जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) के कठुआ (Kathua Encounter) जिले में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों का सर्च ऑपरेशन जारी है. कठुआ के पंजतीर्थी इलाके में तीन आतंकियों के छिपे होने की खबर है. 31 मार्च की देर रात आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ हुई थी, तभी से ये ऑपरेशन जारी है. पिछले नौ दिनों में कठुआ में ये तीसरी मुठभेड़ है. फिलहाल कठुआ के रुई गांव के पास तीन आतंकियों के छिपे होने की खबर है. इस एनकाउंटर में एक आतंकी को सुरक्षाबलों ने मार गिराया है, जबकि 3 से 4 आतंकी अब भी फरार हैं.
अमेरिका ने अफगानिस्तान में छोड़ा, अब भारत की मुसीबत बन रही M4 कार्बाइन
2017 और 2021 के एनकाउंटर में मारे गए आतंकी Masood Azhar के भांजे और भतीजे के पास से भी Security Forces ने M4 Carbine बरामद की थी.

इस पूरी घटना के बीच एक खबर आई कि सुरक्षाबलों ने आतंकियों का कुछ सामान जब्त किया है. इसमें स्लीपिंग बैग्स, ग्रेनेड, बुलेटप्रूफ जैकेट, खाने का सामान और एक बंदूक (असॉल्ट राइफल) की लोडेड मैगजीन मिली है. ये मैगजीन पारंपरिक तौर पर आतंकियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बंदूक AK-47 की नहीं, बल्कि अमेरिकन मेड M4 कार्बाइन (M4 Carbine) की है. बीते कुछ सालों से भारत में घुसपैठ करने वाले आतंकी, कई बार M4 कार्बाइन से लैस होकर आए हैं. ऐसे में ये जानना जरूरी है कि क्या खासियत है इस गन की जो आतंकी धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं? और इन आतंकी संगठनों के पास इस तरह के हथियार कहां से आ रहे हैं?

M4 कार्बाइन एक अमेरिकन असॉल्ट राइफल है. इसे हथियारों की कंपनी कोल्ट ने मैन्युफैक्चर किया है. वही कोल्ट जिसके फाउंडर सैमुअल कोल्ट ने फेमस ‘कोल्ट रिवॉल्वर’ बनाई थी. ये एक हल्के वजन की राइफल है. अगर इसमें 30 गोलियों की मैगज़ीन लगा दें तो भी इसका वजन 3.4 किलोग्राम से अधिक नहीं जाता. ऐसे में इसे दौड़ते हुए फायर करना भी आसान है. साथ ही हल्का होने की वजह से स्थिरता मिलती है जिससे निशाना चूकने की गुंजाइश कम रहती है.

निशाना लगाने के लिए इस गन में पहले से लोहे की साइट दी गई है जिसे आयरन साइट कहते हैं. लेकिन इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसमें जरूरत के हिसाब से और भी कई तरह के स्कोप लगाए जा सकते हैं. इस गन में ग्रेनेड लॉन्चर भी लगाया जा सकता है जो इसे एक मल्टीपरपज हथियार बनाता है. M4 कार्बाइन पहले से मौजूद M16A2 राइफल का छोटा वर्जन है. इसकी बैरल माने नली पिछले वर्जन के मुकाबले छोटी है. 14.5 इंच का बैरल सैनिकों को मैनुवर (आसानी से मूवमेंट) करने की क्षमता प्रदान करता है.
ये गन 750-950 राउंड प्रति मिनट फायर कर सकती है. इसकी गोली की रफ़्तार 910 मीटर प्रति सेकेंड है. रेंज 500-600 मीटर है. इसमें 5.56x45mm की गोली का इस्तेमाल होता है. जरूरत के हिसाब से इस गन में सिंगल शॉट और बर्स्ट फायर मोड है. इसका M4A1 वर्जन फुली ऑटोमेटिक है. माने इसमें ट्रिगर दबाते ही पूरी मैगजीन खाली हो जाती है.
रक्षा मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट military.com के मुताबिक क्लोज रेंज से लेकर अधिक दूरी तक मार करने के मामले में M4 कार्बाइन बेहतर है. हाल के दिनों में इस बंदूक में बेहतर ऑपटिक्स, साइलेंसर और ऐसे अटैचमेंट्स लगाए गए हैं जो इसे इस्तेमाल के लिए और बेहतर बनाते हैं. इस बंदूक का हल्का वजन और इसपर कई और चीजों को माउंट करने की क्षमता इसे दूसरी असॉल्ट राइफल्स के मुकाबले बेहतर बनाती है. अमेरिका में ये आर्मी को इशू की जाने वाली स्टैण्डर्ड राइफल है. इस गन ने कोलंबिया संघर्ष, कोसोवो की जंग, सीरियन गृहयुद्ध, इराकी गृहयुद्ध, यमन के गृहयुद्ध और 9/11 के अफ़ग़ानिस्तान में 'वॉर ऑन टेरर' में अपना लोहा मनवाया है.

ये पहली बार नहीं है जब आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर में M4 कार्बाइन का इस्तेमाल किया हो. सबसे पहले 2017 में जम्मू-कश्मीर में जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मौलाना मसूद अज़हर के भांजे तल्हा राशिद के एनकाउंटर के बाद M4 कार्बाइन बरामद की गई थी. जब धारा 370 हटाई गई, उसके बाद घुसपैठ की घटनाओं में कुछ कमी देखने को मिली. लेकिन साल 2021 से आतंकियों ने फिर से जम्मू-कश्मीर में सिर उठाना शुरू किया. आम लोगों पर Lonewolf Attack जैसे हमलों का एक नया पैटर्न सामने आया. इसी साल अवंतीपुरा, कश्मीर में एक एनकाउंटर में मारे गए आतंकी मोहम्मद इस्माइल उर्फ लंबू के पास से भी सुरक्षाबलों ने यही कार्बाइन बरामद की थी.
इस्माइल उर्फ लंबू कोई आम टेररिस्ट नहीं आतंकी संगठन बल्कि मौलाना मसूद अज़हर का भतीजा था. कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि आतंकियों के पास से M4 कार्बाइन बरामद की गई है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट कहती हैं कि अमेरिका जब अफगानिस्तान से रूखसती ले रहा था, तब उसने ये बंदूकें वहीं छोड़ दीं. ये सारी खेप तालिबान के हाथ लग गई. इन्हीं में से कुछ बंदूकें पाकिस्तान के जरिए भारत-विरोधी आतंकी संगठनों के पास आ गईं.
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