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सूफी संत सरमद, जिनकी औरंगज़ेब ने गर्दन उड़ा दी और वो अपना सर लेकर नाचने लगे

जिन्हें मारने के बाद औरंगज़ेब को हर तरफ ख़ून ही ख़ून नज़र आने लगा था.

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यह लेख डेली ओ से लिया गया है. जिसे लिखा है अमित रंजन ने.  दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


औरग़ज़ेब को हमेशा इसी बात का डर सताता रहता कि मरा हुआ दारा, ज़िंदा दारा से ज़्यादा ताकतवर और अधिक प्रसिद्ध होगा. उसकी हत्या करे न करे इस बारे में कोई शक उसके मन में नहीं था. चाहे वो कोई भी होता मारना तो उसे था ही. क्योंकि औरंगज़ेब अपने आसपास अपना कोई रकीब नहीं रखना चाहता था. वह 1661 का साल था. दारा शिकोह मर चुका था. अब सरमद की बारी थी. वो नंगा फकीर दारा का दोस्त भी था और उसका गुरु भी. उसने भविष्यवाणी की थी कि युद्ध जीतने के बाद सिंहासन दारा को ही मिलेगा. औरंगज़ेब इस बात को अच्छे से जानता था कि सरमद जैसे लोकप्रिय व्यक्ति का सिर काटना इतना आसान नहीं होगा. सरमद पर किसी न किसी तरह के गंभीर आरोप लगाने होंगे तभी ये संभव हो पाएगा. औरंगजेब ये भी जनता था कि सरमद अगर एक बार पूछताछ के लिए आ गया तो आगे की बाक़ी चीज़ें आसान हो जाएंगी. फकीर को ख़त्म करना आसान हो जाएगा. बल्कि वो अपने आप ख़त्म हो जाएगा.

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फकीर को पूछताछ के लिए बुलाया गया. औरंगज़ेब ने उससे दारा की जीत की भविष्यवाणी के बारे में पूछा जो एक बार सरमद ने की थी. उस भविष्यवाणी की याद दिलाई उसे और पूछा- 'तुमने जो कहा था हुआ उसके उलट. अब क्या कहते हो?' सरमद ने जवाब दिया- 'मैंने ये नहीं कहा था कि वो इस दुनिया का शहंशाह बनेगा। मैंने तो आने वाली दुनिया के बारे बात की थी. वो उस दुनिया का शहंशाह होगा.' सरमद को अपनी वफादारी दिखाने के लिए कलमा पढ़ने के लिए कहा गया- 'ला इलाही इलल्लाह, मुहम्मद उर रसूलल्लाह' मतलब अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ईश्वर  नहीं है. और मोहम्मद उस ईश्वर के दूत हैं. लेकिन फकीर ने पूरा कलाम नहीं पढ़ा और सिर्फ इतना कहा- 'ला इलाह' मतलब 'ईश्वर नहीं है'. काज़ी ने लोगों को चीख-चीख कर ये बात बताई - 'देखो, तुम्हारा ये फकीर क्या कहता है. ये ईश्वर को नहीं मानता. देख लो ये कैसा शैतान है.' सरमद को सड़कों-गलियों में घसीटते हुए ले जाया गया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया गया.

कहा जाता है कि धरती से जाते वक़्त सरमद की देह ने अपने कटे हुए सिर को हाथ में ले लिया और नाचने लगा. फिर नाचते हुए ही उसने पूरा कलमा पढ़ा.  उसने अपने अल्लाह को पा लिया था. जैसे ही वो जामा मस्जिद में जाने को हुआ हरे-भरे शाह की मजार से एक आवाज आई. उसे पुकारा था किसी ने. अब सरमद को उसका ईश्वर मिल गया था. सरमद अपना कटा सिर लेकर शाह की मजार की तरफ चल दिया. वहीं मजार के पास वो गिर गया और वहीं दफन भी हो गया. अपने हाथों में अपना ही सिर लेकर नाचते-नाचते पूरा कलमा पढ़ने की बात बाद में जोड़ी हुई बात है. क्योंकि लोग अपने प्रिय संत की कल्पना बिना कलमे के कर ही नहीं पाते शायद. वो तो ये भी कल्पना नहीं कर सकते कि उनके इस संत ने ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल खड़ा किया है. सरमद का अपने हाथों में सिर लेकर नाचना हिन्दू धर्म की देवी काली की याद दिलाता है. दो धर्मों के मिथकों का इस तरह मिलना सुखद संयोग है. औरंगज़ेब के दरबारियों ने सरमद पर दो और आरोप भी लगाए थे. जिसमें से एक आरोप था कि वो हमेशा नंगे घूमा करते हैं.

