कहने वाले कहते हैं. पहले के जमाने में नजूमियों के पास तिलिस्मी ताकतें होती थीं. कांच के गोले में उन्हें भविष्य दिख जाता था. वैसे ही जैसे 'गेम ऑफ थ्रोन्स' में लाल बालों वाली जादूगरनी को आग की लपटों में भविष्य नजर आता था. जिस तारीख पर ये किस्सा शुरू होता है, वो तारीख पाकिस्तान के मुकद्दर की नजूमी थी. क्योंकि इसी दिन दुनिया को भनक लग गई थी. कि आने वाले दिनों का पाकिस्तान कैसा होगा.
ये 68 साल पहले की बात है. 16 अक्टूबर, 1951 की.

इसके बाद तो पाकिस्तान को ऐसी और भी मौतें देखनी थीं पाकिस्तान का रावलपिंडी शहर. वहां एक कंपनी बाग है. ईस्ट इंडिया कंपनी गार्डन. करीब एक लाख लोगों की भीड़ जमा थी. ये सब मुस्लिम लीग के जलसे में शरीक होने आए थे. जिन्ना को कब्र में लेटे दो साल बीत गए थे. जिन्ना के बाद पाकिस्तान के सबसे बड़े नेता थे लियाकत अली खान. मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेता. जिन्हें खुद जिन्ना ने पाकिस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनाया था. लियाकत उस दिन वहां भाषण देने पहुंचे थे. स्टेज तैयार था. लियाकत अपनी जगह से उठे. माइक के पास खड़े हुए. उन्होंने बोलना शुरू किया. मुंह से आवाज निकली- बिरादरान-ए-मिल्लत. यानी, ऐ मेरे हमबिरादरो. इससे पहले कि लियाकत आगे कुछ बोल पाते, धायं-धायं की आवाज गूंजी. दो आवाजें. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने देखा. कि लियाकत सीना पकड़े पीठ के बल स्टेज पर गिर गए हैं. भीड़ सन्न रह गई. वो खुली सी जगह थी. मगर आवाज का एक कतरा भी सुनाई नहीं दे रहा था. इंसान तो इंसान, लगता था कि पंछी भी अपनी आवाज घोंट गए हैं. और फिर तीसरी आवाज गूंजी. धायं. नीचे रेडियो पाकिस्तान का एक लिंक है. ये उसी दिन, उसी मौके का है जब लियाकत का कत्ल हुआ था. आप इसमें सुनेंगे. पहले तालियों की गड़गड़ाहट. फिर लियाकत की आवाज. और फिर गोलियों की धायं-धायं. फिर कहानी खत्म.

लियाकत अली खान मुस्लिम लीग के बड़े नेता थे. लंबे समय तक उन्होंने जिन्ना के साथ काम किया. फिर जब पाकिस्तान बना, तो जिन्ना खुद गर्वनर जनरल बने. उन्होंने लियाकत को प्रधानमंत्री बनाया (फोटो: Getty)
लियाकत अली खान को गोली मार दी गई थी. ये पाकिस्तान की पहली राजनैतिक हत्या थी. आगे होने वाले पॉलिटिकल मर्डर्स की कड़ी में पहली हत्या. तब कोई नहीं जानता था कि ठीक 55 साल बाद उसी शहर, उसी बाग में एक और नेता- बेनजीर भुट्टो मार दी जाएंगी. हालांकि बेनजीर जब मारी गईं, तब वो PM नहीं थीं. मगर प्रधानमंत्री रह तो चुकी थीं.
गोली लगी लियाकत को, मगर गोली चलाई किसने? स्टेज के ठीक सामने की पांत में एक इंसान बैठा था. उस जगह पर, जो CID अधिकारियों के लिए रिजर्व थी. मगर वो CID का आदमी नहीं था. न ही वो उनका कोई अधिकारी-कर्मचारी था. फिर वो वहां कैसे बैठ पाया? ये राज आज तक नहीं खुला. खैर. उस शख्स का नाम था- सईद अकबर. अफगानिस्तान का रहने वाला. उसके पिता ने कभी अफगानिस्तान के राजा अमानुल्लाह खान के लिए जान दी थी. सईद खुद अफगान सेना में रहा. फिर भागकर भारत आ गया. तब अंग्रेजों का राज था हिंदुस्तान पर. उन्होंने सईद अकबर को शरण दी. वो जाकर नॉर्थ वेस्टर्न फ्रंटियर प्रॉविंस (जिसका अब नाम खैबर पख्तूनवा है) में बस गया.

