
फरवरी 1972. जगह, नई दिल्ली. इंदिरा का दफ्तर. वही दफ्तर, जो कभी उनके पिता जवाहर लाल नेहरू का हुआ करता था. इटली की एक पत्रकार इंदिरा का इंटरव्यू लेने आईं. नाम था- ओरियाना फल्लाची. ये शायद इंदिरा के दिए सबसे अच्छे इंटरव्यूज में से था. बेबाक, टू-द-पॉइंट. पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, सोवियत इन सब पर बात हुई. फिर फिरोज गांधी, शादी, शादी में दिक्कतें, अलग रहने का फैसला इन सब पर भी बातें हुईं. फिर से शादी करने के खयाल पर भी बात हुई. फिर एक सवाल आया और इंदिरा बोलीं-
भुट्टो बहुत संतुलित इंसान नहीं हैं. वो जब बोलते हैं, तो समझ नहीं आता क्या बोल रहे हैं. कि इस बार इस बात से उनका क्या मतलब है?

इंदिरा के इंटरव्यू देने के करीब दो महीने बाद भुट्टो ने ओरियाना को बुलावा भेजा. ओरियाना ने भुट्टो के बारे में बताते हुए लिखा है कि वो लोमड़ी की तरह चालाक थे (फोटो: भुट्टो ओआरजी)
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अप्रैल, 1972. ओरियाना के पास पाकिस्तान आने का न्योता आया. न्योता भेजा था जुल्फिकार अली भुट्टो ने. भुट्टो चाहते थे, ओरियाना उनका इंटरव्यू लें. भुट्टो ने ओरियाना का वो इंदिरा वाला इंटरव्यू पढ़ा था. जिसमें इंदिरा ने उन्हें 'असंतुलित आदमी' कहा था. वो बड़े बिफरे हुए थे इंदिरा से. शायद यही भड़ास निकालने के लिए भुट्टो ने ओरियाना को बुलाया था. वो बोले-
श्रीमती गांधी जहां हैं, वहां वो बस नेहरू की बेटी होने की वजह से पहुंच पाई हैं. उन्होंने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया. जिस दिन से मैं उनसे लंदन में मिला, उस दिन से ही. हम दोनों एक लेक्चर सुनने पहुंचे थे. वो इस तरह से नोट्स ले रही थीं कि मैंने उनसे पूछ ही लिया- आप नोट्स ले रही हैं या कि थीसिस लिख रही हैं? मुझे यकीन नहीं होता कि उन्हें ऑक्सफर्ड से इतिहास में डिग्री मिल गई. मैंने ऑक्सफर्ड में तीन साल का कोर्स दो साल में पूरा कर लिया. और इंदिरा तीन सालों में भी अपना कोर्स पूरा नहीं कर पाईं. उनकी वो साड़ियां, माथे पर वो लाल टीका, उनकी वो छोटी सी मुस्कुराहट, वो मुझे कभी प्रभावित नहीं कर सकेगी.इंदिरा मामूली औरत हैं. मामूली बुद्धि वाली. उससे मिलने के खयाल से, उसके साथ हाथ मिलाने की सोचकर मुझे घिन आती है.इस लिंक पर क्लिक कर आप भुट्टो का ये इंटरव्यू पढ़ सकते हैं.

इंदिरा ने भुट्टो के इस इंटरव्यू का पूरा टेक्स्ट मंगवाया. भुट्टो ने उनके बारे में जो भी कहा था, उसे पढ़कर इंदिरा बौखला गईं. उन्होंने ऐलान किया कि अब वो भुट्टो से नहीं मिलेंगी. मतलब, शिमला समझौते में भुट्टो के साथ उनकी कोई मीटिंग नहीं होगी. ये सुनकर भुट्टो के हाथ-पांव फूल गए.
परेशान भुट्टो ने ओरियाना को ये अजीब सा संदेसा भिजवाया ओरियाना ने कई बार भुट्टो को रोकने की कोशिश की. कहा कि वो कुछ ज्यादा ही बुरा बोल रहे हैं. पर भुट्टो बोलते रहे. बल्कि ये भी कहा कि जब ओरियाना इंटरव्यू छापें, तो वो सब लिखें जो उन्होंने इंदिरा के लिए कहा है. इस इंटरव्यू की कुछ बातें दिल्ली के अखबारों में छपीं. इंदिरा ने पढ़ीं. उन्होंने ओरियाना को फोन मिलाया. कहा, वो भुट्टो का पूरा इंटरव्यू पढ़ना चाहती हैं. ओरियाना ने केबल के सहारे रोम से वो इंटरव्यू इंदिरा तक भिजवाया. ये वक्त बड़ा अहम था. पाकिस्तान के करीब 93,000 युद्ध बंदी भारत के पास थे. पाकिस्तान का करीब 5,000 स्क्वैयर मील का इलाका भारत के कब्जे में था. दोनों देशों को शांति समझौते के लिए शिमला में मिलना था. पाकिस्तान के मुखिया थे भुट्टो और भारत की मुखिया थीं इंदिरा. इन दोनों नेताओं की भी मुलाकात होनी थी. ये सब होना था कि बीच में ये ओरियाना वाला इंटरव्यू आ गया. इंदिरा बिफर पड़ीं. उन्होंने ऐलान किया कि अब वो भुट्टो से नहीं मिलेंगी. जब भुट्टो ने इंदिरा का ये ऐलान सुना, तो उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई. अब क्या करेंगे वो? हारकर भुट्टो ने ओरियाना को खोजा. इटली में तैनात पाकिस्तानी राजदूत से ओरियाना को कहलवाया-
उससे कहो एक दूसरा आर्टिकल लिखे. लिखे कि उसने मेरा इंटरव्यू कभी लिया ही नहीं. कि उसने जो लिखा, वो उसने सपने में देखा था.फिर राजदूत ओरियाना के आगे गिड़गिड़ाने लगे. कहा, 60 करोड़ लोगों की जिंदगी अब आपके हाथों में है. मगर ओरियाना नहीं मानीं. मानने का सवाल ही कहां था. फिर कई दिनों तक भुट्टो किसी न किसी पाकिस्तानी अधिकारी को ओरियाना के पास भेजते रहे. आखिरकार तंग आकर ओरियाना ने कहलवाया-
मेरे हाथ बहुत छोटे हैं. उनमें 60 करोड़ लोग नहीं समा सकते.

