सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि गिरफ्तारी के वक्त पुलिस अपनी सीमा ना लांघे. यानी कि वो नियमों के भीतर रहकर ही किसी को गिरफ्तार करे. लेकिन, भारत में गिरफ्तारी के नियम (Rules of Arrest in India) हैं क्या? गिरफ्तारी के बाद की क्या प्रक्रिया होती है? और गिरफ्तार हुए व्यक्ति के पास क्या-क्या अधिकार होते हैं? आज इन सबके बारे में जानेंगे.
पुलिस कब बिना वारंट अरेस्ट करती है? हथकड़ी कब लगाई जाती है? सारे नियम जान लीजिए
वारंट में कौन-कौन सी जानकारी जरूरी है? बिना वारंट के कब गिरफ्तारी हो सकती है? अरेस्ट का मेमोरेंडम किसे दिया जाता है? महिलाओं की गिरफ्तारी के लिए कौन सी बातों का ध्यान रखना जरूरी है? हथकड़ी कब लगाई जा सकती है? आरोपी की सेहत की जिम्मेदारी किसकी है? इन सब सवालों के जवाब जानेंगे.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 के मुताबिक, किसी को अरेस्ट करते वक्त पुलिस को अपना सही पहचान पत्र दिखाना होता है. इस पर अधिकारी का नाम और उसका पद स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए. इसके बाद आरोपी व्यक्ति वारंट के बारे में पूछ सकता है.
वारंट पर क्या-क्या लिखा होना चाहिए?पुलिस वारंट दिखाकर भी गिरफ्तार कर सकती है और कुछ मामलों में बिना वारंट के भी. जिन मामलों में वारंट दिखाया जाता है, उनमें वारंट पर कोर्ट के पीठासीन अधिकार (प्रिसाइडिंग ऑफिसर) के हस्ताक्षर होने चाहिए. साथ में उस पर कोर्ट की मुहर भी लगी होनी चाहिए. वारंट पर कुछ और बातें भी होनी चाहिए-
- आरोपी का नाम और पता.
- आरोप क्या-क्या लगे हैं
इनमें से किसी भी जानकारी के ना होने पर गिरफ्तारी को गैर कानूनी माना जाता है. पुलिस को स्पष्ट रूप से गिरफ्तारी का कारण बताना होता है और ये भी कि जमानत मिल सकती है या नहीं (BNSS 47). सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इसके लिए आर्टिकल 22 (1) का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई गई, तो ऐसी गिरफ्तारी को गैरकानूनी माना जाएगा.
वारंट दो तरह के हो सकते हैं- जमानती और गैर जमानती. जमानती वारंट में कोर्ट जमानत की शर्तें तय करता है. अगर आरोपी ये सुनिश्चित करता है कि वो तय शर्तों का पालन करेगा तो उसे रिहा किया जा सकता है. आरोपी व्यक्ति से संबंधित किसी जगह की तलाशी के लिए भी पुलिस को ऐसा ही करना होता है.
बिना वारंट के भी अरेस्ट कर सकती है पुलिसBNSS के सेक्शन 35 के अनुसार, ‘संज्ञेय अपराध’ के मामलों में बिना वारंट या बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के भी गिरफ्तारी की जा सकती है. ‘संज्ञेय अपराध’ माने हत्या, बलात्कार, डकैती, चोरी, राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना आदि जैसे अधिक गंभीर अपराध. इसमें एक और शर्त है. ऐसे मामलों में जहां सजा 3 साल से कम है और आरोपी गंभीर बीमारी से पीड़ित है या 60 वर्ष से अधिक उम्र का है… ऐसी गिरफ्तारी केवल पुलिस उपाधीक्षक (DSP) की अनुमति से की जा सकती है.
BNSS (36) में ही बताया गया है कि गिरफ्तारी का ज्ञापन तैयार किया जाएगा. उस पर गवाह और गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर होंगे. गिरफ्तारी और वारंट की जानकारी, आरोपी के परिवार या दोस्त या उसके द्वारा नॉमिनेट किए गए व्यक्ति को दी जाएगी. ये बताना भी जरूरी है कि गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को कहां रखा गया है (BNSS 48).
महिलाओं की गिरफ्तारी के लिए जरूरी बातेंकिसी महिला की गिरफ्तारी महिला पुलिस अधिकारी ही कर सकती है (BNSS-43). आपात स्थिति में इसके अपवाद हो सकते हैं. लेकिन उस स्थिति में भी पुरूष पुलिस अधिकारी को महिला को छूने का अधिकार नहीं है. किसी महिला की गिरफ्तारी रात में की जानी है, तो ऐसी स्थिति में प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की लिखित अनुमति जरूरी है.
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हथकड़ी कब लगाई जा सकती है?सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के मुताबिक, सामान्य स्थिति में गिरफ्तार व्यक्ति को हथकड़ी नहीं लगाई जानी चाहिए. हथकड़ी तभी लगाई जा सकती है जब व्यक्ति हिंसक हो, भागने का या जान देने का प्रयास कर रहा हो. इसके अलावा पुलिस अधिकारी अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए भी निर्णय ले सकता है. मसलन कि आदतन अपराध के मामले में, गिरफ्तारी या कोर्ट में पेशी के वक्त भी हथकड़ी लगाई जा सकती है (BNSS 43). आतंकवादी या मादक पदार्थ से संबंधित अपराध, एसिड अटैक, नकली नोट, मानव तस्करी, बाल यौन अपराध या राज्य के विरुद्ध अपराध के मामले में भी ऐसा किया जा सकता है.
आरोपी की सेहत की जिम्मेदारीगिरफ्तार व्यक्ति जब तक पुलिस की कस्टडी में होता है, तब तक उसकी सेहत और सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की होती है (BNSS 56). एक मेडिकल ऑफिसर उसके स्वास्थ्य की जांच करता है और रिपोर्ट उसके परिवार को भी दी जाती है (BNSS 53). महिला आरोपी की स्थिति में शरीर की जांच सिर्फ महिला मेडिकल ऑफिसर ही कर सकती हैं.
अगर व्यक्ति को रेप या रेप के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, तो पुलिस के आवेदन पर बिना किसी देरी के जांच की जाती है. मेडिकल ऑफिसर आरोपी का DNA प्रोफाइल तैयार करते हैं और उसको जांच अधिकारी के पास भेजते हैं.
गिरफ्तारी के बाद क्या?गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है. हालांकि, पूरी पूछताछ के लिए ऐसा नहीं है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील कुमैल हैदर ने लल्लनटॉप को बताया कि गिरफ्तार व्यक्ति को अरेस्ट के 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश करना जरूरी है. अगर गिरफ्तारी के दौरान किसी भी नियम का उल्लंघन हुआ है तो आरोपी उसकी शिकायत कोर्ट से कर सकता है.
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