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मनोज कुमार के 15 बेमिसाल डायलॉग, जिन्हें सुनकर धमनियों में रक्त का बहाव तेज हो जाएगा

4 अप्रैल को Manoj Kumar का निधन हो गया, हम उन्हें याद कर रहे हैं उन्हीं के बेजोड़ डायलॉग्स से.

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मनोज कुमार ने 1957 में फिल्म 'फैशन' से डेब्यू किया था.

"जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई...तारों की भाषा भारत ने, दुनिया को पहले सिखलाई…"

Manoj Kumar की फिल्म Poorab Aur Paschim की ये पंक्तियां सुन हर हिंदुस्तानी अपने भीतर एक उन्माद सा महसूस करता है. देशभक्ति की तरलता आंखों में उतर आती है. भुजाओं में लहू कुछ और तेज़ गति से दौड़ने लगता है. और मनोज कुमार ऐसे कई नगमे, कई संवाद, कई दृश्य छोड़ गए हैं, जो सदियों तक हमारे सीनों में धड़कते रहेंगे. 4 अप्रैल को एक्टर, राइटर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर मनोज कुमार का निधन हो गया. वो 87 साल के थे. भारत-पाक विभाजन का उनकी स्टोरीटेलिंग पर गहरा असर रहा. इसी दौरान उनके परिवार को तत्कालीन पाकिस्तान से विस्थापित होना पड़ा था. अपने करियर में उन्होंने सबसे ज्यादा देशभक्ति फिल्में कीं. वो दौर जब देश बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझ रहा था, तब मनोज कुमार ने देश प्रेम पर ऐसी फिल्में बनाईं कि उन्हें ‘भारत कुमार’ कहा जाने लगा. उनके डायलॉग बड़े मशहूर हुए. कुछ ऐसे ही चुनिंदा बेमिसाल डायलॉग हम आपको आज याद दिला रहे हैं. 

“ज़मीन तो मां होती है, और मां के टुकड़े नहीं किए जाते.”
'उपकार', 1967

Manoj Kumar

मनोज कुमार ने लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाई थी 'उपकार'. 

 

“अपने यहां की मिट्टी की ख़ुशबू है ना... वो तो अजनबी लोगों की सांसों में भी संस्कार भर देती है.”
'पूरब और पश्चिम', 1970

Manoj Kumar, Saira Bano

'पूरब और पश्चिम' 1971 में यूके में भी रिलीज़ की गई थी. 

 

"ज़ुल्म और झूठ की डाली पर एक बार फल लगता है, दोबारा नहीं."
'क्रांति', 1981

manoj kumar in kranti
'क्रांति' में मनोज कुमार के साथ दिलीप कुमार भी थे. 

 

"दुनिया में बर्बादी की जड़ है एक इंसान का दूसरे इंसान पर हुक़ूमत करने का शौक."
'शहीद', 1965

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'शहीद' की स्क्रिप्ट लिखना मनोज कुमार ने 1962 में शुरू की थी. फिल्म 1965 में रिलीज़ हुई. 

 

"विश्वास तो एक ऐसा बंधन है, जो एक इंसान को दूसरे इंसान के करीब लाता है."
'उपकार', 1967

manoj kumar in upkar
'उपकार' ने अलग-अलग कैटेगरी में सात अवॉर्ड जीते. 

“एक अच्छे हॉस्पिटल के लिए सिर्फ पक्की इमारत और चमकते फर्नीचर की ज़रूरत नहीं होती, ज़रूरत है तो काम करने वाले हाथों की और महसूस करने वाले दिलों की.”
'हिमालय की गोद में', 1965

Manoj kumar, Mala sinha
'हिमालय की गोद में' ने फिल्मफेयर का बेस्ट फिल्म अवॉर्ड जीता था. 