3 जुलाई को पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की वापसी थी. 2 जुलाई की शाम तक वार्ता का कोई नतीजा नहीं निकला था. लेकिन फिर भुट्टो इंदिरा से मिलने आए. करीब डेढ़ घंटे तक दोनों नेताओं ने अकेले में बातचीत की. और इसके बाद वार्ता फिर पटरी पर लौट आई (फोटो: Getty)
...तो इस बैकग्राउंड से शिमला समझौता शुरू हुआ 2 जुलाई, 1972. भारत और पाकिस्तान की पिछले कई दिनों से बात हो रही थी. लेकिन कोई आमराय नहीं बन पाई थी. इस शाम ये तय हो गया कि समझौता नाकामयाब हुआ. अगले दिन भुट्टो और उनका पाकिस्तानी ताम-झाम वापस अपने मुल्क लौटने वाला था. फिर एकाएक भुट्टो इंदिरा से मिलने पहुंचे. वो विदा लेने आए थे. दोनों नेताओं के बीच अकेले में करीब डेढ़ घंटे तक बात हुई. भुट्टो बोलते रहे. अपनी कहते रहे. फिर इंदिरा बोलीं, खाने के वक्त जवाब दूंगी. इंदिरा मान गई थीं. खाने के बाद बातचीत फिर शुरू हुई. और इस बार नतीजे पर जाकर खत्म हुई. दोनों देशों के बीच समझौता हो गया. भारत ने पाकिस्तान को उसके सारे युद्ध बंदी लौटा दिए. उसकी सारी जमीन भी लौटा दी. पाकिस्तान खाली हाथ शिमला आया था. जब गया, तो पूरा भरा-भरा गया. पाकिस्तान में इसे लोगों ने भुट्टो की जीत बताया. हिंदुस्तान में लोग सोचते रहे, इंदिरा ने जीती बाजी क्यों हारी? क्यों नहीं कश्मीर समस्या हमेशा के लिए सुलझा ली. इसके जवाब में एक कहानी पढ़िए. ये कहानी शशांका एस बैनर्जी ने 'द वायर' में लिखी थी-
जंग खत्म हो चुकी थी. बांग्लादेश बन गया था. मगर मुजीब अब भी पाकिस्तान की कैद में थे. वहां सैन्य अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी. इंदिरा किसी भी कीमत पर मुजीब को रिहा करवाना चाहती थीं. न केवल बांग्लादेश के लिए, बल्कि भारत के लिए भी. बस मुजीब ही थे, जो बांग्लादेश को संभाल सकते थे. उसे खड़ा कर सकते थे. एक शांत और स्थिर बांग्लादेश भारत के हित में था. पिछली किस्म के आखिर में हमने बताया था. कि भुट्टो 20 दिसंबर, 1971 को UN से इस्लामाबाद लौटे थे. रास्ते में रुकते-ठहरते. ये उस रास्ते की ही बात है.
एक जनाब थे मुजफ्फर हुसैन. 16 दिसंबर, 1971 को जब सीजफायर हुआ, तब पूर्वी पाकिस्तान में उनसे बड़ा कोई अधिकारी नहीं था. मतलब, नौकरशाही में. चीफ सेक्रटरी थे वो. फिर युद्ध बंदी बनाकर भारत ले आए गए. उनकी बीवी थीं लैला. जंग खत्म होने के समय लैला लंदन में थीं. इंदिरा को पता चला कि भुट्टो और लैला में नजदीकियां थीं. भुट्टो जिस फ्लाइट से रावलपिंडी जा रहे थे, वो लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर रुकनी थी. ईंधन भरवाने के लिए. लैला को संदेश भिजवाया गया. कि वो भुट्टो से बात करके ये जानने की कोशिश करें कि पाकिस्तान मुजीब के साथ क्या करने की सोच रहा है. क्योंकि जंग खत्म होने के बाद भी मुजीब पाकिस्तान की कैद में थे. वहां सैन्य अदालत ने मुजीब को फांसी की सजा दी थी. कहते हैं कि भुट्टो ने लैला से कहा. कि पाकिस्तान लौटकर जब वो देश की कमान संभालेंगे, तब मुजीब को रिहा कर देंगे. मगर बदले में इंदिरा को उनकी बात माननी होगी. जनवरी, 1972 में भुट्टो ने अपना वादा निभाया. मुजीब को रिहा कर दिया. मुजीब की रिहाई ही थी, जिसकी वजह से शिमला समझौते के समय इंदिरा ने इतनी नरमी दिखाई.

बांग्लादेश बन चुका था. उसके 1 करोड़ से ऊपर शरणार्थी भारत के अंदर थे. इंदिरा की सबसे बड़ी चिंता अब मुजीब को लेकर थी. वो किसी भी कीमत पर मुजीब को फांसी नहीं चढ़ने देना चाहती थीं. मुजीब का बांग्लादेश लौटना न केवल उस नए बने मुल्क के लिए, बल्कि भारत के लिए भी जरूरी थी (फोटो: Getty)
इंदिरा ने भुट्टो से कहा- या तो ये ले लो, या वो ले लो
किस्सा ये भी है कि इंदिरा ने शिमला में भुट्टो से पूछा. दो में से एक चुनो. या तो अपनी जमीन वापस लो, या युद्धबंदी. भुट्टो ने कहा, जमीन दे दो. भुट्टो जानते थे कि इंदिरा उन युद्धबंदियों को न मारेंगी, न तकलीफ देंगी. बल्कि रिहा कर देंगी. क्योंकि युद्धबंदी मानवीय मुद्दा थे. भारत वैसे भी युद्धबंदियों की जरूरत से ज्यादा देखभाल कर रहा था. उसके लिए ये अतिरिक्त खर्च था. और, बहुत ज्यादा खर्च था. भारत ने 1974 में सारे पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया. तब, जब पाकिस्तान ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी. यहां से आगे बढ़कर अब भुट्टो के पाकिस्तान पर चलते हैं. पर उससे भी पहले ये जानें कि इतनी किस्तों से जिस भुट्टो का नाम ले रहे थे, वो भुट्टो कौन था? कहां से आया था?

