UK बेस्ड फिल्ममेकर Sandhya Suri ने Santosh नाम की एक फिल्म बनाई. भारतीय समाज में पसरे जातिवाद से उपजी सड़ांध को उघाड़ती एक फिल्म. फिल्म जो पुलिस महकमे का बर्बर चेहरा उजागर करती है. फिल्म जो दलित महिला के संघर्षों की शिनाख्त नए ढंग से करती है. फिल्म जो ब्रिटिश अकैडमी फिल्म अवॉर्ड्स (BAFTA) में नॉमिनेट और Oscars 2025 के लिए शॉर्टलिस्ट होती है. उसे भारत में रिलीज़ होने से रोक दिया गया है. सेंसर बोर्ड (CBFC) के मुताबिक फिल्म में मिसोजिनी, सेक्शुअल वायलेंस सहित अति संवदेनशील मसलों का फिल्मांकन है. बग़ैर एडिटिंग के ये फिल्म भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज़ के लिए मुफ़ीद नहीं.
'संतोष'- वो फिल्म जो कान में गई, ऑस्कर्स में गई, मगर सेंसर बोर्ड ने भारत में रिलीज़ पर रोक लगा दी
UK की तरफ से ऑफिशियली Oscars 2025 में भेजी गई, भारतीय कहानी पर बनी Santosh इंडिया में कभी रिलीज़ नहीं होगी. पुलिस ब्रूटैलिटी और सेक्शुअल वॉयलेंस की वजह से सेंसर बोर्ड ने थमाई लंबे-लंबे कट की फेहरिस्त.

ब्रिटिश इंडियन फिल्ममेकर Sandhya Suri के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म में Shahana Goswami अहम किरदार में हैं. ये फिल्म ऑस्कर्स 2025 में UK की ऑफिशियल एंट्री भी थी. 2024 के कान फिल्म फेस्टिवल में इसकी स्क्रीनिंग की गई. मगर भारतीय दर्शकों को इससे महरूम रखा जा रहा है. सेंसर बोर्ड ने इस पर रोक लगा दी है. इस बारे में शहाना गोस्वामी ने India Today से बात की. उन्होंने कहा,
“सेंसर बोर्ड ने मेकर्स को कई लंबे-लंबे कट की लिस्ट दी है. मेकर्स इस पर राज़ी नहीं हुए क्योंकि इससे फिल्म का मूल ही बदल जाएगा. लिहाज़ा भारत में इसकी रिलीज़ पर रोक लगा दी गई. गतिरोध लग चुका है और शायद ये फिल्म भारत के सिनेमाघरों में कभी नहीं लग पाएगी.”
India Today से बातचीत में शहाना ने बताया कि मेकर्स ने स्क्रिप्ट के रफ़ ड्राफ्ट पर ही सेंसर बोर्ड से अप्रूवल ले लिया था. फिर भी वो इसके रिलीज़ पर रोक लगा रहा है. शहाना ने कहा,
"ये बहुत दु:ख की बात है कि सेंसर बोर्ड से जिस चीज़ का अप्रूवल फिल्म बनने से काफ़ी पहले स्क्रिप्ट लेवल पर ही ले लिया गया था. उसे भी रिलीज़ के लिए इतने सारे बदलावों की ज़रूरत पड़ रही है."
संध्या सूरी ने भी अपनी फिल्म की रिलीज़ पर लगी रोक पर बात करते हुए कहा,
“ये निराशाजनक और दिल तोड़ने वाला है. हम सबके लिए ये बड़ा झटका है. क्योंकि मुझे नहीं लगा कि भारतीय दर्शकों के लिए ये मुद्दे नए हैं. ऐसा भी नहीं है कि हमसे पहले इन मसलों पर फिल्में नहीं बनी या ये मुद्दे उठाए नहीं गए. सेंसर बोर्ड ने हमें एक लिस्ट दी और हमारी फिल्म में वो बदलाव करने को कहा गया."
