"उसने मुझ पर रोटी चोरी करने का आरोप लगाया और मेरा टॉर्चर शुरू कर दिया. मेरे प्राइवेट पार्ट को लाइटर से जला दिया. वो मुझे ये कहते हुए पीटता जा रहा था कि जब तक मैं 'जुर्म' कबूल नहीं कर लेता, वह मुझे जाने नहीं देगा. घर जाने की चाहत में मैंने झूठ बोल दिया कि मैंने चोरी की है."
Squid Game के 40 साल पहले साउथ कोरिया में हजारों के साथ हुआ था मौत का खेल, कहानी रुला देगी!
बात अप्रैल 1981 की है. पेपर्स पर वेलफेयर सेंटर्स में आनेवाले हर इंसान को एक साल के लिए ही वहां रखा जाना था. ट्रेनिंग दी जानी थी. और फिर समाज में वापस भेज दिया जाना था. पर असल में हो कुछ और रहा था.

ये किसकी आपबीती है और नेटफ्लिक्स पर अभी आए शो Squid game से इसका क्या कनेक्शन है? बताते हैं.
साउथ कोरियन सीरीज़, Squid game 2 अभी आई, काफी चर्चा में है. उस बड़ी गुड़िया का खौफ, हिलने पर गोली खाते लोग, सुई से Honeycomb Candy कुरेदते लोग फिर याद आ रहे हैं क्योंकि साल 2021 में इसके फर्स्ट पार्ट में हमने ये सब देखा था. तब भी ये काफी पॉपुलर हुई थी. मोटा माटी समझें तो स्टोरी कुछ ऐसी है कि बहुत गरीबी में, बदहाली में जी रहे लोगों को एक खास जगह लाया जाता है. एक बड़ी प्राइज मनी का लालच देकर उन्हें मल्टीलेवल गेम्स का हिस्सा बनाया जाता है. हर लेवल में हारने वाले लोग सिर्फ गेम से एलिमिनेट नहीं हो रहे हैं, बल्कि उन्हें सीधे शूट किया जा रहा है. माने जान से मारा जा रहा है. कुल 456 खिलाड़ियों में से सीजन 1 के आखिर में एक खिलाड़ी बचता है, प्राइज मनी उसके नाम हो जाती है. दूसरे सीजन की शुरुआत वहीं से हुई है. इस बार फिर वो खिलाड़ी गेम में कैसे पहुंच गया, कौन से नए गेम्स इस बार खेले जा रहे हैं और अबकी अंजाम क्या होगा, इन सवालों के जवाब आपको सीरीज में मिल जाएंगे.
तो जब जवाब सीरीज में मिलने वाला था, हम आपको ये कहानी क्यों सुना रहे थे? ऊपर की कहानी से आपको कुछ कीवर्ड पकड़कर आगे बढ़ना है. बेरोजगारी, गरीबी, बेसहारा लोग और पैसा. ये वो वजहें थीं, जिसके चक्कर में इस सीरीज में खिलाड़ी ऐसे खतरनाक गेम का हिस्सा बने या बनने को मजबूर हुए. असल जीवन में साउथ कोरिया में ही कुछ दशक पहले इन्हीं वजहों से कई हजार लोग इसी तरह की मुसीबत में पड़ गए थे. समानता ये थी उन हजारों में से भी कुछ के पास पैसे की कमी थी तो कुछ का ना घर था, ना कोई और सहारा. उन्हें भी अच्छे भविष्य की आस थी. इसलिए एक खास जगह इतने लोग इकट्ठा हुए. फर्क ये था कि इस जगह कोई प्राइज मनी नहीं थी. हां, उन्हें सुंदर भविष्य का ख्वाब जरूर दिखाया गया था. लेकिन, असलियत कुछ और ही निकली.