इंदिरा गांधी और आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ, दोनों ने ही पाकिस्तानी युद्धबंदियों की देखभाल में कोई कसर नहीं उठा रखी थी. भुट्टो जानते थे कि भारत के लिए बहुत दिनों तक ये खर्च उठा पाना मुमकिन नहीं होगा. ऊपर से युद्धबंदियों के साथ मानवीय पक्ष भी जुड़ा था. इसीलिए भुट्टो जमीन वापस हासिल करने पर ज्यादा जोर दे रहे थे. ये पाकिस्तानी युद्धबंदियों का एक शिविर है. भारत में 100 से ज्यादा कैंप्स बनाए गए थे इनके लिए (फोटो: Getty)
हजरत अली की तलवार के नाम पर अब्बू ने नाम दिया- जुल्फिकार 5 जनवरी, 1928. शाहनवाज भुट्टो फज्र की नवाज पढ़ रहे थे. तभी उनके पास खबर आई- मुबारक हो. बेटा हुआ है. मियां भुट्टो ने नमाज पूरी की. फिर उठे, जनाना हिस्से की तरफ बढ़े. फिर जच्चगी के कमरे में पहुंचकर बच्चे को हौले से उठाया. उसकी कान में नमाज पढ़ी. फिर नाम रखा- जुल्फिकार. मुसलमानों के चौथे खलीफा हजरत अली की तलवार 'जुल्फिकार' के नाम पर. भुट्टो खानदान के पूर्वज सन् 712 के करीब वहां आए थे. मुहम्मद बिन कासिम के कुनबे के साथ. बहुत बड़ा जमींदार घराना था भुट्टो का. जुल्फी की मां हिंदू खानदान से थीं. नाचने के पेशे में थीं. नाम था- लखीबाई. शाहनवाज का उनपर दिल आया. उन्होंने लखी बाई को मुसलमान बनाया और शादी कर ली. नया नाम- खुर्शीद. भुट्टो छह बरस तक लरकाना में ही पले-बढ़े. सन् 1934 में उनकी परिवार बंबई आ गया.

भुट्टो के पिता ने बंबई में एक घर बेचा था. वो घर भुट्टो के नाम से था. उस समय वो नाबालिग थे. फिर बंटवारा हो गया और भुट्टो पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गए. भारत सरकार ने उस घर को शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया. भुट्टो ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली. उनका कहना था कि वो जब अमेरिका गए, तब भी भारतीय नागरिक थे. जब वो पाकिस्तान लौटे, तब भी उनके पास भारत का ही पासपोर्ट था (फोटो: Getty)
1957 तक भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी थी बंटवारे के समय जुल्फी पाकिस्तान नहीं गए थे. भारत में ही थे. उनके पिता शहनवाज भुट्टो उसी साल जूनागढ़ के राजा महब्बत खान रसूल अल खानजी के दीवान बन गए. सितंबर 1947 में जुल्फी बंबई से अमेरिका के लिए रवाना हुए. नवंबर 1953 में पढ़ाई-लिखाई खत्म करके पाकिस्तान पहुंचे. मगर तब भी वो भारत के ही नागरिक थे. 1957 में जब इस्कंदर मिर्जा ने जुल्फी को अपनी कैबिनेट में लिया, उसके कुछ दिनों पहले तक जुल्फी ने भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी थी.
भुट्टो ने खूब आर्थिक सुधार किए इस्कंदर मिर्जा और अयूब खान के उनके दिनों के बारे में हमने पहले ही बात कर ली. उन्होंने अयूब को छोड़ा. जेल गए. रिहा हुए. अपनी पार्टी 'पाकिस्तान पीपल्स पार्टी' (PPP) बनाई. 1970 का चुनाव. सब देख लिया. फिर जुल्फी राष्ट्रपति बन गए. जुल्फी की सरकार अपने शुरुआती दिनों में आवाम की सरकार थी. तभी लोग उनको 'कायद-ए-आवाम' कहते. उनका नारा था- रोटी, कपड़ा और मकान. पॉलिसी थी- इस्लामिक समाजवाद. पाकिस्तान बनने के बाद शायद ये पहली बार हुआ था कि ये मुल्क धर्म और मजहब से आगे बढ़कर आर्थिक मुद्दों की तरफ ध्यान देने लगा था. उन्होंने जमीन सुधार किए. आर्थिक सुधार किए. उद्योग-धंधों का राष्ट्रीयकरण किया. भुट्टो कितनी तेजी से काम कर रहे थे इन दिनों, ये इसी बात से समझिए. सत्ता हाथ में आने के कुछ दिनों के भीतर ही भुट्टो ने 30 बड़ी फर्म्स का नैशनलाइजेशन कर दिया. मार्च 1972 में उनकी सरकार ने बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया. 1974 आते-आते बैंकों को भी सरकारी कर दिया.

