देश की राजधानी दिल्ली में दवाओं (Shortage Of Medicines In Delhi) की किल्लत हो गई है. सरकारी अस्पतालों की फार्मेसी के बाहर मरीजों की लंबी लाइनें लग रही हैं. डॉक्टर जो दवाएं मरीजों के लिए लिख रहे हैं, वे ज्यादातर फार्मेसी में उपलब्ध ही नहीं हैं. लोग परेशान हैं. मरीजों का कहना है कि दवाएं 'बाहर' से लेनी पड़ रही हैं. ‘बाहर से’ का मतलब है कि मेडिकल स्टोर से पैसे देकर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं जबकि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों और मोहल्ला क्लिनिकों में मरीजों के लिए दवाएं फ्री हैं. मरीज कह रहे हैं कि पिछले एक साल से ये समस्या आ रही है. उल्टी और मतली जैसी बीमारियों की दवाएं भी स्टॉक में नहीं हैं.
दवाओं से क्यों खाली हो गए हैं दिल्ली के सरकारी अस्पताल? पर्चा लेकर भटक रहे मरीज
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं के लिए मरीजों की लंबी लाइन लग रही है. इसके बाद भी वे डॉक्टर की लिखी दवाएं नहीं हासिल कर पा रहे हैं. अस्पतालों की फार्मेसी में कई सारी दवाओं का स्टॉक खत्म हो गया है.

26 साल की कल्पना खोड़ा कॉलोनी में रहती हैं. अपनी 8 महीने की बेटी को लेकर वह लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल गई थीं. उन्हें उसके लिए दवाएं चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस को उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने जो 4 दवाइयां लिखी थीं, उनमें से नसल ड्रॉप्स और मल्टी-विटामिन सप्लीमेंट सिरप स्टॉक में नहीं हैं. केवल एलर्जी और बुखार के लिए सिरप ही उन्हें मिल पाए. बाकी की जरूरी दवाएं उन्हें बाहर मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ेंगी. कल्पना ने बताया कि पिछले एक साल से उनके साथ यही हो रहा है. मयूर विहार के पास गडोली के रहने वाले जयचंद की भी यही शिकायत है. उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने उन्हें 3 दवाएं लिखी थीं. इनमें से उन्हें सिर्फ़ एसिडिटी के लिए पैंटॉप-40 ही मिल पाई. फार्मासिस्ट ने उन्हें डायबिटीज, सूजन और दर्द की दवाई बाहर से खुद खरीदने के लिए कहा.
दवाएं आउट ऑफ स्टॉकइंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में मतली और उल्टी की दवा डोमपेरिडोन, बैक्टीरियल संक्रमण की दवा एमोक्सिक्लेव और सेफिक्साइम 200MG का स्टॉक खत्म हो गया है. जीटीबी अस्पताल के एक रेजिडेंट डॉक्टर ने बताया कि उल्टी, बुखार और एसिडिटी की बुनियादी दवाएं भी फार्मेसी में उपलब्ध नहीं हैं. यूपी बॉर्डर पर मौजूद एक सरकारी डिस्पेंसरी के डॉक्टर ने बताया कि वह वैनकॉमाइसिन जैसी साधारण एंटीबायोटिक्स भी मरीजों को नहीं लिख रहे हैं.
उन्होंने बताया कि डिक्लोफेनाक जैसी पेन किलर, विटामिन डी और सी की गोलियां भी ऑउट ऑफ स्टॉक हैं. हालात ये हैं कि दिल के दौरे के ट्रीटमेंट में प्रयोग की जाने वाली दवाएं भी फार्मेसी में नहीं हैं. छोटे सरकारी अस्पतालों की समस्या ये है कि वे खुद दवाएं नहीं खरीद सकते. इसके लिए वे केंद्रीय खरीद एजेंसी (CPA) पर निर्भर रहते हैं. डॉक्टर कहते हैं कि लोकनायक जैसे बड़े अस्पतालों को लोकल लेवल पर दवाएं खरीदने की परमिशन है लेकिन छोटे अस्पतालों के लिए ऐसी सुविधा नहीं है.
क्यों हो रही दवाओं की कमीअब सवाल ये है कि अचानक से दवाओं का यह संकट दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में कैसे पैदा हो गया? स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों ने बताया कि दवाओं की कमी देरी से हुई टेंडर प्रक्रिया का नतीजा है. एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अगर अब मौजूदा टेंडर प्रक्रिया समय पर पूरी भी हो जाती है तो कम से कम अगले 6 महीने तक दवाओं की समस्या बनी रहेगी. अगर ये अभी शुरू नहीं करते तो फिर किसी को नहीं पता कि ये सब कब ठीक होगा?
क्या है टेंडर व्यवस्थाबताया गया कि टेंडर दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए जारी किया जाता है. इन टेंडर्स की जांच-परख में थोड़ा समय लगता है. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री पंकज सिंह ने कहा कि जो टेंडर जारी किए गए थे, उनमें कुछ ब्लैक लिस्टेड कंपनियां थीं. ऐसे में हम इसके कानूनी पहलू पर सोच रहे हैं. इसलिए प्रोसेस में देरी हो रही है. हालांकि, हेल्थ मिनिस्टर ने दावा किया कि मौजूदा हालात एक महीने पहले के हालात से बेहतर हैं. अस्पतालों को जरूरी दवाओं की सप्लाई शुरू कर दी गई है. बता दें कि दिल्ली में दवाओं की यह किल्लत नई नहीं है. पिछले साल की दूसरी छमाही में भी फार्मेसी के भंडार दवाओं से खाली हो गए थे. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) ने जरूरी दवाएं नहीं खरीदी थीं.
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