कानूनी दायरों के चलते सूरी उन दृश्यों के बारे में विस्तार से नहीं बता सकीं, जिन पर सेंसर ने आपत्ति जताई है. मगर सूत्रों के मुताबिक ये कट इतने लंबे थे, कि जो लिस्ट मेकर्स को दी गई वो कई पन्नों में पूरी हो सकी. संध्या सूरी ने आगे कहा,
"इस फिल्म को भारत में रिलीज़ करना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था. इसीलिए मैंने वो सब किया जो मेरे बस में था. मगर इतने कट्स के बाद फिल्म का मक़सद छोड़िए, उस फिल्म का कोई मतलब ही नहीं रह जाता. मुझे नहीं लगता कि मेरी फिल्म में हिंसा का उतना महिमामंडन है, जितना हमारे यहां पुलिस पर बनी पिछली कई फिल्मों में किया जा चुका है. मेरी फिल्म में ऐसा कुछ सनसनीख़ेज़ भी नहीं है."
सूरी ने उनकी फिल्म में कांट छांट पर आमादा सेंसर के मंसूबों पर सवाल भी उठाए. उन्होंने कहा,
“शायद इस फिल्म में कुछ ऐसा है जो उसूलों से समझौता कर चुके लोगों को अखर रहा है. इसमें सड़े-गले सिस्टम में कोई आवारा पुलिसवाला नहीं दिखाया हमने. मुझे लगता है यही बात इस फिल्म को इस विषय पर बनी बाकी भारतीय फिल्मों से अलग करती है. ये फिल्म बॉलीवुड के चिर-परिचित स्टाइल से मेल नहीं खाती. ये असलियत दिखाती है. शायद इस बात ने सेंसर बोर्ड को असहज कर दिया.”
2021 से पहले फिल्म सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भारत में थोड़ी अलग थी. तब FCAT यानी फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल नाम की सरकारी ईकाई होती थी. अगर फिल्म में सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए कट्स से मेकर्स को कोई आपत्ति होती थी, तो वो ट्रिब्यूनल में अपनी बात रखते थे. वहां ये तय होता था कि सेंसर बोर्ड ने जो बदलाव सुझाए हैं, वो फिल्म में होने चाहिए या नहीं. मगर 2021 में सरकार ने इस ट्रिब्यूनल को खत्म कर दिया. यानी अब सेंसर बोर्ड ने आपकी फिल्म में जो भी बदलाव सुझाए हैं, वो मेकर्स को करने पड़ेंगे. अगर वो इससे इत्तेफाक नहीं रखते, तो उन्हें सेंसर बोर्ड के खिलाफ कोर्ट जाना पड़ेगा. सूरी ने इस तरफ भी इशारा किया कि वो ये लड़ाई लड़ती रहेंगी. तब तक, जब तक कि इस फिल्म में भारतीय दर्शकों तक पहुंचा नहीं देतीं. संतोष ने कहा,
"अब तक मेरा सारा काम सारी फिल्में भारत के बारे में रहीं. एक फिल्म नॉस्टैल्जिक थी. दूसरी खूबसूरत और सेंशुअल थी. फिल्म 'संतोष' भारत का एक और पहलू दिखाती है, जो क्रूर है. मगर इंसानियत इसके हर दृश्य में है."
#आखिर ऐसा क्या है 'संतोष' की कहानी में?
संध्या सूरी की लिखी 'संतोष' की कहानी उत्तर भारत के एक काल्पनिक शहर में घटती है. इसमें केंद्रीय पात्र एक विधवा है. वो पुलिस फोर्स जॉइन करती है. उसे एक दलित बच्ची का मर्डर केस सौंपा जाता है. इस फिल्म में छुआछूत, सेक्शुअल वायलेंस और एंटी-मुस्लिम माहौल का भी ज़िक्र किया गया है. दलित महिलाओं को आज भी क्या कुछ सहना पड़ रहा है, वो सब ये फिल्म मारक अंदाज़ में बताती है. संध्या सूरी अपने कुछ इंटरव्यूज़ में बता चुकी हैं कि 2012 के दिल्ली के निर्भया रेप केस के बाद उन्हें ये फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली. उन्होंने बड़े मन से ये फिल्म बनाकर तैयार की. उसे दुनियाभर के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल्स में भेजा. जहां इसे खूब पसंद किया गया. बेहतरीन रिव्यूज़ मिले. मगर भारतीय दर्शक ‘संतोष’ से महरूम रह जाएंगे.
वीडियो: द सब्स्टेंस और द ब्रूटलिस्ट... ऑस्कर 2025 के लिए नॉमिनेट हुई फिल्मों को इस प्लेटफॉर्म पर देख सकते हैं