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शाहजहां और औरग़ज़ेब के दरबार में रहने वाले चिकित्सक बर्नियर के एक कथा को सरमद की नग्नता वाली कथा के सन्दर्भ में याद किया जाता है- 'मैं अक्सर इस नंगे फकीर को देखकर शर्मिन्दा हो जाता था. वो दिल्ली की गलियों में नंगा ही घूमा करता. वह औरंगज़ेब से या उसकी धमकियों से भी नहीं डरता था. उसने कपड़े पहनने से साफ़-साफ़ इंकार कर दिया था.' बर्नियर के कुछ और कथनों से ये और भी स्पष्ट होता है कि सिर्फ सरमद ही नहीं ऐसे नंगे फकीर उस समय आम थे. इसलिए सरमद पर इस तरह का आरोप अपने आप ख़ारिज हो जाता है क्योंकि वो अकेले ऐसे नहीं थे जो कि नंगा रहता हो. बर्नियर आगे लिखते हैं- शहंशाह के महलों के आसपास, खेतों में अक्सर ऐसे फकीर घूमते  मिल जाते थे. उनमें से कुछ अपने हाथ ऊपर की तरफ उठाए रहते. उनके बेहद लम्बे बाल खुले रहते या जूड़े की शक्ल में सर पर बंधे रहते. कुछ अपने कन्धों पे बाघ की खाल ओढ़े रहते. वे बिना किसी शर्म के नंगे ही इधर-उधर घूमते रहते। ये देख कर मुझे अच्छा लगता कि औरत, मर्द, बच्चे, मतलब आमलोग उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते थे मतलब उन्हें अजीब नहीं समझते थे. ना ही खुद से अलग समझते थे. औरतें आदर के साथ उन्हें भिक्षा दिया करतीं. उन फकीरों को और सामान्य लोगों से अधिक सम्मान मिला करता.

कहा जाता है कि एक शुक्रवार जब सरमद जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लेटे हुए थे, औरंगज़ेब वहां पहुंचा. उसने सरमद  से पूछा कि वो शरिया को क्यों नहीं मानता? सरमद ने कहा- 'जो पाप करते हैं उन्हें अपने पापों को छिपाने के लिए कपड़े पहनने की जरूरत पड़ती है. मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया कि मुझे कपड़े पहनने पड़ें.' वहीं पास में एक कम्बल पड़ा था. सरमद ने औरंगज़ेब से कहा कि वो उसे कंबल ओढ़ा दे. जैसे ही औरंगज़ेब ने कंबल उठाया, कंबल के नीचे उसे कुछ कटे हुए सिर दिखाई दिए. ये उन्हीं लोगों के सिर थे जिनकी हत्या औरंगजेब ने की थी. उन सिरों को देखकर वह बुरी तरह डर गया. इस बारे में सरमद का कहना था- 'मुल्ला कहते हैं अहमद स्वर्ग गए लेकिन स्वर्ग खुद ही अहमद के पास आया था.' सरमद ने गला काटने की सजा के दौरान अपना चेहरा ढंकने से मना कर दिया था. सजा के दौरान वे यही कहते रहे थे- 'देखो नंगी तलवार लिए मेरा एक दोस्त सामने से चला आ रहा है. मैं उसे खूब पहचानता हूं.'

