मैं गीता पर हाथ रख कर कसम खाता हूं कि जो भी कहूंगा सच कहूंगा.मुझे पूरा यकीन है ये लाइन आपने किसी न किसी फिल्म में जरूर ही देखी-सुनी होगी. फिल्मों में जब भी कोर्ट में किसी को गवाही के लिए बुलाया जाता है तो उसे गीता पर हाथ रख कर सच बोलने की कसम खाते दिखाया जाता है. कभी आपने सोचा है कि इस हिसाब से तो हर धर्म के हिसाब से उसके धर्म की किताब कोर्ट में रखवानी पड़ती होगी. बाकी धर्म वाले क्या अपने धर्म की किताब पर हाथ रख कर कसम खाते हैं? कोर्ट में कसम खाने का क्या मतलब है, इसका कोई सिस्टम भी है या यह सब फिल्मी बातें हैं? आइए जानते हैं उस कसम के बारे में जिसे खाकर फिल्मों में गवाही देते हैं. कोर्ट में कसम का सिस्टम है पुराना कोर्ट में जज बैठ साहब बैठ गए हैं. लकड़ी के कटघरे में गवाह धीरे-धीरे चलते हुए आ गया है. कोर्ट का एक कर्मचारी हाथ में किताब लेकर आता है और गवाह की तरफ बढ़ा देता है. गवाह किताब पर हाथ रख कर कसम खाता है और सवालों का जवाब देना शुरू करता है. आम लोगों को यही लगता है कि यही प्रोसेस है कोर्ट में गवाही देना का या फिर अपनी बात जज के सामने रखने का. हालांकि यह सब फिल्मी है. न तो लोवर कोर्ट अमूमन वैसे होते हैं जैसे कमर्शियल फिल्मों में दिखते हैं और न ही किसी और कोर्ट में किताब पर हाथ रख कर कसमें खिलाई जाती हैं.
असल में कोर्ट में धार्मिक चिह्नों पर हाथ रख कर कसम खाने का सिस्टम बहुत पहले था, जो बाद में बंद हो गया. अगर इतिहास की बात करें तो मुगलकाल में हिंदुओं को हाथ में गंगाजल और भगवद्गीता लेकर और मुसलमानों को कुरान लेकर कोर्ट में कसम खिलाई जाती थी. अंग्रेजों के भारत आने तक तो यह सिस्टम चलता रहा. सीनियर वकील राजीव धवन कहते हैं कि यह राजशाही के जमाने का नियम-कायदा था, जिसमें माना जाता था कि कोई अपने धर्म के चिह्न पर हाथ रख कर झूठ नहीं बोलेगा. हालांकि 1840 तक आते-आते अंग्रेजों ने इस बात की जरूरत को समझा कि अब भगवान के नाम पर कसम खाने का एक यूनिफॉर्म सिस्टम लाना होगा.
एक कानून लाकर कोर्ट में गीता-कुरान पर हाथ रख कर कसम खाने का नियम बंद कर दिया गया. इसके बाद ट्रायल कोर्ट में कोई भी एक सत्यनिष्ठ होने का हलफनामा (solemn affirmation) देकर ही गवाही दे सकता था. इस कानून को 1863 में हाई कोर्ट के लिए भी लागू कर दिया गया. भारत के इंडियन ओथ्स एक्ट 1873 ने इसे और मजबूती दे दी.

अंग्रेजों के जमाने से पहले तक ज्यादातर धर्म के प्रतीक चिह्नों पर ही कोर्ट में कसम दिलाई जाती थी. (प्रतीकात्मक फोटो)
आजाद भारत में कुछ दिन चला फिल्मी सिस्टम हालांकि आजादी के कुछ साल तक देश के कुछ कोर्ट जैसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने नॉन हिंदू और नॉन मुस्लिम को अपने धर्म की किताब हाथ में लेकर कसम खाने का विकल्प दिया. यह सिस्टम 1957 तक चला. सही मायने में भारत में किताब पर हाथ रखकर कसम खाने का सिस्टम 1969 में खत्म हुआ. लॉ कमीशन ने अपनी 28वीं रिपोर्ट
सौंपी और देश में भारतीय ओथ अधिनियम, 1873 में सुधार का सुझाव दिया गया. पुराने एक्ट की जगह 'ओथ्स एक्ट, 1969' पास किया गया. इस तरह से पूरे देश में एक जैसा शपथ कानून लागू कर दिया गया है.

