रामनवमी के मौके पर अयोध्या के राम मंदिर में हिंदू भगवान राम के बाल स्वरूप का सूर्य तिलक किया गया. इस नजारे को पूरी दुनिया ने देखा. ये कोई आर्टिफिशियल रौशनी से किया गया तिलक नहीं था, बल्कि साइंस की मदद से असली सूर्य की किरणों को 'रामलला' के ललाट तक पहुंचाया गया. लोगों में ये जानने की उत्सुकता है कि आखिर मंदिर की तीसरी मंजिल से पहले तल तक सूर्य की किरणों को कैसे लाया गया (Ram Mandir Surya Tilak science). इसके विस्तृत जवाब में एक नाम आता है पंडुब्बी का.
रामलला के सूर्य तिलक के पीछे का साइंस 'पंडुब्बी' है
Ram Mandir Surya Tilak science: लोगों में ये जानने की उत्सुकता है कि आखिर मंदिर की तीसरी मंजिल से पहले तल तक सूर्य की किरणों को कैसे लाया गया. इसके विस्तृत जवाब में एक नाम आता है पंडुब्बी का.

बोले तो?
बोले तो जिस तकनीक से पनडुब्बियां पानी के भीतर से ही सतह की निगरानी करती हैं, उसी तरह की तकनीक 'रामलला' के सूर्य तिलक के लिए भी इस्तेमाल की गई थी. इस काम के लिए कई एक्सपर्ट्स की मदद ली गई. इनमें भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (Indian Institute of AstroPhysics) के वैज्ञानिक भी शामिल हैं. मकसद था 17 अप्रैल की दोपहर 12 बजे सूरज की किरणें 'रामलला' के ललाट पर गिरें.
राम मंदिर अभी पूरी तरह बना नहीं है, इसलिए सूर्य तिलक के साइंस यानी तकनीक में कम या ज्यादा बदलाव संभव है. इस बार थोड़ा इस काम के लिए 4 दर्पण और 2 लेंस का इस्तेमाल किया गया.
'रामलला' के सूर्य तिलक के लिए एक उपकरण की मदद ली गई है. इसको साइंस की भाषा में कहते हैं, पेरीस्कोप. इसी उपकरण के जरिये पनडुब्बियों में बैठे नौसैनिक अंदर से ही पानी की सतह के बाहर के माहौल का मुआयना करते हैं. इस तकनीक में अहम भूमिका निभाते हैं उपकरण में लगे दर्पण (Mirror) और लेंस. मिरर का काम है रौशनी को आगे भेजना और लेंस का काम है रौशनी को होल्ड करके रखना. जितना अच्छा लेंस होगा उतने अच्छे से प्रकाश की तीव्रता उसमें कैप्चर होगी और मिरर पर रिफ्लैक्ट होगी.
दरअसल, जब भी दर्पण से टकराकर लाइट आगे ट्रांसपोर्ट होती है यानी दूर तक जाती है तो उसकी तीव्रता कम हो जाती है. आम भाषा में कहें तो लाइट थोड़ा ‘डिम’ हो जाती है. लाइट की इस तीव्रता को बरकरार रखने का काम करता है लेंस. इससे लाइट ऑब्जेक्ट पर चमक के साथ पड़ती है.
चूंकि राम मंदिर तीन मंजिला है, इसलिए सूरज की किरणों को तीसरी मंजिल से ही कैप्चर करके आगे भेजने की जरूरत थी. इसलिए एक्सपर्ट्स ने 4 मिरर और 4 ही लेंसेज की मदद ली. इन्हें अलग-अलग विशेष ऐंगलों पर इस तरह सेट किया गया प्रकाश सभी दर्पणों से गुजरते हुए अंत में मूर्ति के माथे पर जाकर टिक जाए.
इस काम के पीछे के साइंस के बारे में भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव अभय करंदीकर ने X पर बताया है. उन्होंने बाकायदा चित्रों और ग्राफिक्स की मदद से बताया है कि कैसे सूर्य की रौशनी को अलग-अलग मिरर और लेंस के जरिये मूर्ति तक ट्रांसपोर्ट किया गया.


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इस काम के लिए साइंटिस्ट्स की टीम ने सोलर ट्रैकिंग की तकनीक का भी इस्तेमाल किया. इसके लिए स्पेशल गियर बॉक्स भी लगाया गया है, जो इस काम में मदद करेगा. सोलर ट्रैकिंग को सूरजमुखी के फूल से भी समझ सकते हैं. जैसे वो सूरज की तरफ मुड़ जाता है वैसा ही कुछ सोलर ट्रैकिंग में होता है. जाहिर है ये काम अपनेआप नहीं होगा, सेटिंग बिठानी होगी. यानी दर्पणों की दूरी, उनके बीच का कोण और लेंस कहां पर रखे जाएं कि सूर्य तिलक की जगह और समय रामनवमी के हिसाब से हो.
राम मंदिर के लिए जो विज्ञान लगाया गया है उसमें हर साल रामनवमी की तारीख के हिसाब से सूर्य प्रकाश को कैप्चर करने की तकनीक में बदलाव किया जाएगा. इसकी एक वजह तो ये कि राम मंदिर अभी भी बन रहा है और दूसरी, अंग्रेजी कैलेंडर में रामनवमी हर साल अलग-अलग तारीख पर पड़ती है.
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