ब्रदर्स होम नाम का ये कैंप कहने को तो एक वेलफेयर स्कीम के तहत आता था. लेकिन यहां गरीबी नहीं,'गरीब' निशाने पर थे. Social Purification Project चलाया जा रहा था. सड़कों पर दिखने वाले गरीबों को हटाने या यू कहें कि उनके 'शुद्धिकरण' के लिए पुलिस को इनाम भी मिल रहे थे. पूरी कहानी शुरू से समझते हैं.
ब्रदर्स होम में क्या हुआ था?
1950 में हुए कोरियाई युद्ध के बाद धीरे-धीरे दक्षिण कोरिया का समय, हालात बदल रहे थे. 1970-80 के दशक में साउथ कोरिया बेहतर स्थिति में पहुंच रहा था. इकॉनमी भी फलफूल रही थी. पूरा देश आनेवाले दो बहुत बड़े इवेंट्स की तैयारी कर रहा था. साल 1986 में एशियन गेम्स होने को थे, और 1988 में सोल ओलंपिक्स होने वाले थे. इन सबके मद्देनजर सरकार देश की रीब्रांडिंग के प्रयासों पर जोर दे रही थी. लेकिन इस तथाकथित "हान नदी के चमत्कार" के पीछे एक क्रूर सच छिपा था.
बात अप्रैल 1981 की है. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री डक-वू के कार्यालय में एक लेटर आया. ये कोई आम लेटर नहीं था, इसे प्रेसिडेंट चुन डू-ह्वान ने अपने हाथों से लिखा था. राष्ट्रपति जो एक पूर्व जनरल थे और एक साल पहले सैन्य तख्तापलट के माध्यम से सत्ता कब्जाई थी, ने अधिकारियों को "भीख मांगने पर रोक लगाने और सड़कों पर आवारा भटक रहे लोगों के लिए सुरक्षात्मक उपाय करने" का आदेश दिया था.
उस आदेश में सामाजिक कल्याण केंद्र यानी सोशल वेल्फेयर सेंटर स्थापित किए जाने की बात थी. मनमाने ढंग से सड़कों पर घूम रहे लोगों को हिरासत में रखने की अनुमति दी गई थी. सेंटर्स खुले और बुसान जैसे बड़े शहरों में "आवारा परिवहन वाहन" साइन लिखी बसें दिखाई देने लगीं.
ये सेंटर्स ज्यादातर प्राइवेट थे, लेकिन उसमें कितने लोगों की देखभाल हो रही है, इस आधार पर सरकार से सब्सिडी दी जाती थी. फिर दिक्कत क्या थी? दिक्कत ये थी कि उन बसों में सड़कों पर कच्ची नींद में सो रहे लोगों, विकलांग लोगों, अनाथ बच्चों को तो भरा ही गया. उन आम नागरिकों को भी जबरदस्ती भर लिया गया जो पूछे जाने पर अपनी पहचान साबित करने में असफल रहे. इस सबको कथित "सामाजिक शुद्धिकरण परियोजना" का हिस्सा बना लिया गया.
इन्हीं में से एक सेंटर था, ह्युंगजे बोकजिवोन यानी ब्रदर्स होम. ये इन सबसे बड़े वेलफेयर सेंटर्स में से एक था. इसके मालिक, पार्क इन-गुएन, अक्सर इस बात पर जोर देते थे कि वो 'बेघर लोगों' को खाना खिलाने, कपड़े मुहैया कराने और उनको शिक्षित करने के लिए काम कर रहे हैं.
पेपर्स में इन सेंटर्स में आनेवाले हर इंसान को केवल एक साल के लिए ही अंदर रखा जाना था. ट्रेनिंग दी जानी थी.और फिर समाज में वापस छोड़ दिया जाना था. पर असल में हुआ ये कि, कई लोगों को. सालों तक वहां रखा गया. उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि वो अपने दोस्तों, परिवार को कई सालों बाद दोबारा देख पाएंगे. इस दौरान उनको ऐसी-ऐसी यातनाएं झेलनी पड़ीं, ऐसा व्यवहार किया गया, जो Human rights, इंसानियत हर किसी को शर्मिंदा कर दे.