ये 3 दिसंबर, 1946 की तस्वीर है. जिन्ना के साथ हैं वो हैट और लॉन्गकोट पहने जो नजर आ रहे हैं, वो ही हैं लियाकत अली खान. लियाकत जिन्ना के भरोसेमंद साथी थे. बाद में लियाकत और उनके बीच दरार आ गई. जिन्ना की बहन फातिमा ने भी बाद के दिनों में लियाकत की बड़ी आलोचना की. उनके ऊपर जिन्ना को धोखा देने का इल्जाम लगाया (तस्वीर: Getty)
ब्रिटिश सरकार उसे हर महीने एक भत्ता भी देती थी. बंटवारे के बाद ये हिस्सा पाकिस्तान को मिला. साथ में, सईद अकबर भी पाकिस्तान का ही हुआ. अब पाकिस्तानी हुकूमत उसे हर महीने 450 रुपये देने लगी. सोचिए. उस दौर के लिहाज से ये कितनी बड़ी रकम थी. इसी सईद अकबर ने लियाकत अली खान के शरीर में गोलियां दागी थीं. वो लियाकत के ठीक सामने बैठा था. लियाकत को सीधा निशाने पर लेने में उसे कोई मुश्किल नहीं हुई. ये अजीब है कि जिस CID पर उस जलसे की हर चीज सूंघने, हर खतरा पहले ही भांप लेने की जिम्मेदारी थी. उसी CID के लिए आरक्षित कुर्सियों को हत्यारे ने अपने लिए चुना.
सईद अकबर का क्या हुआ? सईद अकबर को गोली मार दी गई. लियाकत अली खान को गोली लगने के बाद वहां जलसे में ऐसी अफरातफरी मची कि पूछिए मत. उसी हंगामे और बलवे में एक पुलिस अफसर ने सईद को गोली मारी. गोली पैर में नहीं मारी गई थी. यूं मारी गई थी कि वो मर ही जाए. क्यों? उसे गिरफ्तार करके उससे पूछताछ करने का खयाल क्यों नहीं आया किसी को? क्या ये जानना जरूरी नहीं था कि सईद ने जो किया, वो किया क्यों? कि क्या इस साजिश में वो बस मोहरा था? असली चाल किसी और की थी?

ये मार्च 1947 की तस्वीर है. भारत के वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन दिल्ली स्थित पालम एयरपोर्ट पर उतरे थे. उन्हें लेने गए थे जवाहर लाल नेहरू और लियाकत अली खान (फोटो: Getty)
इन सवालों का जवाब कभी नहीं मिल सका. क्योंकि जिस सईद अकबर के पास ये जवाब थे, उसे मार डाला गया था. तो क्या सईद को मारकर इस पूरी साजिश के सबसे अहम गवाह को खत्म कर दिया गया? क्या ये लियाकत अली खान की हत्या की साजिश रचने वालों की ही योजना एक हिस्सा था? ये सारे कयास हैं. जो पाकिस्तान में अब तक लगाए जाते हैं. नीचे लियाकत अली खान के अंतिम संस्कार का एक विडियो देखिए-
पाकिस्तान में ऐसी अनसुलझी हत्याओं का लंबा इतिहास है लियाकत अली खान प्रधानमंत्री थे. फिर भी उनकी हत्या की जांच को लेकर कभी कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई. नतीजा ये कि इस मर्डर से जुड़े सवाल आज भी अनसुलझे हैं. ये पाकिस्तान का इकलौता ऐसा केस नहीं है. ऐसी राजनैतिक हत्याओं का एक लंबा इतिहास रहा है वहां. फिर चाहे वो ज़िया-उल-हक़ क्यों न हों. जो एकाएक विमान हादसे में मारे गए. फिर बेनजीर भुट्टो. जो लियाकत गार्डन में मारी गईं. जैसे ही उनकी लाश को वहां से ले जाया गया, दमकल विभाग ने आनन-फानन में पार्क को पानी से धो डाला. और इस तरह वहां बिखरे फॉरेंसिक सबूत भी मिट गए. मिट गए या मिटा दिए गए?

