अब मन में सवाल ये आता है कि आखिर इन दोनों सिलेंडरों के दामों में इतना अंतर कैसे है? ये भी कि इन दोनों सिलेंडरों में फर्क क्या होता है और इनके इस्तेमाल का नियम-कायदा क्या है? LPG सिलेंडर की कीमत कैसे तय होती है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको गैस सिलेंडर की कीमत निर्धारित करने का गणित समझना पड़ेगा. सरकार सीधे तो गैस उपलब्ध कराती नहीं है. इसका जिम्मा उसने ऑयल एंड गैस कंपनियों को दे रखा है. वही गैस कंपनियां जिनके नाम के सिलेंडर आपकी पड़ोस वाली गैस एजेंसी से आते हैं. जैसे इंडेन, एचपी और भारत गैस. ये कंपनियां गैस खरीदती हैं और जरूरतमंदों को उपलब्ध कराती हैं.
एपीजी की कीमतों का बेसिक फॉर्मूला इंपोर्ट पैरिटी प्राइस का है. ये प्राइस अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमत के हिसाब से तय होता है. मिसाल के तौर पर देश में सऊदी अरब की कंपनी आरामको से गैस का आयात किया गया. इसमें गैस की कीमत के अलावा उसे ठिकाने तक पहुंचाने की कीमत, इंश्योरेंस, कस्टम ड्यूटी और पोर्ट ड्यूटी जैसे चार्ज भी जुड़ते हैं. सारा धंधा डॉलर की कीमत पर होता है. ऐसे में इस बात का असर भी पड़ता है कि रुपए के एवज में डॉलर का प्राइस क्या चल रहा है.
इस तरह से तेल पहुंचने के बाद देश के भीतर उसे लाने-ले जाने का खर्चा अलग से जुड़ता है. इस पर कंपनी अपनी मार्केटिंग कॉस्ट, सिलेंडर भरने की कीमत, डीलर का कमीशन, जीएसटी के अलावा कुछ मुनाफा जोड़ती है. ये सब मिलाकर एलपीजी सिलेंडर की रिटेल कीमत निकलती है. कीमतें तय करने में सरकार का क्या रोल होता है? बस इतना होता है कि कीमतों पर काबू रखे. जब कीमत ज्यादा बढ़े तो हस्तक्षेप करे. अपनी जेब ढीली करे और आम जनता को महंगी गैस की मार से बचा ले. इसका तरीका सब्सिडी देना है. फिलहाल सरकार ने जो फॉर्म्यूला अपनाया है वो डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का है. मतलब आप सिलेंडर बिना सब्सिडी के रेट पर खरीद लें और सरकार आपके खाते में सब्सिडी का पैसा डाल देती है.
एलपीजी सिलेंडर की कीमत हर राज्य और यहां तक शहरों में भी अलग-अलग हो सकती है. इसका कारण है कि गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने वाली एजेंसी अपने खर्चे जोड़ कर सिलेंडर उपलब्ध कराती है.
जहां तक बात सब्सिडी की है तो इसका अमाउंट भी हर महीने की पहली तारीख पर रिवाइज़ होता है. इसका कारण है अंतरराष्ट्रीय मार्केट में एलपीजी की बदलती कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपए का मूल्य. मतलब अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ या इंटरनेशनल मार्केट में तेल के दाम बढ़े तो आपकी सब्सिडी घटेगी.

घरेलू LPG सिलेंडर पर सरकार सब्सिडी देती है.. (सांकेतिक फोटो-PTI)
कमर्शियल सिलेंडर इतना महंगा क्यों होता है? अब आते हैं कमर्शियल सिलेंडर पर. चूंकि इसका इस्तेमाल घरेलू उपभोक्ता यानी आम जनता नहीं करती, इसलिए इस पर सब्सिडी नहीं दी जाती. गैस उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भी जानती हैं कि ये खुले बाजार का मामला है, इसलिए सिलेंडर पर अच्छा मुनाफा कमाना चाहती हैं. सरकार इनकी कीमतों में हस्तक्षेप नहीं करती, इस वजह से कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर हमेशा घरेलू सिलेंडर से महंगा होता है. कमर्शियल सिलेंडर कौन इस्तेमाल करता है? जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि एलपीजी गैस सिलेंडर उपभोक्ताओं को दो तरह से उपलब्ध कराया जाता है. एक घरेलू इस्तेमाल के लिए और दूसरा कमर्शियल इस्तेमाल कि लिए. कमर्शियल गैस सिलेंडर साइज़ में बड़ा होता है और इसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों जैसे होटलों, ढाबों और सार्वजनिक भोजनालयों आदि में होता है. इसके दाम बढ़ने का असर सबसे पहले होटल और रेस्टोरेंट के खाने के दाम पर पड़ता है. कमर्शियल सिलेंडर की बढ़ी कीमत से बाहर का खाना महंगा हो सकता है. इसके अलावा शादी-बरात में खाना बनाने के लिए भी नियमानुसार कमर्शियल सिलेंडर का ही इस्तेमाल किया जाता है. कीमत बढ़ने का असर शादी-ब्याह जैसे कामों पर भी पड़ता है. सीज़न में शादी करने का खर्चा बढ़ा जाता है.

रेस्टोरेंट में खाना बनाने के लिए कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल होता है. (तस्वीर: PTI)
क्या कमर्शियल सिलेंडर को शक्ल-सूरत से पहचान सकते हैं? जी हां, इसे शक्ल से ही अलग से पहचाना जा सकता है. वजन के हिसाब से भी ये अलग होते हैं. घरेलू सिलेंडर में जहां 5 किलो और 14.2 किलो के साइज़ में आते हैं. वहीं कमर्शियल सिलेंडर तीन वजन कैटेगिरी - 5 किलो, 19 किलो और 47.5 किलो की कैटेगिरी में आता है. घरेलू सिलेंडर पूरा लाल रंग का होता है जबकि कमर्शियल सिलेंडर नीले रंग का होता है.

घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर को दूर से देख कर ही पहचाना जा सकता है. घरेलू सिलेंडर लेफ्ट साइट में दिख रहा है और कमर्शियल राइट साइड में.
साल में कितने सिलेंडर ले सकते हैं? हर साल सरकार 12 घरेलू सिलेंडरों पर सब्सिडी देती है. अगर किसी को 13वां सिलेंडर लेना है तो उसे सब्सिडी नहीं मिलेगी. मतलब उसके हिस्से की सब्सिडी उसके बैंक अकाउंट में नहीं जाएगी. पहले ये नियम भी था कि हर महीने एक सिलेंडर ही मिलेगा. लेकिन 2014 में इस नियम को खत्म कर दिया गया. अब आपको साल में 12 सिलेंडर मिलेंगे चाहें जब ले लें. (ये खबर
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कमर्शियल सिलेंडर को लेकर ऐसा कोई नियम नहीं है. जब चाहें एजेंसी पर जाकर पैसा भरिए और सिलेंडर हाजिर.