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दुश्मन का सिर उतार लेने वाले नागा की धरती कैसे बन गई 'डिस्टर्ब्ड एरिया'?

नागालैंड को फिर छह महीने के लिए ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया है.

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नगालैंड को इससे पहले 30 दिसंबर, 2019 को भी छह महीने के लिए ही अशांत क्षेत्र घोषित किया गया था. अब जब 30 जून को इसकी मियाद ख़त्म हुई है तो इसे फिर छह महीने बढ़ा दिया गया है. (फाइल फोटो – India Today, Magzter)
नॉर्थ-ईस्ट. देश की उत्तर-पूर्वी बेल्ट. ये एक ऐसी जगह है, जहां हम ‘घूमने जाने’ का प्लान बनाते हैं. कसैली सच्चाई ये है कि इन घूमने जाने के प्लान के अलावा नॉर्थ-ईस्ट हमारी बातों में, हमारे ज़िक्रों में, फ़िक्रों में शामिल नहीं रहता. इसलिए जब हम नॉर्थ-ईस्ट के किसी राज्य की ख़बर आपको बताते हैं, तो शुरुआत करनी पड़ती है उसके बारे में मोटा-मोटी जानकारी देने से.
आज बात नागालैंड की करनी है.
# नागालैंड. राजधानी कोहिमा. सबसे बड़ा शहर- दीमापुर.
# पिछले एक दशक से लगातार नागालैंड की आर्थिक विकास दर 10 फीसदी के आस-पास की रही है. टू गुड.
# नागालैंड देश के सबसे छोटे राज्यों में से है. कुल क्षेत्रफल- करीब 16,578 वर्ग किमी.
और कहते हैं छोटा परिवार-सुखी परिवार. लेकिन नागालैंड सुखी नहीं है. अशांत है. ऐलानिया तौर पर, कानूनी तौर पर अशांत है.
Untitled Design (14) नागालैंड का नक्शा. (फोटो- Map Of India.com)

ख़बर क्या है?

केंद्र सरकार ने नागालैंड को अगले छह महीने के लिए ‘अशांत क्षेत्र’ (Disturbed Area) घोषित कर दिया है. दिसंबर तक ये दर्ज़ा बरकरार रहेगा. गृह मंत्रालय ने इससे जुड़ा नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है. नोटिफिकेशन कहता है –
“नागालैंड राज्य की सीमा के भीतर आने वाला क्षेत्र ऐसी अशांत और ख़तरनाक स्थिति में है, जिससे वहां नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए सशस्त्र बलों का प्रयोग करना आवश्यक है.”

अशांत क्षेत्र का दर्ज़ा, लेकिन क्यों?

अगर मैं आपसे पूूछूं कि हिंदुस्तान की सबसे पुरानी और खूंखार ‘इंसरजेंसी’ या ‘उग्रवाद’ समस्या कहां की है? शायद आपका जवाब हो- कश्मीर. मुबारक हो, आपका जवाब ग़लत है.
सही जवाब है- कश्मीर से दो हज़ार किलोमीटर दूर नागालैंड. नागा इंसरजेंसी भारत ही नहीं, दुनिया की  सबसे पुरानी इंसरजेंसी है. जो भारत के आज़ाद होने के भी पहले से चली आ रही है. एक ‘आज़ाद नागालैंड’ की मांग के साथ शुरू हुई नागा इंसरजेंसी से बड़ी और स्पष्ट चुनौती की मिसाल आज़ाद भारत के इतिहास में कहीं नहीं मिलती.
इसकी वजह से राज्य के हालात लगातार अशांत बने हैं. नागालैंड की दशकों से चली आ रही इंसरजेंसी का अंत करने के लिए नागा शांति समझौते की पेशकश की गई है. इसके बारे में हम 2018 से सुनते आ रहे हैं, लेकिन अब तक शांति समझौता मुकम्मल नहीं हो पाया है.
मोदी सरकार 2.0 में केंद्र और नागा सशस्त्र बलों के बीच बात आगे बढ़ी. अक्टूबर, 2019 में प्रमुख अलगाववादी दल नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-इसाक मुइवाह (एनएससीएन-आईएम) की दिल्ली में केंद्र के साथ बैठक भी हुई.
केंद्र सरकार ने उनकी तीन में से दो मांगों को मान लिया.
पहली मांग– अरुणाचल, मणिपुर और असम की तरह नागा समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को संरक्षण देना.
दूसरी मांग– समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देना.
लेकिन बात तीसरी मांग पर अटक गई. नागालैंड के अलग झंडे और अलग संविधान की मांग. फिलहाल गतिरोधों का अंत करने की कोशिश जारी है. हालात को काबू में रखने के लिए राज्य को ‘अशांत क्षेत्र’ करार दे दिया गया है.
Nagaland 5 एक फरवरी 2020 की फोटो. नागालैंड में बने वीर स्मृति मेमोरियल में जुटे जवान. ये मेमोरियल असम राइफल्स की तरफ से बनवाया गया है. इंडियन आर्मी और असम राइफल्स के उन 357 जवानों की याद में, जो इतने साल से चले आ रहे नागा संघर्ष में मारे गए हैं. (फोटो – PTI)