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इनमें से ज्यादातर कहानियां लोक कथाओं या मौखिक कथाओं का हिस्सा हैं. बाद में इन्हीं लोक कथाओं को लिख दिया गया. वैसे तो इस लरह की लोक कथाओं पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा एकता क्योंकि इनके तथ्य पूरी तरह सच नहीं होते. लेकिन इतना तो है ही कि इन कथाओं से सरमद, उनके दर्शन और अध्यात्मिक परंपराओं की जानकारी मिल जाती है. सरमद पर लिखे गए लेखों में सबसे अच्छा लेख मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का है. जो उन्होंने अपने दोस्त ख्वाजा हसन निजामी के कहने पर 1910 में लिखा था. आज़ाद ने बताया है कि सरमद के लिखे साहित्य को औरंगज़ेब और उसके प्रशासन ने नष्ट कर दिया. और यही वजह है कि उनका लिखा कुछ भी अब उपलब्ध नहीं. आज़ाद ने मिर्ज़ा मोहम्मद काज़िम और नवाब इनायत उल्लाह के लिखे इतिहास से सरमद के बारे में की जानकारियां इकट्ठी करनी चाहीं लेकिन उन किताबों से साफ़-साफ पता चलता है कि सरमद से जुड़ी जानकारियों को जान-बूझकर दबा दिया गया है. आखिरकार आज़ाद को दो काम के लेख मिले- शेरखान लोदी का 'मिरातुल ख़याल'  और अली कुली वाले दाग़िस्तानी का 'रियाज़-उल-शौरा'. जो मोहम्मद शाह के शासन काल में जीवित थे.

आज़ाद ने बताया है कि सरमद अर्मेनिया के रहने वाले थे. ईरान में पड़ने वाले काशान के यहूदी थे. ईरान में अर्मेनियन. क्रिश्चियन और यहूदियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी. और सब आराम से बहुत घुलमिल कर रहते थे. उस सामाजिक संरचना में वे बेहद घुल-मिल गए थे. उनकी शिक्षा या परिवार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती. सिंध के द्वीप के माध्यम से वे भारत में व्यापार करने आए थे. यहां वे एक हिन्दू लड़के अभय चंद से प्यार करने लगे. आज़ाद ने ये नहीं बताया कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं या ऐसे क्या कारण थे कि सरमद बिना कपड़ों के रहने लगे. लेकिन कहा जाता है कि वो अभय के साथ रहना चाहते थे लेकिन उन्हें अलग कर दिया गया. वे एक दूसरे से अलग होकर टूट गए जैसे. पहले सरमद अभय के घर गए थे वहां अभय के पिता के सामने उन्होंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और कहा कि वह दुनिया की परवाह नहीं करते. उनके प्रेमी के अलावा उनके जीवन में और किसी चीज का कोई महत्व नहीं. अभय के पिता इस बात पर गुस्से में आ गए. बाद में अभय और सरमद घूम-घूम कर गाने लगे. मौलाना आज़ाद कहते हैं- सरमद परमानंद की स्थिति में रहते थे. उन्होंने अपनी सारी धन संपत्ति और दुनियावी चीजें पूरी तरह त्याग दी थीं. उनके पास सिर्फ उनके कपड़े बचे थे. उसे भी सरमद ने उतार फेंका. सामाजिक बंधनों से वो पूरी तरह मुक्त हो चुके थे. जो लोग पूरी तरह दुनिया से आज़ाद रहना चाहते हैं. उनके लिए इस तरह का भौतिक दबाव पागल कर देने वाला होता है. आज़ाद ने सरमद की एक रुबाई भी पेश की है- 'एक पागल इंसान की कोई गलती नहीं होती/कमी तुममें है कि तुमने अब तक प्यार नहीं किया.'

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सरमद और अभय के बीच के रिश्ते यानी दो सम्प्रदायों हिन्दू और मुस्लिम के लड़कों के बीच का प्यार (जिसे अब 'गे संबंध' कहा जाता है) आज भी आश्चर्यजनक ही लगता है. और आज भी इतनी आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता. प्रगतिशील इस कथा को 'गे-अधिकारों' से जुड़ा समझ कर हमेशा याद करते हैं लेकिन गैर-प्रगतिशीलों के लिए इस बात का ज़िक्र भी अपमानजनक है. जबकि सत्रहवीं शताब्दी के समाज लिए ये सम्बन्ध कोई बड़ी बात नहीं लगती. अभय के पिता को सरमद के प्यार के बारे में पता था. और उस समय उन्हें अपने प्यार के लिए बहिष्कृत नहीं होना पड़ा था. तब वे प्रेम का का उत्सव मनाते थे. सूफी कथाओं में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिसमें एक कथा महमूद गजनी और उसके नौकर के बीच के प्रेम की भी है. महमूद भले ही इतिहास का खलनायक हो जिसने सत्रह बार सोमनाथ मंदिर को नष्ट किया, लेकिन वो लैला-मजनू और सस्सी-पन्नू की तरह अपने इश्क़ के लिए जाना जाता है. धर्म और समलैंगिकता से जुड़ी इन कहानियों से पता चलता है कि इस तरह की बातें या घटनाएं मध्यकालीन समाज के दैनिक जीवन में आम थीं. सरमद और अभय दोनों ने सिंध से दक्खिन तक की यात्रा साथ-साथ की फिर वे दिल्ली की तरफ भी बढ़ चले. सरमद रुबाईयां लिखा करते और अभय उन्हें गाया करते. दोनों ने मिलकर मूसा से जुड़ी पांच किताबों के अनुवाद पर्शियन में किए. घूम-घाम कर अंत में वे दिल्ली पहुंचे जहां उनकी मुलाक़ात दारा शिकोह से हुई.