भारत आजाद होने के बाद भी बॉम्बे हाईकोर्ट ने धार्मिक किताबों पर हाथ रखकर कसम खाने का सिस्टम कुछ वक्त तक चलाया . फोटो - फिल्म स्टिल
तो अब कोर्ट में क्या कसम खाते हैं? 1969 में नए कानून के पास होने से भारत की अदालतों में कमस खाने के सिस्टम में पूरी तरह से बदलाव आ गया. अब कसम सिर्फ एक सर्वशक्तिमान भगवान के नाम पर दिलाई जाती है. मतलब अब कसम में से धर्म को हटा दिया गया है. मतलब इसे सेक्युलर बना दिया गया है. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, पारसी और इसाई सबके लिए अब अलग-अलग किताबों और कसमों को बंद कर दिया गया है.
अब सभी के लिए इस प्रकार की शपथ
है
“I do swear in the name of God/solemnly affirm that what I shall state shall be the truth, the whole truth and nothing but the truth”.यहां पर यह बताना जरूरी है कि नए ओथ एक्ट, 1969' में यह भी प्रावधान है कि यदि गवाह, 12 साल से कम उम्र का है तो उसे किसी तरह की शपथ नहीं लेनी होनी. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि बच्चे झूठ नहीं बोलते. अगर कसम खाकर झूठ बोले तो क्या होगा? कोर्ट के बाहर तो कसम खाकर कुछ भी बोलने का भले ही लोग परालौकिक कनेक्शन बताएं, लेकिन कोर्ट में झूठ बोलने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. सीनियर वकील असलम शेख के मुताबिक असल में कानून में कसम खाकर कोर्ट में झूठ बोलना अपराध माना जाता है. दरअसल किसी भी मामले में गवाह दो तरीके से अपने दर्ज कराई जा सकती है.
"मैं ईश्वर के नाम पर कसम खाता हूं / ईमानदारी से पुष्टि करता हूं कि जो मैं कहूंगा वह सत्य, संपूर्ण सत्य और सत्य के अलावा कुछ भी नहीं कहूंगा".
1. शपथ लेकर (on oath)
2. शपथ पत्र पर लिखकर (On Affidavit)

कोर्ट में कसम खाकर झूठ बोलने वाले के लिए सजा का प्रावधान किया गया है.
अगर कोई व्यक्ति कसम खाने के बाद झूठ बोलता है, तो भारतीय दण्ड संहिता (IPC) के सेक्शन 193
के तहत यह कानून अपराध है और झूठ बोलने वाले को 7 साल या जुर्माने तक की सजा दी जा सकती है. आपने देखा होगा कि आप जब भी कचहरी से कोई एफिडेविट (आप इसमें शपथ लेते हो कि मैं जो कुछ लिख रहा हूं वह सच है) बनवाते हैं तो वकील यह कंफर्म नहीं करता कि आप क्या लिखवा रहे हैं. यह बात और है कि हितैषी वकील बता देगा कि जो लिखवाना सही लिखवाना वरना फंसोगे. आम वकील लिखे हुए को इसलिए भी वेरीफाई नहीं करता, क्योंकि उसको पता है कि आप अगर एफिडेविट पर कुछ भी गलत लिखवाते हैं, तो उसके लिए आप खुद जिम्मेदार होगे और सजा भुगतेंगे.
जहां तक बात धर्म ग्रंथों और कोर्ट के कनेक्शन की है तो महाभारत का एक वाक्य जरूर अब भी भारत के सुप्रीम कोर्ट का मूल वाक्य है. सुप्रीम कोर्ट का मूल वाक्य यतो धर्मस्ततो जयः है. इसका मतलब है जीत उसकी ही होगी जिधर धर्म होगा. फिलहाल कोर्ट के अंदर भारत के संविधान से ज्यादा पवित्र शायद ही कोई किताब समझी जाती हो.