अशांत क्षेत्र: क्या होता है, कौन और कैसे तय करता है?

देश में किसी भी स्थान को अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार गृह मंत्रालय के पास होता है. सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, 1958 धारा 3 के तहत. सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम यानी The Armed Forces (Special Power) Act यानी AFSPA.
AFSPA की धारा-3 केंद्र सरकार या राज्य के गवर्नर को ये शक्ति देती है कि अगर उन्हें किसी राज्य या राज्य के किसी स्थान विशेष के हालात इस हद तक चिंताजनक, असामान्य और ख़तरनाक लगते हैं कि उन्हें वहां आर्म्ड फोर्सेज़ के इस्तेमाल की नौबत लगे, तो वे उस क्षेत्र विशेष या पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र का दर्ज़ा दे सकते हैं.
नागालैंड को इससे पहले 30 दिसंबर, 2019 को भी छह महीने के लिए ही अशांत क्षेत्र घोषित किया गया था. अब जब 30 जून को इसकी मियाद ख़त्म हुई, तो इसे फिर छह महीने बढ़ा दिया गया है.
Nagaland Notification नगालैंड को अशांत क्षेत्र घोषित करने वाला दिसंबर का नोटिफिकेशन. अब इसे आगे बढ़ा दिया गया है. (फोटो- Home Ministry)

नागालैंड का इतिहास, जिसने उसे 'डिस्टर्ब्ड एरिया' बना दिया

अंग्रेज़ हिंदुस्तान आए, तो पहले मैदान पर चले. फिर वो पूरब में पहाड़ों की तरफ बढ़े. 1826 में वो पहुंचे असम. लेकिन उनको चैन नहीं आया. वो संसाधनों को हथियाने के चक्कर में और आगे गए, जंगलों-पहाड़ों की तरफ. और इस तरह वो पहुंचे उस इलाके में, जिसे नागा हिल्स कहा जाता है. इलाके का नाम पड़ा था उन जनजातियों के नाम पर, जो उस इलाके में बसती थीं. नागा एक अकेली कौम का नाम नहीं है. ये जनजातियों का एक समूह है. हर जनजाति अपने-आप में अनोखी होती है, लेकिन कुछ चीज़ें इन्हें ‘नागा’ पहचान में बांधती हैं.
मिसाल के लिए एक वक्त था जब कई नागा कबीलों में सिर उतार लेने की परंपरा थी. एक नागा के लिए अपने दुश्मन का सिर उतार लेने से ज़्यादा वीरता वाली कोई और बात नहीं होती थी. इस परंपरा से अंग्रेज़ बहुत खौफ खाते थे. इलाके को काबू में लाने के लिए ही कोहिमा में अंग्रेज़ों ने छावनी बनाई थी. कोहिमा आज नागालैंड की राजधानी है. 1881 में नागा हिल्स आधिकारिक रूप से गुलाम भारत का हिस्सा बन गए थे. लेकिन अंग्रेज़ों के दावे को नागाओं ने कभी माना नहीं. बड़ी लड़ाइयां छिट-पुट झड़पों में बदलीं, लेकिन बंद नहीं हुईं. 1918 में नागा क्लब बना, जिसने 1929 में आए साइमन कमीशन से कहा,
‘हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाए. हम पुराने वक्त में जैसे रहते आए थे, वैसे ही रहना चाहते हैं’