1970 के चुनाव के समय भी भुट्टो ने आर्थिक और भूमि सुधार के वादे किए थे. फिर जब वो सत्ता में आए, तो उन्होंने अपने कई वादों पर अमल भी किया. इस चक्कर में उन्होंने कई दुश्मन भी बनाए (फोटो: Getty)
गरीब-मजदूर पसंद करते थे, मिडिल क्लास चिढ़ता था उनकी सरकार कृषि क्षेत्र में पैसा खर्च कर रही थी. फसल की कीमतें बढ़ा दी गई थीं. उनसे पहले 40 रुपये गेहूं का दाम किसानों को 17 रुपया मिलता था. भुट्टो ने इसे बढ़ाकर 37 रुपया कर दिया. मजदूरों की मजदूरी बढ़ा दी गई. उनके अधिकार बढ़ा दिए गए. पंजाब और सिंध हमेशा से बड़े-बड़े जमींदारों का इलाका रहा था. भुट्टो खुद भी ऐसे ही जमींदार परिवार के थे. फिर भी उन्होंने वादा किया कि सामंतों की मुट्ठी से जमीनें लेकर आम लोगों में बांटेंगे. 1972 में उनकी सरकार ने फरमान निकाला. कि एक इंसान ज्यादा से ज्यादा 150 एकड़ खेती लायक जमीन ही रख सकता है अपने पास. इससे पहले ये सीमा 500 एकड़ थी. हालांकि इन भूमि सुधारों को लेकर जैसे बड़े-बड़े दावे किए गए, उतना काम जमीन पर नहीं हुआ. लेकिन कुछ तो हुआ. अपने ऐसे ही फैसलों और वादों की वजह से भुट्टो आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय थे. खासतौर पर गरीबों, भूमिहीनों, मजदूरों, छात्रों और औरतों के बीच. मगर मिडिल क्लास उनका विरोधी था. खासतौर पर वो तबका, जिसे भुट्टो के आर्थिक सुधारों से नुकसान हुआ था.
पाकिस्तान में जो संविधान चल रहा है, वो भुट्टो की ही निशानी है 1973 में भुट्टो ने पाकिस्तान को उसका नया संविधान दिया. वही संविधान, जो आज भी वहां चल रहा है. 14 अगस्त, 1973 को ये संविधान लागू हुआ. यहां सरकार चुनने का हक जनता का था. जैसे असल मायने में लोकतंत्र के अंदर होता है. इसके अंदर एक और खास बात थी. सेना के लोगों को एक शपथ लेनी थी कि वे किसी राजनैतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे. ऐसा करके भुट्टो ने सैनिक राज की संभावनाओं को खत्म करने की कोशिश की. पाकिस्तान के लिए ये बेहद जरूरी कदम था. लेकिन अफसोस कि आने वाले दिनों में सेना ने इस नियम को ठेंगा दिखा दिया. देश को संविधान देने वाले भुट्टो पाकिस्तान के पहले लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री बने. पंजाब और सिंध प्रांत में भी उनकी पार्टी PPP की सरकार बनी.

ये टिक्का खान की तस्वीर है. पूर्वी पाकिस्तान में इतना बड़ा नरसंहार टिक्का खान की ही देखरेख में हुआ था. भुट्टो ने सत्ता में आकर उन्हें आर्मी चीफ बना दिया. ये टिक्का का इनाम था. फिर जब भुट्टो ने उन्हें बलूचिस्तान में विद्रोह कुचलने भेजा, तब वहां पर भी टिक्का खान ने वैसी ही क्रूरता दिखाई. यूं ही नहीं लोग उसे 'बलूचिस्तान का कसाई' बुलाते थे (फोटो: AP)
एक बार फिर लोकतंत्र पीछे गया, सेना आ गई ये सब अच्छा-अच्छा हो रहा था कि एक बार फिर पाकिस्तान में सेना को अहम रोल मिल गया. फरवरी 1973 की बात है. इस्लामाबाद स्थित इराकी दूतावास के अंदर हथियार मिले. उनका इस्तेमाल बलूचिस्तान में होना था. वहां बलूच आजादी की मांग कर रहे थे. बलूचिस्तान में तब नैशनल आवामी पार्टी और जमात-ए-उलेमा इस्लाम की गठबंधन सरकार थी. इसके मुखिया थे सरदार अताउल्लाह खान मेंगल. उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया. इसी गठबंधन की सरकार नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविन्स (जिसको अब खैबर-पख्तूनख्वा कहते हैं) में थी. अगले दिन उसने भी इस्तीफा दे दिया. अक्टूबर 1973 में बलूचिस्तान के गवर्नर सरदार अकबर खान बुगती ने भी इस्तीफा दे दिया. फिर यहां अलग बलूचिस्तान देश की मांग ने जोर पकड़ा. इसे दबाने के लिए भुट्टो ने सेना की मदद ली. जनरल टिक्का खान का चर्चा 1971 की लड़ाई के वक्त कर चुके हैं. उसी टिक्का खान को भेजा गया बलूचिस्तान. पहले वो 'पूर्वी पाकिस्तान का कसाई' कहलाता था. अब उसे लोग 'बलूचिस्तान का कसाई' कहने वाले थे. मतलब संविधान लागू होने के कुछ ही दिनों बाद फिर से संवैधानिक संकट की स्थिति आ गई थी. चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया था. जनता के फैसले को पलट दिया गया था. और लोकतांत्रिक तरीकों की जगह सेना में भरोसा दिखाया गया था.
और शायद इसके बाद से ही चीजें बिगड़ना शुरू हो गईं. भुट्टो के लिए भी और पाकिस्तान के लिए भी. इन सबके पीछे 1974 के साल का बड़ा रोल है. इस साल कुछ बड़ी अहम चीजें हुईं. पॉइंट में पढ़िए इन्हें-
- फरवरी 1974. भुट्टो ने लाहौर में दूसरा इस्लामिक समिट कॉन्फ्रेंस आयोजित करवाया. सऊदी के शाह फैजल, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी, यासिर अराफात सब आए इसमें. भुट्टो ने बांग्लादेश को मान्यता देकर मुजीब को भी बुलाया इसमें. यहीं से पाकिस्तान सऊदी और खाड़ी देशों के करीब आया. 1973 में कच्चे तेल की कीमतों में बहुत तेजी आई थी. भुट्टो ने पाकिस्तानी मजदूरों के खाड़ी देशों में जाने का रास्ता खोल दिया. यानी अब पाकिस्तान का इन देशों के साथ न केवल राजनैतिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक वास्ता भी गहरा हो गया. धीरे-धीरे ये देश इस स्थिति में आ गए कि पाकिस्तान पर मनमाफिक दबाव बनाने लगे. पाकिस्तान उनके हिसाब से अपने फैसले लेने लगा. अपनी नीतियां तय करने लगा. इस 'इस्लामीकरण' का बड़ा नुकसान हुआ भुट्टो को. फायदा हुआ जिया-उल-हक का. जिनके हाथों में पाकिस्तान जाने वाला था. नीचे एक विडियो का लिंक है. ये 1972 का विडियो है. भुट्टो हज करने मक्का पहुंचे थे. उनके साथ शाह फैसल भी हैं.
- सितंबर 1974. पाकिस्तान की नैशनल असेंबली ने अहमदिया को गैर-मुसलमान घोषित कर दिया. इसके लिए संविधान में खास संशोधन किया गया. पाकिस्तान, जो सारे मुसलमानों को दिखाया गया ख्वाब था. पाकिस्तान, जिसके बनते वक्त उसे सारे मुसलमानों के हवाले किया गया था. क्या शिया, क्या सुन्नी, क्या अहमदिया. पाकिस्तान भूल गया कि जिन्ना की रगों में भी अहमदिया का ही खून था. उनके पिता इसी समाज से आते थे. ये फैसला पाकिस्तान के कट्टर होने की राह में एक मील का पत्थर कहलाने वाली थी. इसका एक किस्सा पढ़िए-
मुहम्मद अब्दुस सलाम, नोबेल प्राइज विजेता भौतिकशास्त्री. 1972 से ही वो पाकिस्तान सरकार के साथ बतौर विज्ञान सलाहकार काम कर रहे थे. पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्रोग्राम भी उनकी ही देखरेख में चल रहा था. जब अहमदियाओं को गैर-मुसलमान घोषित किया गया, तो मुहम्मद अब्दुस सलाम ने इस्तीफा दे दिया. विरोध के तौर पर. क्योंकि वो खुद भी अहमदिया थे. भुट्टो ने उनका इस्तीफा मंजूर करते हुए कहा- ये सब राजनीति है. मुझे थोड़ा वक्त दो, मैं इसे बदल दूंगा. भुट्टो के इस आश्वासन पर सलाम ने उनसे कहा. कि आप ये बात मुझे लिखित में दीजिए. इसपर भुट्टो इनकार कर गए.