लियाकत को दिन-दहाड़े मारा गया था. मारने वाला पठान था. उसका नाम था सईद अकबर. सईद भी मौके पर ही मार डाला गया. उसकी मौत के साथ लियाकत की हत्या से जुड़े सारे अहम सवाल भी अनसुलझे रह गए. पहले तो यही समझ नहीं आया कि सईद के पास लियाकत को मारने की क्या वजह थी (फोटो: Getty)
क्या लियाकत अमेरिका-परस्त थे? लियाकत अली खान जिन्ना के सहयोगी थे. हां, उन दोनों के बीच आगे चलकर दूरियां आईं. दरार पड़ गई. मगर लियाकत थे तो जिन्ना के साथी ही. जब पाकिस्तान बना, तब सोवियत और अमेरिका के बीच कोल्ड वॉर शुरू हो गया था. दुनिया के बाकी देश इन दो खेमों में से एक को चुन रहे थे. सोवियत और अमेरिका में होड़ थी. कि कौन ज्यादा से ज्यादा देशों को अपने साथ ले लेगा. नेहरू का झुकाव भले सोवियत की तरफ हो. मगर भारत ने दोनों गुटों से अलग रहने का फैसला किया था. गुटनिरपेक्ष रहना मंजूर किया था. उधर ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि जिन्ना अमेरिका के साथ जाने के हिमायती थे. जिन्ना को पाकिस्तान की नीतियां तय करने का ज्यादा समय मिला नहीं. वो मरे, तो लियाकत सबसे ताकतवर बन गए. विदेश नीति जैसी जरूरी चीजें उनके ही वक्त में तय होने लगीं. इसीलिए लोग ये कहते हैं कि वो लियाकत ही थे, जिनके वक्त से पाकिस्तान ने अमेरिका की तरफ झुकना शुरू किया. लियाकत पर अमेरिका-परस्त होने के इल्जाम लगते हैं. उनकी हत्या के पीछे एक ऐंगल ये भी गिनाया जाता है.
लियाकत की हत्या से जुड़ी क्या-क्या कहानियां चलती हैं? कुछ थिअरीज घूमती हैं. कि इस कारण से लियाकत की हत्या कराई गई. शॉर्ट में जानिए, क्या कहते हैं लोग-
- सोवियत ने कराई हत्या: जब लियाकत की हत्या हुई, तो लोग कहने लगे. कि इसके पीछे सोवियत का हाथ हो सकता है. इसलिए कि लियाकत प्रो-अमेरिका थे. सोवियत नहीं चाहता था कि पाकिस्तान अमेरिका के पाले में जाए.

