“भारत में अधिकांश हेट स्पीच (Hate Speech) धार्मिक अल्पसंख्यकों या शोषित वर्गों के खिलाफ होती हैं…” ये बयान सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के जस्टिस एएस ओका का है. उन्होंने ये भी कहा कि कई बार राजनेताओं की ओर से 'नफरत भरे भाषण' चुनावी लाभ के लिए दिए जाते हैं.
'सबसे ज्यादा नफरती भाषण अल्पसंख्यकों के खिलाफ... ' जस्टिस ओका ने बहुत बड़ी बातें बोली हैं
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएस ओका ने कहा है कि 'Hate Speech' एक अपराध है. लेकिन इसकी आड़ में फ्री स्पीच के अधिकार का हनन नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, 'यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्टैंड-अप कॉमेडी, व्यंग्य… नहीं होंगे, तो सम्मान के साथ जीने का अधिकार समाप्त हो जाएगा.'

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 अप्रैल को जस्टिस एएस ओका न्यूयॉर्क के ‘कोलंबिया लॉ स्कूल’ के विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे. वो 'हेट स्पीच: धार्मिक और जातिगत अल्पसंख्यकों के विरुद्ध' विषय पर बोल रहे थे. इस दौरान उन्होंने कहा कि इस तरह के भाषण अक्सर बहुसंख्यक समुदाय को उकसाने के लिए दिए जाते हैं. उन्हें अल्पसंख्यकों पर हमला करने और सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए उकसाया जाता है. उन्होंने आगे कहा,
भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरे भाषण दिए गए हैं. अल्पसंख्यकों पर हमला करने के लिए बहुसंख्यकों को उकसाने के लिए इस तरह के भाषण दिए गए हैं... भारत में अधिकांश नफरत भरे भाषण धार्मिक अल्पसंख्यकों और दमित वर्गों के खिलाफ दिए जाते हैं.
जस्टिस एएस ओका ने कहा कि इस तरह के हेट स्पीच अपराध होते हैं. इनमें मिलने वाले दंड को छोड़ भी दें तो ये सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ते हैं.
उन्होंने आगे कहा,
नफरत भरे भाषण के पीछे राजनीतिक कारण भी हो सकते हैं और नेता लाभ उठाने के लिए ऐसा करते हैं.
जस्टिस एएस ओका ने ऐसे मामलों पर रोक लगाने का तरीका भी बताया. कहा कि इस तरह के भाषण पर अंकुश लगाने का सबसे अच्छा तरीका है- जनता को शिक्षित करना. उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना का जिक्र करते हुए कहा,
हमारी प्रस्तावना में नागरिकों को कई स्वतंत्रताएं दी गई हैं. उनमें से एक है बंधुत्व (भाईचारा). ये बात, प्रस्तावना और संविधान के लिए महत्वपूर्ण है. अगर हम लोगों को इस बारे में शिक्षित कर पाएं, तो नफरत फैलाने वाले भाषणों की घटनाएं कम हो जाएंगी. लोगों को शिक्षित करके उनके दिमाग को मजबूत किया जा सकता है.
हालांकि, जस्टिस ओका ने ये भी कहा कि हेट स्पीच के नाम पर किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सोच-समझकर फैसला लेना होगा. उन्होंने आगे बताया,
किसी के भाषण को कोई ‘हेट स्पीच’ बता सकता है, सिर्फ इसलिए कि कुछ लोगों को ऐसा लग रहा है. लेकिन ये व्यक्तिगत धारणाओं पर आधारित नहीं हो सकता. ‘हेट स्पीच’ के मामले में ऐसी सजा नहीं दी जानी चाहिए कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन हो.
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स्टैंड-अप कॉमेडी और व्यंग पर क्या कहा?उन्होंने ये भी बताया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में व्यंग्य का कितना महत्व है. न्यायमूर्ति ओका ने कहा,
यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्टैंड-अप कॉमेडी, व्यंग्य… नहीं होंगे, तो सम्मान के साथ जीने का अधिकार समाप्त हो जाएगा. न्यायालयों ने भी इस बात का संतुलन बनाने का प्रयास किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे. लोकतंत्र में असहमति भी बहुत जरूरी है. हर लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार है. विश्वविद्यालयों को छात्रों को विरोध करने की अनुमति देनी चाहिए, अगर वो अन्याय से पीड़ित हैं. और 'हेट स्पीच' के प्रावधानों का इस्तेमाल विरोध को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता है.
न्यायमूर्ति एएस ओका ने कहा कि अदालतों को नफरत फैलाने वाले भाषणों पर सख्ती से पेश आने की जरूरत है, क्योंकि ये एक अपराध है. लेकिन साथ ही फ्री स्पीच, अभिव्यक्ति और विरोध करने के अधिकार की भी रक्षा होनी चाहिए.
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