आज़ाद भारत में इंसरजेंसी की शुरुआत

1946 में नागा नेता अंगामी ज़ापू फिज़ो ने नागा नेशनल काउंसिल (NNC) बनाया. पहले NNC की मांग ये थी कि नागा हिल्स भारत में रहें, लेकिन उन्हें स्वायत्ता दे दी जाए. लेकिन जब अंग्रेज़ भारत से जाने को हुआ, तब देश की और रियासतों की तरह ही नागा गुटों ने भी आज़ाद भारत से अलग रहने की ख्वाहिश जता दी. 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान ने खुद को हिंदुस्तान से अलग मुल्क घोषित कर दिया. पाकिस्तान बनने के शोर में ये बात दब गई कि इसी दिन NNC ने भी नागालैंड को एक आज़ाद मुल्क घोषित कर दिया था. भारत ने पाकिस्तान को बतौर मुल्क मान्यता दी. नागालैंड को न मान्यता मिली, न ज़्यादा ध्यान दिया गया.
29 जून, 1947 को असम के गवर्नर और नागा नेता टी सखरी और अलीबा इम्ति के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते में 9 बिंदु थे. फिज़ो इस समझौते का हिस्सा नहीं बने और उन्होंने 9 के 9 बिंदुओं को शिफ्ट डिलीट कर दिया. माने खारिज.
अंगामी ज़ापू फिज़ो अंगामी ज़ापू फिज़ो आधुनिक नागा आंदोलन के जनक थे.

आज़ादी के बाद नागा रेफरेंडम की नौबत क्यों आई?

1951 में नागा गुटों ने (जिनमें NNC सबसे आगे था) नागालैंड में एक रेफरेंडम करवा लिया. राय ये कि ‘हम हिंदुस्तान से अलग एक आज़ाद मुल्क बने रहना चाहते हैं.’ भारत सरकार (माने नेहरू) ने इस रेफरेंडम को मानने से इनकार कर दिया. आधिकारिक तौर पर नागा इलाके असम का हिस्सा थे.
तो फिज़ो एक कदम और आगे बढ़े. 22 मार्च, 1956 को उन्होंने नागा फेडरल गवर्नमेंट (NFG)बनाई. ये नागाओं की अंडरग्राउंड सरकार थी. अंडरग्राउंड इसलिए कि ग्राउंड के ऊपर तो भारत सरकार थी और एक ग्राउंड पर एक ही सरकार चल सकती है. लेकिन भारत को NFG से समस्या नहीं थी. समस्या थी नागा फेडरल आर्मी (NFA) से, जो NFG को रिपोर्ट करती थी.
NFA का ज़िंदगी में एक्कै मकसद था – नागालैंड को भारत से तोड़कर अलग मुल्क बनाना. वो भी बंदूक के दम पर. लेकिन बंदूकें तो भारत के पास भी थीं. इसीलिए NFA से निपटने का काम मिला भारत की फौज को. अप्रैल 1956 में फौज ने नागालैंड में कार्रवाई शुरू कर दी. NFA पर दबाव बना. फिज़ो को साल खत्म होने से पहले जान बचाकर पूर्वी पाकिस्तान में छिपना पड़ा.
Naga Fedaral Government नागा फेडरल गवमेंट के अधिकारियों के साथ नागा आर्मी के लड़ाके. (फोटोः एनएनसी)

AFSPA की ज़रूरत क्यों पड़ी?