ये है लियाकत अली खान की फैमिली फोटो. उनकी पत्नी राना तस्वीर में नजर आ रही हैं. नीचे बैठे हैं उनके दोनों बेटे- अशरफ और अकबर. ये जून 1947 की तस्वीर है. राना 1990 तक जिंदा रहीं. पाकिस्तानी हुकूमत ने उनको राजदूत भी बनाया. वो ऑल पाकिस्तान विमिन्स असोसिएशन की पहली अध्यक्ष भी रहीं (फोटो: Getty)
- CIA ने कराई हत्या: 1949 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रूमैन ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को स्टेट विजिट पर अमेरिका बुलाया. इस बात से लियाकत चिढ़ गए. उन्हें अमेरिका का इस तरह भारत को तवज्जो देना पसंद नहीं आया. उस वक्त ईरान में पाकिस्तान के राजदूत थे राजा ग़ज़ानफार. उनका एक रूसी राजनयिक के साथ बड़ा दोस्ताना ताल्लुक था. इन्हीं ग़ज़ानफार ने लियाकत को सलाह दी. कि अगर अमेरिका भारत को हाथोहाथ ले रहा है, तो पाकिस्तान को सोवियत के साथ जाना चाहिए. कहते हैं कि लियाकत मॉस्को जाने को तैयार भी हो गए. फिर उस सोवियत राजनयिक की मदद से सोवियत ने लियाकत के पास न्योता भी भेजा.
मगर पाकिस्तान की अमेरिका-परस्त नौकरशाही को ये पसंद नहीं आया. अमेरिका और ब्रिटेन भी नाराज हो गए. पाकिस्तान में ब्रिटेन के हाई-कमिश्नर थे सर लॉरेंस ग्राफ्टे स्मिथ. उन्होंने पाकिस्तान के विदेश मंत्री सर ज़फरूल्लाह खान को धमकी दी. कि अगर लियाकत मॉस्को गए, तो अमेरिका और ब्रिटेन इसे नजरंदाज नहीं कर सकेंगे. ये धमकी ही थी एक तरह की. इस धमकी की वजह से लियाकत डर गए. उन्हें वैसे भी अमेरिका से फंड हासिल करना था. ताकि पाकिस्तान में जरूरी योजनाओं के लिए पैसा आए. सो दबाव में आकर उन्होंने सोवियत जाने से इनकार कर दिया. लोग कहते हैं कि लियाकत ने भले ही सोवियत न जाने का फैसला किया हो, लेकिन अमेरिका को उनके ऊपर भरोसा नहीं रहा. इसीलिए CIA ने लियाकत की हत्या करवा दी.

- मुहाज़िरों को सपोर्ट करने की वजह से मारे गए: लियाकत खुद हिंदुस्तान में पैदा हुए थे. मतलब, बंटवारे के बाद जो हिस्सा पाकिस्तान के पास आया वहां की पैदाइश नहीं थी उनकी. वो पाकिस्तान आए थे. हिंदुस्तान से जितने मुसलमान पाकिस्तान गए, उन्हें वहां मुहाज़िर पुकारा जाता था. मुहाज़िरों को लेकर अच्छी राय नहीं थी लोगों में. आपने आमिर खान की सरफ़रोश देखी है. उसमें नसीरुद्दीन शाह का करेक्टर याद है. जो बंटवारे के समय हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान में बस जाता है. नसीरुद्दीन, यानी सिनेमा का गुलफ़ाम हसन बड़े दर्द के साथ सीमा (सोनाली बेंद्रे) से कहता है-
(पाकिस्तान में) चाहने वाले तो बहुत हैं सीमा जी. लेकिन हाल ये है कि वहां (पाकिस्तान में) आज भी हमें मुहाज़िर कहकर पुकारा जाता है. जब बंटवारे के समय यहां के मुसलमान अपने वतन की उम्मीद में पाकिस्तान पहुंचे, तो वहां के मुसलमान भाइयों ने उन्हें पास बिठाने की बजाय मुहाज़िर कहकर दुत्कार दिया. 50 साल गुजर गए, लेकिन आज भी हम मुहाज़िर हैं. पाकिस्तानी नहीं.कहते हैं कि लियाकत अली खान मुहाज़िरों से बड़ी हमदर्दी रखते थे. शायद इस वजह से कि वो खुद भी एक मुहाज़िर ही थे. लियाकत ने फेडरल सिविल सर्विस नौकरियों में मुहाज़िरों के लिए दो फीसद आरक्षण का इंतजाम किया था. जबकि पाकिस्तान की कुल आबादी में उनकी तादाद जमा डेढ़ फीसद के करीब थी. कहने वाले कहते हैं कि उनकी ये हमदर्दी पाकिस्तान के रसूखदार मुसलमानों को नहीं भाती थी. खासतौर पर पंजाब को. जो कि पाकिस्तान का सबसे असरदार प्रांत था. लियाकत की हत्या के पीछे एक संभावित वजह ये भी गिनाई जाती है.

