एक ऐसी बूटी है जिसे आज से 118 साल पहले दिल्ली के एक छोटे से दवाखाने में बनाया गया. लेकिन सिर्फ रिश्तों के रूप नहीं बदलते, दवाओं के भी बदलते हैं. तो दवा बन गई शरबत. और ऐसा शरबत जिसके मुरीद भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ हैं. कहते हैं कि तपती गर्मियों में तबीयत खुश कर देने वाले इस शरबत को लड़के इंजन में डाल देते थे, ताकि गाड़ी ओवरहीट न हो जाए. क्या है दवा से शरबत बने इस लाल पानी की कहानी? और कैसे बंटवारे ने इस कंपनी को नुकसान नहीं, बल्कि जबरदस्त फायदा पहुंचाया?
एक दवा जो शरबत बन गई, भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी हैं चाहनेवाले, कहानी रूह अफ़ज़ा की
Rooh Afza को 118 साल पहले दिल्ली के एक छोटे से दवाखाने में बनाया गया. लेकिन सिर्फ रिश्तों के रूप नहीं बदलते, दवाओं के भी बदलते हैं. तो दवा बन गई शरबत. और ऐसा शरबत जिसके मुरीद भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ हैं.

रूह को सुकून
साल 1907 की गर्मियों के दिन थे. उन दिनों दिल्ली में भीषण लू चल रही थी. कमीज निचोड़ दो तो आधा लीटर पानी निकल जाए, ऐसी गर्मी थी. आम लोग परेशान थे. नतीजतन, डिहाइड्रेशन, उल्टी, डायरिया जैसी तमाम समस्याओं से जूझ रहे लोग वैद्य-हकीमों के चक्कर काट रहे थे. दिल्ली के लाल कुआं बाजार में एक छोटा सा दवाखाना था—हमदर्द दवाखाना. यहां एक यूनानी हकीम बैठते थे. नाम था हफ़ीज़ अब्दुल मजीद. लोग उनके पास शिकायतें लेकर पहुंच रहे थे.
गर्मी में अक्सर ज्यादा खाने की इच्छा नहीं होती और सादा पानी भी कितना ही पिया जाए! हालात को देखकर हकीम हफीज अब्दुल मजीद को एक आइडिया सूझा. क्या था ये आइडिया? दरअसल, इन तमाम बीमारियों से लोगों के शरीर में पानी की कमी हो रही थी. यह समस्या आम हो चुकी थी.
हकीम हफीज ने सोचा कि क्यों न कोई ऐसी बूटी बनाई जाए जिससे पानी के साथ शरीर में जरूरी पोषण भी पूरा किया जा सके—कुछ ऑल-इन-वन टाइप! उन्होंने एक बड़े कड़ाहे में कई फलों, जड़ी-बूटियों, फूलों और मसालों को मिलाकर एक सिरप तैयार किया. इसमें संतरा, तरबूज, अनानास और सेब जैसे फल मिलाए गए. इसके अलावा केवड़ा, धनिया, खसखस (पोस्ता दाना), गुलाब और कमल के फूलों के अर्क को भी शामिल किया गया. तैयार होने के बाद यह एकदम गाढ़े लाल रंग जैसा दिखता था. अब जो भी हकीम मजीद के पास अपनी शिकायत लेकर आता, वे उन्हें यही सिरप दे देते थे.
तब ग्राहक इसे कांच की बोतलों या बर्तनों में ले जाया करते थे. खबर फैल गई कि हकीम जी कोई रामबाण बूटी बांट रहे हैं. खरीदने वालों का तांता लग गया. यह तो दवाई थी, लेकिन लोगों में इसे लेकर गजब की दीवानगी देखने को मिली. खरीद और बिक्री का सिलसिला बढ़ता गया. और एक साल के भीतर यह इतना प्रसिद्ध हो गया कि इसे एक औपचारिक नाम देने की जरूरत पड़ गई. हकीम मजीद ने इसे नाम दिया 'रूह अफज़ा' (माने रूह को ताजगी देने वाला).
अब जब यह हरदिल अज़ीज़ ड्रिंक बन ही चुका था, तो हकीम मजीद ने इसे बाज़ार में उतारने का फैसला किया.