ये हैं भारत के परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर राजा रमन्ना. इन्हें भारत के न्यूक्लियर हथियार प्रोग्राम का आर्किटेक्ट कहा जाता है. मई 1974 में राजस्थान के पोखरण में भारत ने पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया. भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर के जिन वैज्ञानिकों की टीम ने ये परीक्षण किया, उसका नेतृत्व रमन्ना ही कर रहे थे (फोटो: Getty)
- मई 1974. भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया. भुट्टो इसके बारे में पहले से ही सोच रहे थे. मगर जब भारत के पास न्यूक्लियर हथियार आ गया, तो पाकिस्तान को अपने सिर पर तलवार लटकती दिखाई देने लगी. फिर चाहे इसके लिए उसे अपना सारा जरूरी बजट विकास की जगह हथियारों के ही नाम क्यों न करना पड़े. भारत के न्यूक्लियर टेस्ट की वजह से पाकिस्तानी सेना को भी बहुत फायदा हुआ. वो अब अपनी आवाम को भारत के नाम से और ज्यादा डरा सकती थी. उन्हें यकीन दिला सकती थी कि तरक्की जैसी चीजें बाद की बात हैं. यहां तो सवाल अस्तित्व का है, जो कि भारत के न्यूक्लियर हथियार की वजह से दांव पर लग गया है.
- आपको अहमद रजा कसूरी याद हैं. 1971 में ढाका के अंदर नैशनल असेंबली का सत्र बुलाए जाने की बात हुई थी. तब भुट्टो ने धमकी दी थी. कि अगर कोई नेता वहां गया, तो वो उसकी टांगें तोड़ देंगे. हमने बताया था कि उनकी पार्टी के बस एक नेता ने भुट्टो के कहे को नजरंदाज करके ढाका जाने की हिम्मत दिखाई. वो थे अहमद रजा कसूरी. नवंबर 1974 में अहमद के पिता नवाब मुहम्मद रजा कसूरी की लाहौर में हत्या हो गई. वो एक शादी से लौट रहे थे कि कुछ अनजान हमलावरों ने उन्हें गोलियों से नहला दिया. शक की अंगुली उठी भुट्टो पर. लोग कह रहे थे कि निशाना अहमद थे, लेकिन गलती से उनके पिता मारे गए. 11 नवंबर, 1974 को इस मर्डर का केस दर्ज हुआ. प्रधानमंत्री भुट्टो को मुख्य आरोपी बनाया गया. इस बात के लिए तो भुट्टो की वाहवाही है. उनके प्रधानमंत्री होते हुए अगर उनके खिलाफ हत्या का केस दर्ज हो रहा है, तो ये भी बड़ी बात है. उस समय इस केस पर कुछ नहीं हुआ. मगर यही केस आगे चलकर भुट्टो को खा गया.