जब फौज नागालैंड गई, तो ये किसी ने नहीं सोचा था कि नागा गुट कुछ महीनों या फिर साल-दो साल से ज़्यादा टिक पाएंगे. आखिर ये वही फौज थी, जो कुछ ही साल पहले दूसरे महायुद्ध में दुनियाभर में लड़कर लौटी थी. ब्रिटेन कभी न जीत पाता अगर उसके पास हिंदुस्तान की फौज न होती. लेकिन नागा गुट और NFA टिके.
नागा इलाकों के पहाड़ों और जंगलों में छापामार लड़ाई जीतना बेहद मुश्किल था. कई इलाकों के तो नक्शे भी नहीं थे. फौज भेजने के दो साल बीतने के बाद भारत सरकार का धीरज कुछ टूटा और ये तय पाया गया कि फौज को नागा गुटों के Chutzpah (हुत्सपा भयंकर दुस्साहस) से निपटने के लिए ज़्यादा अधिकारों की ज़रूरत है. 1958 में आया हुत्सपा का जवाब AFSPA. सही पकड़े हैं. AFSPA कश्मीर नहीं, नागा हिल्स (नागालैंड) के लिए लाया गया था. AFSPA के आने के बाद नागा गुटों पर दबाव बढ़ा, तो फिज़ो 1960 में पूर्वी पाकिस्तान छोड़कर लंदन चले गए.
लेकिन सेना इस मुश्किल का हल नहीं निकाल पाई. इसी वजह से इलाके के लोगों को और ज्यादा हक देकर शांत करने की कोशिश हुई. 1963 में नागा हिल्स (जो तब असम राज्य का एक ज़िला थे) और त्यूएनसांग (जो तब नेफा का हिस्सा था) को मिलाकर नागालैंड राज्य बना दिया गया. लेकिन अलगाववादी दल और राज्य की अशांति बरकरार रही. एनएनसी गया तो एनएससीएन-आईएम आ गया. और अब इसी समस्या को हल करने के लिए नागा शांति समझौता, नागालैंड को अशांत क्षेत्र घोषित कर अधिकार में लेने जैसी कवायदें चल रही हैं.

कहां-कहां लग चुका है AFSPA?

अब तक नागालैंड के अलावा असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश में AFSPA लग चुका है. या तो पूरे राज्य या इनके कुछ हिस्सों को कुछ-कुछ समय के लिए 'डिस्टर्ब्ड एरिया' यानी 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया जा चुका है.
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में भी AFSPA लग चुका है.

नागरिकों की ज़िंदगी पर कैसे असर पड़ता है?

जिस क्षेत्र में AFSPA लगता है, वहां काफी चीजें सशस्त्र बलों के ही नियंत्रण में आ जाती हैं. अगर उन्हें लगता है कि कोई व्यक्ति कानून-व्यवस्था के ख़िलाफ काम कर रहा है, तो सशस्त्र बल तीन तरह के बड़े कदम उठा सकते हैं -
1. बिना वॉरंट के सर्च करना.
2. बिना वॉरंट के अरेस्ट करना.
3. स्थिति बिगड़ने पर, किसी से ख़तरा महसूस होने पर बल प्रयोग करना, गन फायर तक करना.
AFSPA के यही प्रोविज़न हैं, जिनकी मुख़ालफ़त में लगातार तमाम मानवाधिकार संगठन आवाज़ उठाते रहे हैं.
जब AFSPA और इसके विरोध की बात आती है, तो इरोम शर्मिला का ज़िक्र भी ज़रूरी हो जाता है. एक्टिविस्ट, जिन्होंने 2000 से लेकर 2016 तक, 16 साल तक भूख हड़ताल की. सिर्फ AFSPA को हटाए जाने की मांग को लेकर.
तो फिलहाल नागालैंड AFSPA के तहत अशांत क्षेत्र घोषित हो चुका है. सरकार का लगातार कहना है कि नागा शांति समझौता जल्द ही किसी मुकाम तक पहुंचेगा और राज्य में हालात सुधरेंगे. फिलहाल छह महीने तक अशांत क्षेत्र का दर्ज़ा रहेगा.
फिर कोविड क्राइसिस के बीच छह महीने तो यूं भी हमारा नॉर्थ-ईस्ट ‘घूमने’ का प्लान बनना मुश्किल है. तो क्यों न ये छह महीने नॉर्थ-ईस्ट को भी उतना ही जानने, उतना ही अपनाने में बिता दिए जाएं, जितना कि हम यूपी, बिहार, दिल्ली और महाराष्ट्र को जानते हैं.
..और हां, शुरुआत ‘सेवन सिस्टर्स’ टर्म को जानने से कीजिएगा. इसे अभी ही गुगलिया लीजिए.


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