
'जय भीम' का पहला पोस्टर.
फिल्म के टाइटल और मैसेजिंग ने लोगों को प्रभावित किया. लोग सोशल मीडिया पर लिखने लगे कि जातीय भेदभाव जैसे मुद्दों पर अच्छी फिल्में देखनी हैं तो रीजनल सिनेमा का रुख कीजिए. कहां आप मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा से उम्मीद लगाए बैठे हैं. 2019 में आई ‘आर्टिकल 15’ को याद करें तो ये बात सही भी बैठती है. जहां फिल्म के दलित किरदारों को बैकसीट पर बिठाकर ऊंची जाति वाला पुलिस इंस्पेक्टर तारणहार बनकर उभरता है. रही बात रीजनल सिनेमा की, तो वहां दलित या समाज के पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग अब सिर्फ बेचारे बनकर नहीं बैठे. वो किसी मसीहा के आने की बाट नहीं देख रहे. सूर्या की फिल्म ‘जय भीम’ के पोस्टर रिलीज़ से एक दिन पहले चलते हैं. जब अमेज़न प्राइम वीडियो पर तमिल फिल्म ‘सारपट्टा परंबरै’ रिलीज़ हुई. फिल्म ऊपर से नॉर्थ चेन्नई में पनपने वाले बॉक्सिंग कल्चर की कहानी लगती है. लेकिन सिर्फ सतही तौर पर. कहानी के थोड़ा अंदर उतरने पर हमें मिलता है एक बहुजन समाज का लड़का. जो गौतम बुद्ध की मूर्ति के बगल में अपनी पूजा करता है. उसकी पूजा यानी बॉक्सिंग. फिल्म का ये लीड किरदार खुद को उठाने के लिए किसी का इंतज़ार नहीं करता. बल्कि खुद मजबूत बनकर खड़ा होता है. अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए.

2021 की बेस्ट फिल्मों में गिनी जाएगी 'सारपट्टा परंबरै'.
सिनेमा का इम्पैक्ट समझने के लिए हमने रीजनल सिनेमा की फिल्में खंगाली. जो जातीय भेदभाव जैसे सब्जेक्ट को सोशल ड्रामा और उससे प्रभावित होने वाले लोगों को सिर्फ ‘विक्टिम’ में तब्दील नहीं होने देतीं. उनपर खुलकर बात करती हैं. दुनिया बदलने के लिए नहीं. बल्कि सही दिशा में कॉनवर्सेशन शुरू करने के मकसद से. लिस्ट में मौजूद हर फिल्म खोजकर देखने लायक है. ये फिल्में लंच के समय आपका टाइमपास नहीं करेंगी. हां, इतनी गारंटी है कि आपको एक कदम बेहतर ही बनाएंगी. खुद से बाहर झांकने पर मजबूर करेंगी.