ये 12 अप्रैल, 1973 की तस्वीर है. पाकिस्तान का नया संविधान अगस्त में जाकर लागू हुआ. भुट्टो के ठीक बगल में खड़े हैं फजल इलाही चौधरी, जो उस समय नैशनल असेंबली के स्पीकर थे. अगस्त में जब भुट्टो ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तब चौधरी को राष्ट्रपति बनाया गया (फोटो: पाकिस्तान नैशनल असेंबली आर्काइव्ज)
1974 आते-आते भुट्टो बदल गए थे अब भुट्टो में तानाशाह की झलकियां दिखाई देने लगी थीं. विरोधियों की न सुनना. कोई विरोध करे, तो पूरे जोर से उसे दबा देना. आलोचनाओं पर दुश्मनी निकालना. विरोधी तो विरोधी, उनकी अपनी ही पार्टी के नेता इसके शिकार हो रहे थे. जुलाई 1974 की एक ऐसी ही घटना है. PPP के एक नेता थे- जे ए रहीम. भुट्टो के आदमियों ने रहीम को खूब पीटा. ये सब भुट्टो की ही कहने पर हुआ था. वो रहीम को उनके विरोध का सबक सिखा रहे थे. अपनी आलोचना करने वाले अखबारों और पत्रकारों से भुट्टो खुन्नस निकालने लगे. उन्हें पीटा जाने लगा. धमकियां दी जाने लगीं. जो भी भुट्टो को चुनौती देने की कोशिश करता, वो भुगतता. ये सारे गुण तानाशाहों में होते हैं. ऐसा करके बहुत जल्द ही भुट्टो ने ढेर सारे दुश्मन बना लिए. यहां तक कि उनके पास अमेरिका का भी सपोर्ट नहीं था. अमेरिका को लगता, वो भुट्टो को कंट्रोल नहीं कर पा रहा है. दूसरा, अमेरिका कतई नहीं चाहता था कि पाकिस्तान न्यूक्लियर हथियार बनाए. दोनों ही वजह से उसे भुट्टो से दिक्कत थी. ऊपर से भुट्टो खुद भी अमेरिका से उतनी करीबी नहीं बढ़ाना चाहते थे. इस मामले में वो अपने से पहले वालों और अपने से बाद वालों, सबसे ही अलग थे.

भुट्टो का कहना था कि देश की तरक्की में जिन उद्योग-धंंधों की जरूरत है, उनका नियंत्रण कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में नहीं होना चाहिए. इसीलिए वो मैनुफैक्चरिंग, और बैंक जैसे सेक्टरों का नैशनलाइजेशन करने के हिमायती थे. उन्होंने ऐसा किया भी. उनके भूमि सुधारों की वजह से जागीरदारों और सामंतों को बड़ा नुकसान हुआ (फोटो: Getty)
भुट्टो के सारे विरोधी उनके खिलाफ एकजुट होने लगे ये सब हो ही रहा था कि आया जुलाई 1976. भुट्टो ने आटा और चावल मिलों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इससे पहले वो वादा कर चुके थे कि अब और कोई नैशनलाइजेशन नहीं होगा. फिर भी उन्होंने ये किया. इसकी वजह से मिडिल क्लास उनसे और खार खाने लगा. सामंती परिवारों के लोग पहले ही उनके खिलाफ थे. पाकिस्तानी सेना और नौकरशाही पर हमेशा से ही इन ग्रुप्स की पकड़ थी. यानी, भुट्टो से नफरत करने वाले उनके बेहद करीब आ गए थे. उनके चारों तरफ उन्हें नापसंद करने वालों का घेरा बन रहा था. भुट्टो के दिन फिरने के पीछे एक वजह इन सबकी नाराजगी भी थी.
भुट्टो पर 'सच्चा मुसलमान' न होने का भी इल्जाम था एक और चीज थी, जो भुट्टो के खिलाफ गई. भुट्टो शहरी थे. बंबई में पले-बढ़े. फिर अमेरिका में जवानी गुजरी. कॉलेज की पढ़ाई हुई. वो अंग्रेजीदां थे. उर्दू भी कमजोर थी. ऊपर से उनकी मां शादी के पहले तक हिंदू थीं. नाचने-गाने के पेशे से थीं. विरोधी कहते कि भुट्टो में इस्लामिक तहजीब नहीं है. कि वो पक्के मुसलमान नहीं हैं. वो नमाज पढ़ते हैं या नहीं, या फिर उन्हें नमाज पढ़नी आती भी है या नहीं, इस बात पर भी लोग शक जताते थे. ये सब कितना ज्यादा था, इसे समझने के लिए उनकी मौत के बाद का एक किस्सा पढ़िए. इसका जिक्र 'भुट्टो के आखिरी 323 दिन' नाम की किताब में है. इसे लिखा है कर्नल रफीउद्दीन ने. जब भुट्टो रावलपिंडी जेल में बंद थे, तब कर्नल रफीउद्दीन वहां के सिक्यॉरिटी इन-चार्ज थे. उन्होंने लिखा है-
जब भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया, तो खुफिया एजेंसी ने एक फोटोग्रफर को भुट्टो की तस्वीर लेने भेजा. उसे ब्रीफ दिया गया था कि वो भुट्टो के लिंग की तस्वीर खींचकर लाए. वे लोग देखना देखना चाहते थे कि भुट्टो का खतना हुआ भी है या नहीं. फोटो देखने के बाद इस बात की पुष्टि हुई कि एक 'सच्चे मुसलमान' की तरह भुट्टो का भी खतना हुआ था.