पुरानी दिल्ली के हौज काजी इलाके में एक प्रिंटिंग वाले के पास गए और एक लेबल डिज़ाइन कराया. इस पर रूह अफज़ा को तीन भाषाओं में लिखा गया था—हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू. आज भी इस पैकेजिंग में कोई बदलाव नहीं आया है. अब तक इस काम में उनका पूरा परिवार शामिल हो गया था—उनकी पत्नी राबिया बेगम, बड़े बेटे अब्दुल हमीद और छोटे बेटे मोहम्मद सईद. हकीम मजीद की निगरानी में मैन्युफैक्चरिंग का काम शुरू हुआ. बाज़ार में पकड़ बन चुकी थी. लेकिन साल 1922 में हकीम मजीद का इंतकाल हो गया. अब कमान पूरी तरह उनके बेटों के हाथ में आ गई.
छोटे बेटे मोहम्मद सईद मुस्लिम लीग से प्रेरित थे, जो अलग मुस्लिम देश पाकिस्तान की वकालत कर रही थी. बंटवारे के बाद, 1948 में, वे पाकिस्तान शिफ्ट हो गए. उनके साथ रूह अफज़ा का नुस्खा तो था ही, जिसकी बदौलत कराची में उन्होंने इसे बनाने का काम शुरू किया. इधर भारत में, मूल कंपनी का काम बड़े बेटे अब्दुल हमीद संभाल रहे थे.

पाकिस्तान में दोबारा इस ब्रांड को स्थापित करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण था. वहां केवड़ा की सीमित पैदावार ही थी, इसलिए सिरप में कुछ बदलाव किए गए. जैसे, केवड़ा की जगह गुल-ए-बहार (Spring Rose) और तुरंज (Citron) फल के फूल का इस्तेमाल किया गया. धीरे-धीरे, इसने अपनी पहचान बना ही ली.
हकीम सईद को विज्ञापन की ताकत का अंदाजा था. वह जानते थे कि अगर किसी चीज़ की आदत डलवा दी जाए, तो लोग उसे ज़िंदगी भर अपने साथ लेकर चलते हैं. ऐसा कई दूसरे ब्रांड्स के साथ भी हुआ है.

रूह अफज़ा ने बंटवारे, लाइसेंस राज और फिज़ी ड्रिंक्स के दौर को देखा, लेकिन इन सबके बावजूद इसका क्रेज आज भी बरकरार है. अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में रूह अफज़ा से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा मिलता है. दरअसल, जब 1989 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था, तो पेशावर में कई शरणार्थी शिविर बनाए गए थे. राहत सामग्री में रूह अफज़ा की बोतलें भी भेजी जाती थीं.
खपत को देखकर यह सवाल उठा कि शिविर में हर दिन इतनी ज्यादा बोतलों का इस्तेमाल कैसे हो रहा है? जांच करने पर पता चला कि अफगानों का रूह अफज़ा पीने का अपना अनोखा तरीका था—वे बोतल का ढक्कन खोलते और बिना पानी मिलाए सीधे सिरप पी जाते थे.
रिपोर्ट में एक और किस्से का जिक्र किया गया है. बताया गया कि 1989 के दौर में, बॉर्डर के आसपास के इलाकों और पंजाब के कई हिस्सों में, जब कार इंजन ओवरहीट हो जाता था, तो लोग उसे ठंडा करने के लिए रूह अफज़ा डाल देते थे. रूह अफज़ा प्लांट में तो कई वर्कर्स इसे रोटी में डालकर फांक जाते थे.

कराची-लाहौर की सड़कें हों या पुरानी दिल्ली की गलियां, हर जगह आपको रूह अफज़ा शरबत-ए-मोहब्बत, लस्सी या फालूदा-कुल्फी के साथ सजी हुई दिख जाएगी। दशकों से, भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध खराब हुए हों, लेकिन इस ड्रिंक का अतीत दोनों देश साझा करते हैं।
जैसे आज भी, दोनों ही देशों में इफ्तार और ईद की मेजों पर रूह अफज़ा के गिलास परोसे जाते हैं।
वीडियो: तारीख: रूह अफ़ज़ा, जो आज हमारा गला तर करती है,, कभी एक दवा हुआ करती थी