ब्रदर्स होम से जीवित बचे एक इंसान की आप बीती से समझिए. चोई सेउंग-वू उस वक्त 13 साल के थे. उन्हें स्कूल से घर जाते समय सड़क से उठा लिया गया था. उन्होंने बीबीसी को बताया,
"स्कूल से घर जाते समय एक पुलिस ऑफिसर ने मुझे रोका. मेरे बैग की तलाशी लेने लगा. उसमें मेरे लंच की बची हुई आधी रोटी थी. जो स्कूल से मिली थी. पुलिस वाले ने मुझसे पूछा कि मैंने रोटी कहां से चुराई है. उसने मुझे टॉर्चर करना शुरू किया. मेरे प्राइवेट पार्ट को लाइटर से जला दिया. वो मुझे ये कहते हुए पीटता जा रहा था कि जब तक मैं 'जुर्म' कबूल नहीं कर लेता, वह मुझे जाने नहीं देगा. मैंने घर जाने की चाहत में झूठ बोल दिया कि मैंने चोरी की है. मेरे ये कहने के महज 10 मिनट बाद एक फ्रीजर डंप ट्रक आया. उसमें मुझे जबरदस्ती अंदर बिठाया गया. ये मेरे "जेल जीवन" की शुरुआत थी."
चोई ने वेल्फेयर सेंटर में लगभग पांच साल बिताए. उनके मुताबिक, इस दौरान उनके साथ हर तरह की क्रुएलिटी की गई. फिजिकल से लेकर सेक्शुअल वायलेंस तक. उनके कपड़े उतारकर उन पर ठंडा पानी उड़ेला गया, फिर सेंटर्स को संभालने वाले गार्ड्स ने कई रातों तक उनका रेप किया. हफ्ते भर बाद उन्हें पता चला कि उस सेंटर में लोगों का मर्डर भी किया जा रहा है.
कोई अगर ये सवाल करता कि उन्हें वहां बंधक क्यों बनाया गया है तो जीते जी उनको नर्क का अनुभव कराया जाता और बेहद भयानक मौत की सजा दी जाती. इसी तरह की कहानी यहां रहने वाले करीब 3500 लोगों की थी. सेंटर में रहने वाले लोगों को आपस में बुनियादी चीजों को लड़ाया जा रहा था. उन्हें यातनाएं दी जा रही थीं. लोगों को एक ब्लू ट्रेनिंग सूट, रबर के जूते और नायलॉन के अंडरगार्मेंट दिए गए थे. उन्हें नहाने तक की आजादी नहीं थी. पूरे बदन पर जूं और शरीर से सड़ी हुई मछली जैसी बू आती थी. एक छोटे से बेड पर 4 लोगों को सोना पड़ता था.
कैसे हुआ खुलासा?
इसके बाद आया साल 1987. इस दौरान 30 से अधिक लोग इस कैद से भागने में सफल हुए. उन्होंने बताया कि वेलफेयर स्कीम के नाम पर वहां क्या चल रहा था. जांच के आदेश आए और इन सेंटर्स को बंद करने के लिए मजबूर किया गया. एक साल बाद, ह्युंगजे बोकजीवोन को चलाने वाले पार्क इन-गुएन को गिरफ्तार कर लिया गया.
लेकिन, इसके बाद भी वहां से बच निकले लोगों की जिंदगी आसान नहीं रही. कुछ ने अपने साथ हुई ज्यादतियों की याद से परेशान होकर अपनी जान दे दी. कई लोगों को समाज में सिर्फ इसलिए अलग नजर से देखा जाता रहा क्योंकि उन्होंने उस सेंटर में अपना समय गुजारा था. कई को अब भी अपने परिवार से मिलने की आस है. कई अब भी न्याय की तलाश में हैं. समाज में रहने लायक बनाने के लिए खेले गए इस गेम ने कई लोगों के पूरे समाज को ही खत्म कर डाला.
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