भुट्टो को यकीन था कि वो चुनाव जीतेंगे. उनके खिलाफ कोई मजबूत विपक्ष था भी नहीं. विपक्षी पार्टियां भी ये बात जानती थीं कि वो अकेले-अकेले लड़े, तो उनका भुट्टो के खिलाफ कोई चांस नहीं है. इसीलिए उन्होंने गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने का फैसला किया (फोटो: AP)
जीत को लेकर भुट्टो का ओवरकॉन्फिडेंस अब आया 1977 का साल. भुट्टो की सरकार का कार्यकाल खत्म होने में अभी वक्त था. मगर फिर भी उन्होंने चुनाव करवाने का ऐलान कर दिया. पाकिस्तान में इतिहास खुद को दोहराता बस नहीं है. उसका पैटर्न भी बहुत कम बदलता है. वो यूं कि भुट्टो को अपनी जीत का सौ पैसा यकीन था. उनके विरोधी तो बहुत थे, मगर छितराये हुए. राजनैतिक विरोध की बात करें, तो वो बहुत अलग-थलग था. ऐसा विरोध चुनाव हराने के लिए काफी नहीं. इसी गुमान में भुट्टो ने चुनाव का ऐलान कर दिया. विरोधी पार्टियों को मालूम था. कि अकेले लड़ने पर किसी का कोई चांस नहीं. इसीलिए उन्होंने गठबंधन बनाया. नौ पार्टियों का गठबंधन. इनमें ज्यादातर इस्लामिक पार्टियां थीं. इसका नाम रखा गया- पाकिस्तान नैशनल अलायंस. PNA. इनका कहना था कि भुट्टो इस्लामिक नहीं हैं. भुट्टो का विरोध उनके चुनाव प्रचार की, उनके चुनावी मुद्दों की थीम थी. 7 मार्च, 1977 को चुनाव हुए. नतीजा आया, तो PPP को मिली 155 सीटें. PNA को बस 36 सीटें हासिल हुईं. विरोधियों ने इल्जाम लगाया कि चुनाव में धांधली हुई है. उन्होंने भुट्टो के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए. नीचे एक विडियो का लिंक है. ये 1977 में हुए पाकिस्तान चुनाव के समय का है. प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो एक खुली गाड़ी में सवार होकर लाहौर की एक चुनावी रैली को संबोधित करने जा रहे हैं.
नीचे एक और विडियो है. ये 7 मार्च, यानी वोट डलने के दिन का विडियो है. उसी सिंध का, जहां के भुट्टो थे.
खुद को 'सच्चा मुसलमान' साबित करने की भी कोशिश की इस विरोध ने भुट्टो पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. वो कहने लगे कि PNA को अमेरिका से मदद मिल रही है. फिर उन्होंने खुद को इस्लामिक दिखाने की भी पूरी कोशिश की. शराब पर बैन लगा दिया. नाइट क्लब्स बंद करवा दिए. इतवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश घोषित कर दिया. मगर इन सबका असर नहीं हुआ. भुट्टो के खिलाफ विरोध बढ़ता ही गया. ये विरोध हिंसक भी हो चला था. इसे दबाने के लिए भुट्टो ने एक चालाकी दिखाने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान, ईरान और भारत, तीनों मिलकर पाकिस्तान पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं. मगर भुट्टो की ये तरकीब काम नहीं आई. 28 अप्रैल, 1977 को नैशनल असेंबली में भाषण देते हुए भुट्टो ने कहा कि विदेशी ताकतें उनके खिलाफ विरोध भड़का रही हैं. सबूत गिनाते हुए वो बोले कि इन दिनों पाकिस्तान में ढेर सारा विदेशी रुपया नजर आ रहा है. छह-सात रुपये में एक डॉलर मिल जाता है. भुट्टो बोले-
लोगों पर पैसों की बारिश की जा रही है. ताकि वो मस्जिदों पर चढ़कर अजान पढ़ें. उन्हें जेल जाने के एवज में पैसा दिया जा रहा है. ये PNA की रची साजिश नहीं है. ये अंतरराष्ट्रीय साजिश है. खून के प्यासे लोग मेरे पीछे पड़े हुए हैं.1977 के चुनावों में धांधली के आरोपों को खारिज करते हुए भुट्टो का एक भाषण सुनिए-
हमें तो अपनों ने ही लूटा, औरों में कहां दम था भुट्टो की तमाम कोशिशों के बावजूद उनके खिलाफ विरोध बढ़ता गया. कहते हैं कि भुट्टो इस हद तक मजबूर हो गए थे कि उनकी PNA से बात चल रही थी. मार्च से जुलाई तक चली बातचीत के बाद 3 और 4 जुलाई की दरमियानी रात को दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हो गया था. मगर इससे पहले कि इस समझौते पर अमल हो पाता, भुट्टो का तख्तापलट हो गया. जिन जिया-उल-हक को भुट्टो ने अपना आर्मी चीफ बनाया था, उन्होंने ही भुट्टो की गद्दी छीन ली. ये हुआ 4 और 5 जुलाई, 1972 की दरम्यानी रात को. पाकिस्तान रात को जब सोया, तो लोकतंत्र था. अगली सुबह जगा, तो मालूम हुआ कि सेना का राज फिर लौट आया है. भुट्टो न केवल सत्ता से बेदखल हुए, बल्कि उन्हें जेल भी भेज दिया गया.
इस्लाम, इस्लाम, इस्लाम तख्तापलट करने के बाद जिया-उल-हक पाकिस्तान की जनता से रुबरू हुए. 14 मिनट लंबा उनका भाषण बता रहा था कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान के साथ क्या कुछ होने जा रहा है. जिया ने कहा-
मिस्टर भुट्टो की हुकूमत खत्म हो चुकी है. सारे मुल्क में मार्शल लॉ वापस लगा दिया गया है. मैंने जो किया लोकतंत्र की हिफाजत और मुल्क की भलाई के लिए किया. मेरी कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं है. तीन महीने बाद मैं चीफ मार्शल लॉ अडमिनिस्ट्रेटर की अपनी ये पोस्ट छोड़ दूंगा. जनता के हाथों चुने गए जन प्रतिनिधियों को सत्ता सौंप दूंगा. पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना था. अगर इसे टिकना है, आगे बढ़ना है, तो इसे इस्लाम के साथ ही रहना होगा. इसीलिए मेरा मानना है कि मुल्क में एक इस्लामिक सिस्टम होना चाहिए. हर चीज इस्लामिक तौर-तरीके से होनी चाहिए.नीचे एक लिंक है. तख्तापलट के बाद पाकिस्तान की जनता के नाम ज़िया ने जो संदेश दिया था, ये उसी मौके का विडियो है-