- विरोधियों ने मरवाया: लियाकत अली खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे. जिन्ना के जाने के बाद उनके कद का कोई नेता पाकिस्तान में नहीं बचा था. मगर ऐसा नहीं कि उनका रास्ता बिल्कुल साफ रहा हो. उन्हें गंभीर चुनौतियां मिल रही थीं. इतनी ज्यादा चुनौतियां कि लियाकत खुद को असुरक्षित महसूस करते थे. उनके एक समकक्ष थे- हुसैन शहीद सुहरावर्दी. जो आगे चलकर कुछ वक्त के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने. सुहरावर्दी लोकप्रिय थे. लियाकत को उनकी लोकप्रियता से असुरक्षा महसूस होती थी. कहते हैं कि इसी वजह से लियाकत बहुत फूंक-फूंककर चलते थे. वो बहुत सोच-समझकर अपने मातहत चुनते थे. लोग कहते हैं. कि हो सकता है लियाकत के राजनैतिक विरोधियों ने उनकी हत्या की साजिश तैयार की हो.
- अदृश्य ऐंगल: कुछ कहते हैं कि सईद अकबर ने गोली चलाई ही नहीं थी. वो कोई और ही था, जिसकी गोली लियाकत को लगी. ऐसी अफवाहें कहती हैं कि सईद के पास लियाकत को मारने की कोई वजह नहीं थी. न वो राजनीति में था. न उसकी लियाकत से कोई पहचान ही थी. फिर दुश्मनी का सवाल ही क्या. ये बात सच भी लगती है. इतने लोगों की भीड़ के सामने खुलेआम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को गोली मारना. सईद के पास इतना बड़ा कदम उठाने या इतना बड़ा जोखिम मोल लेने का कोई कारण नहीं था. ऐसे में ये सही लगता है कि सईद शायद बेबात मारा गया. या फिर वो बस प्यादा था. जिसे लियाकत की हत्या के लिए इस्तेमाल किया गया और फिर लगे हाथों उसे भी कत्ल कर दिया गया.

लियाकत के बाद पाकिस्तान में राजनैतिक अस्थिरता का लंबा दौर चला. एक के बाद एक प्रधानमंत्री आए. सैनिक तानाशाही आई. राजनीति धर्म पर आधारित हो गई. ये 2 जून, 1950 की तस्वीर है. लियाकत खान कनाडा पहुंचे थे. वहां के प्रधानमंत्री लूइस लॉरेंट हाथ मिलाकर उनका स्वागत कर रहे हैं. साथ में हैं लियाकत की पत्नी राना (फोटो: Getty)
लियाकत के जाने का नुकसान क्या हुआ? पाकिस्तान का संविधान बनकर तैयार नहीं हुआ था. दूसरी तरफ भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को ही लागू हो गया था. जैसी कि उम्मीद थी, हिंदुस्तान का संविधान सेकुलर बना था. यहां हर किसी को बराबरी मिली थी. लोगों को अपना धर्म चुनने की आजादी थी. मगर सरकार का, मुल्क का कोई धर्म नहीं था. जिन्ना के गुजरने की वजह से पाकिस्तान में संविधान बनने का काम पहले ही पिछड़ गया था. फिर जब लियाकत की हत्या हुई, तब ये काम और पीछे चला गया. ये बहुत बड़ा नुकसान था. पाकिस्तान की अस्थिरता के पीछे ये एक बड़ा कारण साबित हुई. लियाकत की हत्या के बाद पाकिस्तान में राजनैतिक अस्थिरता का एक लंबा दौर शुरू हुआ. जो कि पाकिस्तान की बर्बादी के पीछे सबसे बड़ी वजह साबित हुआ.
लियाकत वो नुकसान कर गए कि पाकिस्तान अब तक झेल रहा है जिन्ना पाकिस्तान की राजनीति में धर्म को घुसाने के हिमायती नहीं थे. वो इसके खिलाफ थे. मगर उन्हीं के सबसे करीबी राजनैतिक सहयोगी लियाकत का किया है कि पाकिस्तान में हर कहीं धर्म घुसा पड़ा है. बल्कि धर्म से बढ़कर धार्मिक कट्टरता पाकिस्तान की मुसीबत बन गई है. पाकिस्तान में आज जो संविधान लागू है, वो 1973 में लागू हुआ. जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में. इस संविधान का 'ऑब्जेक्टिव रेजॉलूशन' लियाकत अली खान का तैयार किया हुआ है. इस 'ऑब्जेक्टिव रेजॉलूशन' को पढ़िए आप. हर जगह 'अल्लाह' का जिक्र दिखेगा.

