चंडीगढ़ की एक विशेष CBI अदालत ने साल 2008 के एक भ्रष्टाचार के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्व जज निर्मल यादव को बरी करते हुए CBI पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. अदालत ने कहा कि CBI ने उन्हें फंसाने के लिए झूठे सबूत गढ़े.
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जज निर्मलजीत कौर के घर पर 15 लाख रुपयों से भरा एक बैग पहुंचा. आरोप था कि यह रकम जस्टिस निर्मल यादव के लिए भेजी गई थी, लेकिन दोनों जजों के नामों में समानता के कारण यह गलती से जस्टिस कौर के घर पहुंच गया. फिर हुई सीबीआई जांच.

बार एंड बेंच में छपी खबर के मुताबिक, CBI कोर्ट की जज अलका मलिक ने 29 मार्च को अपना फैसला सुनाया. उन्होंने कहा कि CBI ने जस्टिस यादव के खिलाफ एक ऐसे व्यक्ति (PW26 - राज कुमार जैन) को गवाह बनाया, जो उनके एक फैसले से नाराज था. उन्होंने कहा,
“CBI को अपनी पहली क्लोजर रिपोर्ट पर ही कायम रहना चाहिए था, न कि झूठ और अटकलों पर आधारित गवाही पेश करनी चाहिए थी.”
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, मामला 13 अगस्त 2008 का है. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जज निर्मलजीत कौर के घर पर 15 लाख रुपयों से भरा एक बैग पहुंचा. आरोप था कि यह रकम जस्टिस निर्मल यादव के लिए भेजी गई थी, लेकिन दोनों जजों के नामों में समानता के कारण यह गलती से जस्टिस कौर के घर पहुंच गई. बैग मिलते ही जस्टिस कौर ने तत्कालीन हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और पुलिस को इसकी सूचना दी.
16 अगस्त 2008 को मामले में FIR दर्ज की गई. 10 दिन बाद मामला CBI को ट्रांसफर कर दिया गया. 28 अगस्त को एक नई FIR दर्ज की गई.
CBI को जांच में क्या मिला?CBI के अनुसार, हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त एडवोकेट जनरल संजीव बंसल के एक क्लर्क ने ये रकम, जस्टिस कौर के घर पहुंचाई थी. बंसल ने जस्टिस कौर को फोन कर बताया कि पैसे गलती से उनके घर पहुंच गए हैं. इसके बाद, दिसंबर 2009 में CBI ने इस मामले में एक क्लोजर रिपोर्ट दायर कर दी. हालांकि मार्च 2011 में CBI ने इस मामले में एक चार्जशीट दाखिल की और जस्टिस यादव को आरोपी बनाया.
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CBI ने बताया कि यह रकम जस्टिस यादव को एक संपत्ति विवाद में दिए गए कथित ‘पक्षपाती फैसले’ के बदले में दी गई थी. CBI ने इस मामले में राजकुमार जैन को मुख्य गवाह बनाया. जैन उस समय एक एडीशनल डिस्ट्रिक्ट जज थे. जिन्हें अदालत ने जस्टिस यादव के फैसले से नाराज बताया. अदालत ने उनकी गवाही को पूरी तरह अविश्वसनीय बताया और कहा,
“PW26 (राजकुमार जैन) की गवाही पूरी तरह से झूठ, अनुमान और पूर्वाग्रह से भरी हुई थी. जैन ने ये खुद स्वीकार किया कि उन्होंने 2008 में CBI को दिए अपने बयान में कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे, जिन्हें बाद में 2010 में अपने सप्लीमेंट्री बयान में जोड़ा.”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जैन इस बात का एक भी प्रमाण नहीं दे सके कि उन पर किसी प्रकार का 'दबाव' डाला गया था. वहीं रिश्वत वाले आरोपों पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा,
“यह मानना बिल्कुल बचकाना होगा कि हाईकोर्ट का एक जज किसी मामले में फैसला देने के पांच महीने बाद रिश्वत लेगा.”
प्रॉसिक्यूटर नरेंद्र सिंह ने अदालत में CBI का पक्ष रखा. अदालत ने बताया कि CBI के पास कोई नया ठोस सबूत नहीं था, साथ ही कई गवाहों ने प्रॉसिक्यूशन का साथ देने से भी मना कर दिया. आखिर में अदालत ने जस्टिस यादव समेत सभी आरोपियों रविंदर भसीन, राजीव गुप्ता और निर्मल सिंह को बरी कर दिया.
अदालत ने बताया कि आरोपियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 11, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-B, तथा IPC की धाराओं 193, 192, 196, 199 और 200 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी किया गया है.
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