मिरात-उल-ख्याल के लेखक शेरखान लोदी ने लिखा है- 'दारा शिकोह को भिक्षुकों, दीवानों आशिकों का साथ पसंद था. इसीलिए उसने सरमद को अपने समूह में शामिल कर लिया.' दुनिया को देखने के सरमद और दारा शिकोह के नजरिए लगभग एक से ही थे. सरमद के लिए औरंगज़ेब की नफरत वैचारिक नहीं थी बल्कि ये उसकी निजी नफरत थी. क्योंकि उसे सरमद में दारा दिखाई देता. एक और बात थी कि वो दारा के विचारों या उसकी दीवानगी को यूं ही नहीं छोड़ देना चाहता था. क्योंकि उसे इस बात का डर था कि आगे चलकर वो औरंगज़ेब के लिए परेशानी का कारण बन सकता था. इतनी सावधानियों के बावजूद सरमद ने उसे कभी चैन से जीने नहीं दिया. औरंगज़ेब हमेशा बेचैन रहा. उसे कभी शांति नहीं मिली. उसके आखिरी दिन अकेलेपन में बीते. बिलकुल अकेले. अपने घर से दूर. लेकिन उस समय के इतिहासकार इन तथ्यों को जुटाने में असमर्थ रहे हैं. और भी कई इतिहासकारों ने कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं. ये भी कहा जाता है कि सरमद की हत्या के बाद औरंगज़ेब को हमेशा अपने खाने में खून दिखाई देता. सूफी संत रेशी पीर ने उसे प्रायश्चित करने की सलाह दी थी. पीर ने सरमद की आत्मा का आहवान किया और उससे औरंगज़ेब को माफ़ कर देने की प्रार्थना की. पीर ने औरंगज़ेब को सलाह दी कि वो मेहनत कर के पैसे कमाए और उसी से अपने खर्चे जुटाए. उसी के बाद से उसने कुरआन को पढ़ना और उसे मानना शुरू कर दिया. बेशक ये लोक कथाओं का ही हिस्सा हैं लेकिन फिर भी इन में सरमद को ही याद किया जाता है. जबकि औरंगज़ेब ने नंगे फकीर सरमद के बारे में कहीं कुछ भी नहीं लिखा होगा.

दशकों और शताब्दियों बाद आज भी सरमद की रुबाइयां कितनी सच लगती हैं. सरमद और हरेभरे शाह के मज़ार साथ-साथ बने हुए हैं. इन्हें मानने वालों में हर धर्म, हर जाति के लोग हैं. पहले मज़ार का रंग लाल है. जो सरमद की क्रूर हत्या का प्रतीक है यानी खून का. दूसरे का रंग हरा है जो कि हरेभरे शाह के नाम पर ही है. हरेभरे शाह सरमद के अध्यात्मिक गुरु भी थे. लोग सरमद की मजार पर मन्नतों के धागे बांधते हैं, ताले भी लगाते हैं, अपनी मन्नतों को चिट्ठियों में लिख कर वहीं रख आते हैं. उनका विश्वास है कि सरमद उनकी मन्नतों का जवाब जरूर देंगे. ये ऐसा तीर्थस्थल हैं जहां जाने के लिए किसी को, किसी भी तरह की कोई रोक-टोक नहीं है. मर्द-औरत सब बराबर हैं यहां. जैसा कि सरमद ने खुद ही लिखा है- ‘इश्क़ में जान देना कभी बेकार नहीं जाता.’


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