सेना में ज़िया का करियर बहुत औसत रहा था. वो आर्मी चीफ बनने की वरीयता में नहीं थे. टिक्का खान के रिटायर होने के बाद जिन अफसरों में से आर्मी चीफ का नाम तय होना था, उनमें भी ज़िया का नाम नहीं था. जब भुट्टो ने उन्हें सेना प्रमुख बनाया, तो लोग काफी हैरान भी हुए थे. ये ज़िया की ही तस्वीर है. पाकिस्तान को सबसे ज्यादा किसी ने बर्बाद किया, तो वो ज़िया ही थे (फोटो: Getty)
अब शुरू होगी पाकिस्तान की असली बर्बादी जिया तीन महीने में चले जाने का वादा करके आए थे. मगर वो नहीं गए. 11 साल तक बने रहे. वो देश से ऊपर उठ गए. कानून से ऊपर उठ गए. यहां से शुरुआत हुई पाकिस्तान की असल बर्बादी. सऊदी के प्रभाव में यहां इस्लाम के वहाबी मत ने पैर जमा लिया. वहाबी और सलफी इस्लाम की सबसे कट्टर विवेचनाएं हैं. यहां से पाकिस्तान का इस्लामीकरण शुरू हुआ. सेना और बाकी सभी इंस्टिट्यूशन्स के भीतर इस्लाम घुसता चला गया. जिया की हुकूमत ही थी, जिसने कट्टर सुन्नी संगठनों को बढ़ावा देना शुरू किया. ये संगठन घनघोर सांप्रदायिक थे. इनकी नजर में इस्लाम इन्क्लूसिव नहीं, एक्सक्लूसिव था. जिसमें बस इनके बताए 'सच्चे मुसलमानों' के लिए ही जगह थी. जहां शियाओं के लिए भी जगह नहीं थी. ये जिया का ही दौर था, जब पाकिस्तान में इस्लामिक जिहादी बनने लगे. और वो सरहद पार करके दुनिया में आतंकवाद फैलाने लगे. इस लिहाज से देखिए, तो जिया पाकिस्तान की सबसे नालायक औलाद निकले. उन्होंने पाकिस्तान का सत्यानाश कर डाला. अगली किस्त होगी उनके इसी बर्बाद दौर के नाम.

तख्तापलट का सारा इंतजाम कर ज़िया इंग्लैंड भाग गए. वो कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे. अगर तख्तापलट की कोशिश नाकाम रहती, तो उनकी मौत पक्की थी. इसीलिए वो अपने परिवार को साथ लेकर पाकिस्तान से बाहर चले गए. इस बात की भी पूरी आशंका है कि भुट्टो को रास्ते से हटाने में ज़िया को विदेशी ताकतों से मदद मिली होगी. (फोटो: Getty)
जाते-जाते
पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) फैज अली चिश्ती की एक किताब है- बिट्रेअल्स ऑफ अनदर काइंड: इस्लाम, डेमॉक्रेसी ऐंड द आर्मी इन पाकिस्तान. जिया ने भुट्टो के तख्तापलट की जो साजिश की थी, उसमें चिश्ती उनके पार्टनर थे. चिश्ती लिखते हैं. कि तख्तापलट करने से पहले जिया बहुत डरे हुए थे. उन्हें लग रहा था कि अगर वो नाकामयाब होते हैं, तो वो और उनका परिवार मार डाला जाएगा. इसीलिए तख्तापलट का पूरा इंतजाम करने के बाद वो अपने परिवार के साथ इंग्लैंड रवाना हो गए. जाते वक्त उन्होंने चिश्ती से कहा- मुर्शीद, मरवा न देना. चिश्ती का कहना है कि जिया ने तख्तापलट के बाद इसे जो इस्लाम का ऐंगल दिया, वो ऑरिजनल स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं था. चिश्ती ने ये भी लिखा है कि भुट्टो के खिलाफ जो मर्डर का केस खोला गया था, वो एक भुट्टो विरोधी वकील ए के ब्रोही के कहने पर खोला गया था. चिश्ती का कहना है कि इस केस की सुनवाई पक्षपाती थी. शायद इसका मकसद ही भुट्टो को रास्ते से हटाना था.

भुट्टो ने अपनी किताब- इफ आई एम असेसिनेटेड में लिखा है. कि अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने उन्हें धमकाते हुए कहा था. कि अगर वो पाकिस्तान का न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद नहीं करते, तो उनका बहुत बुरा हश्र होगा (फोटो: Getty)
एक और बात. ये भुट्टो के बारे में है. उनके जिस इंटरव्यू के बारे में आपको ऊपर बताया, उसमें ओरियाना ने आखिरी सवाल पूछा-
राष्ट्रपति जी, एक आखिरी सवाल. इस सवाल की क्रूरता के लिए मुझे माफ कीजिएगा. क्या आपको लगता है कि आप टिकेंगे?इसका जवाब देते हुए भुट्टो ने कहा था-
हो सकता है कि मैं कल खत्म हो जाऊं. लेकिन मुझे लगता है कि आज तक जिन-जिल लोगों ने पाकिस्तान में हुकूमत की है, मैं उन सब से लंबा टिकूंगा. पहला कारण ये कि मैं सेहतमंद हूं. मेरे अंदर बहुत ऊर्जा है. मैं काम कर सकता हूं- दिन में 18 घंटे भी काम कर सकता हूं. फिर ये बात भी है कि मैं अभी जवान हूं- बमुश्किल 44 साल का हूं मैं. इंदिरा गांधी से 10 साल छोटा. फिर ये कारण भी है कि मैं जानता हूं कि मैं क्या चाहता हूं. तीसरी दुनिया के देशों में मैं इकलौता नेता हूं जो कि दो विश्व शक्तियों के विरोध के बावजूद सत्ता में आ पाया हूं. 1966 में अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों को बहुत खुशी हुई थी मुझे मुसीबत में फंसा हुआ देखकर. मैं इन तमाम मुश्किलों से इसलिए उबर पाया कि मैं इस राजनीति के पेशे का बुनियादी नियम जानता हूं. राजनीति में कभी-कभी आपको खुद को मूर्ख दिखाना होता है. दूसरों को ये यकीन दिलाना होता है कि बस वो ही समझदार हैं. मगर इसके लिए आपका अंदाज बड़ा नरम और लचीला होना चाहिए. आपने कभी चिड़िया को अपने घोसले में अंडे सेते हुए देखा है? एक नेता के हाथ इतने नरम और लचीले होने चाहिए कि वो एक-एक करके चिड़िया के नीचे से उसके अंडे निकाल ले. यूं कि चिड़िया को भनक भी हो.कितनी अजीब बात है. इतनी चालाकी की बातें करने वाले भुट्टो को बिल्कुल भनक नहीं हुई कि उनके विश्वासपात्र ही नीचे-नीचे उनकी कब्र खोद रहे हैं.
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