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फिल्म रिव्यू- लाइगर

‘लाइगर’ अपनी पहचान एक एक्शन फिल्म के रूप में करवाना चाहती है, मगर वो इस कोशिश में बुरी तरह असफल साबित होती है.

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फिल्म में सेंस, लॉजिक और एंटरटेनमेंट जैसी क्वॉलिटीज़ के सामने विजय देवरकोंडा.

बॉयकॉट आदि के बीच से होते हुए विजय देवरकोंडा की फिल्म ‘लाइगर’ रिलीज़ हो गई है. फिल्म के कर्ता-धर्ता हैं पुरी जगन्नाथ. यानी उन्होंने ही कहानी और स्क्रीनप्ले लिखे, और फिल्म भी डायरेक्ट की. विजय के अलावा अनन्या पांडे, राम्या कृष्णन और रोनित रॉय भी कास्ट का हिस्सा हैं. ‘लाइगर’ किस बारे में है, कैसी फिल्म है, आज के रिव्यू में ऐसे ही पॉइंट्स पर बात करेंगे.  

फिल्म में विजय देवरकोंडा ने लाइगर नाम के लड़के का रोल निभाया है. लाइगर यानी लायन और टाइगर का क्रॉस ब्रीड. उसकी मां ये नाम रखती है. क्योंकि उसके पिता एक फाइटर थे, जिन्हें लायन कहकर पुकारा जाता था. खैर, लाइगर की आर्थिक स्थिति ठीक ना है. वो अपनी मां के साथ मिलकर चाय बेचता है. मां चाहती है कि उसका बेटा चैम्पियन बने. अपने पिता की मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स की लेगसी को आगे बढ़ाए. आगे पूरी कहानी लाइगर के चैम्पियनशिप बेल्ट तक पहुंचने की कहानी है.  

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‘लाइगर’ फिल्म की शुरुआत में विजय देवरकोंडा-

‘लाइगर’ अपनी पहचान एक एक्शन फिल्म के रूप में करवाना चाहती है. लेकिन कर नहीं पाती. रिंग में विजय जितना एक्शन करते है, वो भले ही देखने में एक्साइटिंग लगे. पर जिस ढांचे पर वो खड़ा है, वो अंदर से खोखला है. यानी लाइगर का उस रिंग तक पहुंचना जस्टीफाइड नहीं लगता. पहला तो उसकी लाइफ में कन्फ्लिक्ट या विरोधाभास की कमी. उसके पास इतने पैसे नहीं कि MMA ट्रेनिंग ले सके. ये उसके लिए समस्या बने, उससे पहले ही हल हो जाती है. लाइगर जैसे फाइटर्स के लिए ही आप एक्सेप्शनल जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं. रिंग में उसका कोई मुकाबला नहीं. स्किल के मामले में उसे कभी जूझना नहीं पड़ता. बस अपने ऐरोगेन्स पर कंट्रोल नहीं. फिल्म देखते वक्त मुझे लगा कि मेकर्स उसके इसी गुस्से, इसी ऐरोगेन्स को उसकी चुनौती बनाएंगे. कुछ ऐसा जिससे वो पार पाने के कोशिश करे. लेकिन फिल्म ऐसा नहीं करती.  

फिल्म 'लाइगर' के एक सीन में विजय देवरकोंडा का किरदार, जो कि हकलाकर बात करता है.

वो लाइगर की ऐरोगेन्स पर बस बात कर के छोड़ देती है. फिल्म ने लाइगर का सबसे बाद कन्फ्लिक्ट ढूंढा है तान्या में. तान्या लाइगर की गर्लफ्रेंड है, और इन दोनों की लव स्टोरी फिल्म का सबसे प्राब्लमैटिक साइड है. लाइगर उसके साथ कैसे पेश आता है, उसके लिए आप उसके बैकग्राउंड का तर्क दे देंगे. लेकिन तान्या का किरदार भी इस मामले में उसकी बराबरी का ही है. पुरी जगन्नाथ की फिल्मों से अक्सर ये शिकायत होती है कि वो महिला किरदारों को बड़े स्टीरियोटिपिकल तरीके से दिखाते हैं. मुझे लगा कि अब तो 2022 है, कुछ तो बदला होगा. लेकिन फिर फिल्म में अनन्या का किरदार देखा. निराशा हुई, हैरानी हुई. इस हद तक कि ये भाव महसूस होने बंद हो गए. फिल्म उसके किरदार के इर्द-गिर्द वही दकियानूसी नैरेटिव बनाने की कोशिश करती है.  

