्रिटिश नागरिक थे. ये लोग आगरा और जयपुर से अपनी यात्रा पूरी करके अपने ड्राइवर यूसुफ के साथ कार से वापस आ रहे थे.

शिकायत के अनुसार, शाम के करीब 6 बजे हाईवे पर हाथों में लाठी-डंडे और धारियां (धारदार हथियार) लिए लोगों की भीड़ थी. बताया गया कि भीड़ ने उनकी गाड़ी को रोक लिया और उन पर हमला कर दिया. सवारियों ने भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने मोहम्मद असवार के सिर पर वार किया. ड्राइवर भी गंभीर रूप से घायल हो गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई. शिकायत में ये भी कहा गया कि भीड़ ने जीप में आग लगा दी.

भीड़ ने जब पीछा किया तो शिकायतकर्ता के दोनों चाचा पास के खेतों की ओर भाग गए. शिकायतकर्ता और उनके रिश्तेदार मोहम्मद असवार घायल हो गए. पुलिस की गश्ती वैन मौके पर पहुंची और दोनों को अस्पताल ले जाया गया, जहां मोहम्मद असवार को मृत घोषित कर दिया गया. खेतों की ओर भागे सईद और सकील का कुछ पता नहीं चल पाया.

इसके बाद 24 मार्च, 2002 को तत्कालीन ब्रिटिश उप उच्चायुक्त को एक गुमनाम फैक्स मिला. इसमें एक आरोपी- प्रवीणभाई जीवाभाई पटेल का नाम लिया गया था. आरोप लगे कि उसने 50-100 लोगों की भीड़ के साथ मिलकर उन लोगों की हत्या कर दी.

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