 

"दुनिया अभी तक वो बंदूक नहीं बना सकी, जो सच्चाई का खून कर सके."
'हिमालय की गोद में', 1965

Manoj kumar, Mala Sinha in himalaya ki god mein
'हिमालय की गोद में' 1960 से 1970 के दशक की 20 सबसे बड़ी व सबसे कमाऊ फिल्मों में से एक थी. 

 

"जो इंसान की मौत मरना नहीं जानता, ये दुनिया उसे इंसान की ज़िंदगी जीने नहीं देती."
'शहीद', 1965

manoj kumar,
1965 में आई 'शहीद' ने 13वां नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता. 

 

"अगर उनके पास अंग्रेज़ी तोपें हैं, तो हमारे पास हिंदुस्तानी सीने हैं. "
'क्रांति', 1981

Hema Malini and Manoj Kumar in Kranti
'क्रांति' सुपरहिट फिल्म रही. सिनेमाघरों में ये 67 हफ्तों तक लगातार चली.

 

"इंसान इस दुनिया में चार दिन की जिंदगी गुज़ारने आता है, लेकिन 40 दिन का ग़म उसे घेरे रहता है."
‘मेरा नाम जोकर’, 1970

Manoj Kumar and Rishi Kapoor
'मेरा नाम जोकर' में मनोज कुमार का रोल छोटा मगर यादगार था. 

 

"मैं वो शमा-ए-मज़ार हूं, जिस पर फ़लक भी रो दिया, शाम हुई जला दिया, सुबह हुई बुझा दिया."
‘संतोष’, 1989

Manoj Kumar, Hema Malini
'संतोष' की शूटिंग 1977 में शुरू हुई. मगर ये 12 साल बाद 1989 में रिलीज़ हो सकी. 

 

"जो लोग यहां आकर बस जाते हैं, वो ये क्यों नहीं सोचते, कि उन पर सबसे पहला अधिकार उस देश का है जिसने पाल-पोस कर उन्हें बड़ा किया. जब भी एक आदमी पढ़ लिख कर यहां काम करने लगता है ना, तो यहां दो हाथ और एक दिमाग बढ़ जाता है, लेकिन वहां घट जाता है."
‘पूरब और पश्चिम’, 1970

Saira Bano, Manoj Kumar
लंदन में ये फिल्म 50 हफ्तों तक सिनेमाघरों में लगी रही. 

 

"रात में सोते हुए जो सपने आते हैं, वो सच्चे नहीं होते, लेकिन दिन में जागते हुए जो सपने देखे जाते हैं, वो हमेशा सच्चे होते हैं. क्योंकि उनका दूसरा नाम है इरादा."
'हिमालय की गोद में', 1965

Manoj Kumar and Mala sinha
'हिमालय की गोद में' के निर्देशक विजय भट्ट थे. 

 

"जब-जब इंसान के हाथ नेक काम करते हैं, उन्हें जलना पड़ता है. छाले पड़ते हैं. फिर ऐसे ही हाथों पर प्यार का मरहम लगता है."
हिमालय की गोद में, 1965

Mala Sinha, Manoj Kumar
'हिमालय की गोद में' के एक दृश्य में माला सिन्हा और मनोज कुमार. 

 

"कोई साथ न दे मेरा, चलना मुझे आता है, हर आग से वाकिफ़ हूं, जलना मुझे आता है."
रोटी कपड़ा और मकान, 1974

Manoj Kumar, Zeenat Aman
'रोटी, कपड़ा और मकान' के राइटर, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी मनोज कुमार थे. 

मनोज कुमार लंबे समय उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे. पिछले दिनों उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन धीरूबाई अंबानी अस्पताल में भर्ती करवाया गया. उनके बेटे कुणाल गोस्वामी ने एक स्टेटमेंट जारी करते हुए बताया कि 4 अप्रैल की सुबह 3:30 पर मनोज कुमार ने अपनी अंतिम सांसें लीं. 5 अप्रैल को मुंबई में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

वीडियो: मनोज कुमार ने ऐसा क्या किया जो उनका नाम बदल गया?