फिल्म के एक सीन में अनन्या पांडे. उन्होंने सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर का रोल किया है, जिससे कोई इंफ्लूएंस्ड नहीं है.

लिपस्टिक लगाने वाली, छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों से दूर रहना. लड़कियों के चक्कर में करियर खराब हो जाएगा. मतलब कब तक हम ये बातें कहते और सुनते रहेंगे. फिल्म के इस पक्ष पर विस्तार से बात करने की ये वजह नहीं कि मॉरल साइंस का लेक्चर दिया जाए. फिल्म दिखाती है कि तान्या से लाइगर का रिलेशनशिप ही उसकी ड्राइविंग फोर्स बनता है. उससे ही लाइगर को खुद को बेहतर करने की इंस्पिरेशन मिलती है. लेकिन जब वो रिलेशनशिप ही ऐसे पहलुओं पर खड़ा हो, तो आपका किरदार किस दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहा है. फिल्म की राइटिंग ने उसका सबसे बड़ा नुकसान किया है. हर किरदार को एक फिक्स सांचे में बिठा दिया बस.  

अपने बेटे की लाइफ में लड़की को आता देख लाइगर की मांग. राम्या कृष्णन ने फिल्म में लाइगर की मां का रोल किया है.

राम्या कृष्णन ने फिल्म में लाइगर की मां का रोल निभाया. अधिकांश समय वो लाइगर को डांट रही होती हैं. मॉडर्न लड़कियों से दूर रहने की सलाह दे रही होती हैं. खुद के दम पर एक अनजान शहर में अपने बेटे को कैसे बड़ा किया, वो साइड कभी देखने को नहीं मिलता. बड़े घर की लड़की को लेकर जो भी घिसे-पिटे स्टीरियोटाइप बने हुए हैं, वो इमैजिन कर लीजिए. बस ऐसा है अनन्या का किरदार. वो एक सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर बनना चाहती है, जिसे बस अपने मेल फॉलोअर्स की अटेंशन चाहिए. ऐसे किरदार से कोई आपत्ति नहीं. समस्या तब है जब आप उसकी पूरी लाइफ और तमाम बातचीत सिर्फ उसी पक्ष के इर्द-गिर्द रख दें. फिल्म में रोनित रॉय भी हैं, जिन्होंने लाइगर के कोच का किरदार निभाया है.  

अपनी फिल्म को बॉयकॉट से बचाने के बाद विजय देवरकोंडा.

विजय के किरदार लाइगर को बोलने में दिक्कत आती है. इस वजह से उसका मज़ाक भी उड़ता है. बदले में लाइगर के हाथ-पांव चलते हैं. विजय को अपने किरदार के लिए शायद यही ब्रीफ दिया गया हो कि आपको बस एटिट्यूड रखना है ढेर सारा. फिल्म उनके किरदार के इमोशनल पक्ष को एक्सप्लोर करने में इच्छुक नहीं दिखती. वो बस अपने हीरो को लड़ते हुए देखना चाहती है. ‘लाइगर’ से मुझे जिन नैतिक मसलों पर दिक्कत हुई, अगर उन्हें हटा दिया जाए तब भी ये एक अच्छी फिल्म नहीं बन पाती. कहानी एक फ्लो में बहती नहीं दिखती. एक साथ कई सारी चीजें दिखाने के चक्कर में कन्फ्यूज़ हो जाती है. ऐसे में लाइगर के पंचेज़ देखने में कितने भी कूल लगें, लेकिन उनका असर नहीं पड़ता.

वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- रक्षा बंधन