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फसल की पैदावार बढ़ाने में मददगार है इंसानी पेशाब, अमेरिका के इस राज्य को हुआ भारी मुनाफा

पेशाब में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. ये पोषक तत्व सिंथेटिक खादों में भी होते हैं, जिनका उपयोग किसान करते हैं. लेकिन सिंथेटिक खादों के निर्माण से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है. उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन का उत्पादन 'हैबर-बॉश' प्रक्रिया से किया जाता है, जिसमें जीवाश्म ईंधन की खपत होती है. जबकि पेशाब एक निःशुल्क संसाधन है, जिसे हर कोई उत्पन्न करता है.

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रसायनिक खाद की जगह खेती में पेशाब का इस्तेमाल. (तस्वीर : unsplash)

अमेरिका के वर्मोंट राज्य में किसान, फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए इंसानी पेशाब का उपयोग खाद के रूप में कर रहे हैं. इस तकनीक का उपयोग प्राचीन रोम और चीन में भी फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किया जाता था. इससे न केवल बेहतर फसल उगाई जा सकती है, बल्कि पर्यावरण को भी कम नुकसान पहुंचता है.

BBC में छपी खबर के मुताबिक, वर्मोंट के कई ग्रामीण पिछले कई वर्षों से अपने पेशाब को व्यर्थ नहीं जाने देते. हर साल यहां के लोग लगभग 12,000 गैलन (यानी 45,400 लीटर) पेशाब इकट्ठा करते हैं और इसे स्थानीय किसानों को खाद के रूप में दान कर देते हैं. इस प्रक्रिया को “पीसाइक्लिंग” कहा जाता है. यह "यूरिन न्यूट्रिएंट रिक्लेमेशन प्रोग्राम" (UNRP) के तहत होता है, जिसे वर्मोंट की नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन, रिच अर्थ इंस्टीट्यूट (REI) संचालित करती है.

पीसाइक्लिंग के बाद क्या होता है?

इकट्ठा किए गए पेशाब को ट्रक द्वारा ले जाकर एक बड़े टैंक में भरा जाता है, जहां इसे 80 डिग्री सेल्सियस पर 90 सेकंड तक गर्म करके पाश्चराइज किया जाता है. इसके बाद इसे संग्रहीत कर लिया जाता है और उचित समय पर खेतों में फसलों पर छिड़का जाता है.

इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन चीन और रोम में भी पेशाब का उपयोग खाद के रूप में किया जाता था. वैज्ञानिकों ने पाया कि आज भी पेशाब के उपयोग से पालक और केल (एक प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जी) जैसी फसलों की पैदावार दोगुनी हो सकती है, विशेष रूप से उन मिट्टियों में जहां उर्वरता कम होती है.

इसके पीछे क्या कारण है?

पेशाब में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. ये पोषक तत्व सिंथेटिक खादों में भी होते हैं, जिनका उपयोग किसान फसलों पर करते हैं. लेकिन सिंथेटिक खादों के निर्माण से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है. उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन का उत्पादन 'हैबर-बॉश' प्रक्रिया से होता है, जिसमें काफी मात्रा में जीवाश्म ईंधन की खपत होती है. वहीं, फॉस्फोरस की खुदाई से हानिकारक कचरे की मात्रा बढ़ती है.

इसके विपरीत, पेशाब एक निःशुल्क संसाधन है, जिसे हर कोई उत्पन्न करता है और जिसका सही उपयोग किया जाए तो यह पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में सिविल और पर्यावरणीय इंजीनियरिंग की प्रोफेसर नैन्सी लव, पिछले एक दशक से REI के साथ काम कर रही हैं. उनके अनुसार, "पेशाब के उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है, और इस प्रक्रिया में आधे से भी कम पानी खर्च होता है. UNRP के अनुमान के अनुसार, साल 2012 से अब तक एक करोड़ लीटर से अधिक पानी बचाया जा चुका है."

पेशाब को व्यर्थ बहाने से क्या नुकसान होता है?

प्रोफेसर लव बताती हैं कि हम पेशाब को बहुत अधिक पानी से पतला करके सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में भेजते हैं और फिर इसे वापस पर्यावरण में छोड़ देते हैं. हालांकि, वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट के बावजूद नाइट्रोजन और फॉस्फोरस पूरी तरह से नहीं हटते. इसके कारण ये पोषक तत्व नदियों और झीलों में पहुंचकर शैवाल (algae) को बढ़ावा देते हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है और जलीय जीवों के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है.

REI की कार्यकारी निदेशक जमीना शुपैक कहती हैं, "हमारा शरीर बहुत सारे पोषक तत्व उत्पन्न करता है, और वर्तमान में ये तत्व न केवल व्यर्थ जा रहे हैं, बल्कि पर्यावरण को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं."

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दुनिया में कहां-कहां ऐसा किया जा रहा है?

वर्मोंट की ही तरह बाकी देशों में भी ऐसे प्रोजेक्ट चल रहे हैं. उदाहरण के लिए, पेरिस में वालंटियर सीन नदी को बचाने और गेहूं की फसल उगाने के लिए पी-साइक्लिंग का उपयोग कर रहे हैं. स्वीडन में एक स्टार्टअप ने पेशाब को खाद में बदलने का तरीका निकाला है. इसके अलावा, दक्षिण अफ्रीका, नेपाल और नाइजर में भी पी-साइक्लिंग के पायलट प्रोजेक्ट्स चलाए जा रहे हैं.

पी-साइक्लिंग में क्या-क्या समस्याएँ आ सकती हैं?

परिवहन की कठिनाई – पेशाब भारी होता है और इसे दूर ले जाना कठिन होता है. वर्मोंट में फिलहाल पेशाब को अधिकतर 16 किमी की दूरी तक ही ट्रांसपोर्ट किया जाता है. आने वाले समय में इसे बढ़ाने की जरूरत होगी. इसी को ध्यान में रखते हुए, REI की एक स्पिन-ऑफ कंपनी ने एक "फ्रीज़ कंसंट्रेशन सिस्टम" तैयार किया है, जो पेशाब को छह गुना अधिक गाढ़ा कर देता है. यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में इस तकनीक का प्रयोग शुरू हो चुका है.

प्लंबिंग की चुनौती – लव बताती हैं कि घरों में पेशाब के लिए अलग से प्लंबिंग कराना भी एक चुनौती है.

सामाजिक स्वीकार्यता – कई लोगों को इस विचार से "इक फैक्टर" (अर्थात् घिन महसूस होना) होता है. बदबू की समस्या भी है, और आमतौर पर लोग इस विषय पर खुलकर बात नहीं करते. हालांकि, समय के साथ लोग इसे अपनाने के लिए तैयार हो रहे हैं.

मूत्र में दवाओं के अवशेष – शूपैक बताती हैं कि कई लोगों को मूत्र में दवाओं के अवशेषों की चिंता होती है. REI ने इस पर शोध किया, जिसके प्रारंभिक निष्कर्षों में इनकी मात्रा "बेहद कम" पाई गई है.

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