जिन्ना को पाकिस्तान में बहुत वक्त नहीं मिला. मगर ये तय था कि वो पाकिस्तान को एक आजाद खयाल लोकतंत्र बनाना चाहते थे. मगर लियाकत अली खान के वक्त से पाकिस्तान के अंदर धर्मांधों ने जड़ जमानी शुरू की (फोटो: Getty)
इसकी पहली लाइन है- इस पूरी कायनात पर बस अल्लाह का राज है. आगे लिखा है कि पाकिस्तान के अंदर लोकतंत्र, आजादी, बराबरी, सहिष्णुता और सामाजिक न्याय, ये तमाम बातें इस्लाम के दायरे के अंदर लागू होंगी. इसके ही मुताबिक बरता जाएगा. कि देश के सारे लोग इस्लाम के मुताबिक, कुरान और सुन्नाह के मुताबिक अपनी जिंदगी बसर करेंगे. हालांकि इसके अंदर एक लाइन ये भी है. कि पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए समुचित नियम बनाए जाएंगे, ताकि वो पूरी आजादी के साथ अपने धर्म- अपनी संस्कृति का पालन कर सकें. मगर कुल मिलाकर ये 'ऑब्जेक्टिव रेजॉलूशन' इस्लाम के साथ नत्थी है. इसी को आधार बनाकर आगे ज़िया-उल-हक ने पाकिस्तान को कट्टर इस्लामिक चरित्र दिया. इतना धर्मांध बनाया कि धर्म ही पाकिस्तान की मुसीबत बन गई. जिस धर्म के साथ जोड़कर पाकिस्तान को बनाया गया था, वही उसकी तबाही का कारण बना. और इस बर्बादी का दोष किसी के सिर से शुरू होता है, तो वो लियाकत अली खान ही हैं.

ऐसा नहीं कि बस नेता भाषण देते हों लियाकत बाग में. ये आतंकवादी हाफिज सईद है. उसकी ये तस्वीर लियाकत बाग की ही है. जहां एक रैली के दौरान उसने भाषण दिया. ये तस्वीर देखिए और समझिए. कि पाकिस्तान कहां से चलकर कहां पहुंचा है. हाफिज जैसे लोग इस्लाम को भुनाकर अपने गंदे मंसूबे पूरे कर पाते हैं, तो इसका दोष भी लियाकत के नाम से ही शुरू होता है (फोटो: ट्विटर)
जाते-जाते जिस कंपनी गार्डन में लियाकत अली खान की हत्या हुई, उसका नाम बदल दिया गया बाद में. नया नाम मिला- लियाकत बाग. नाम बदला, तो शायद उस बाग के साथ लियाकत की किस्मत भी नत्थी हो गई. हमने ऊपर बताया था न. कि यहीं पर 55 साल बाद बेनजीर भी ऐसे ही कत्ल कर दी गई थीं.
एक और बात
पाकिस्तान में पहला तख्तापलट लियाकत खान का ही होने वाला था. वो साल था 1949. नौकरशाहों और सेनावालों को नेता फूटी आंखों नहीं सुहा रहे थे. उनके मुताबिक, पाकिस्तान अपने हुक्मरानों की वजह से ही पूरा कश्मीर नहीं ले पाया. पाकिस्तानी सेना में एक जनरल था. नाम था- अकबर खान. उसने एक साजिश रची- रावलपिंडी कॉन्सपिरेसी. अकबर के साथ 12 और सैनिक भी थे. उनका इरादा था लियाकत का तख्तापलट. फरवरी-मार्च 1951 में जाकर इस साजिश का भांडा फूटा. वक्त रहते चीजें पता लग गईं और लियाकत खान की कुर्सी बच गई. नीचे एक लिंक है. पाकिस्तान की पहली सालगिरह पर लियाकत खान का दिया भाषण आप यहां सुन सकते हैं. सुनिए, वो बता रहे हैं कि उन शुरुआती दिनों में पाकिस्तान के सामने क्या मुश्किलें आई थीं. आपको इसमें हिंदुस्तान का भी जिक्र मिलेगा-
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